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ज़रदारी के बयान की कड़ी आलोचना

By Staff
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    ज़रदारी के आलोचक कह रहे हैं कि ऐसा अमरीकी दबाव में कहा जा रहा है
    पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ ज़रदारी के भारत के संदर्भ में ताज़ा बयान की कश्मीर के अलगाववादी गुटों और पाकिस्तान के नेताओं ने निंदा की है.

    दो दिन पहले अमरीका के एक अख़बार को साक्षात्कार में ज़रदारी ने स्वीकार किया था कि भारत से उनके देश को कोई ख़तरा नहीं है. उन्होंने यह भी कहा था कि जम्मू-कश्मीर में सक्रिय विद्रोही 'आतंकवादी' हैं.

    ऐसा पहली बार हुआ था कि पाकिस्तान के किसी शीर्ष व्यक्ति ने भारत के बारे में ऐसा बयान दिया हो और कश्मीर की स्थिति पर ऐसा रुख़ लिया हो.

    पर अब इस बयान का विरोध भी हो रहा है. भारत प्रशासित कश्मीर के हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह गीलानी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि वो और कई अन्य कश्मीरी अलगाववादी नेता ज़रदारी के इस बयान को खारिज करते हैं, इसकी निंदा करते हैं.

    उन्होंने कहा कि ज़रदारी अमरीकी दबाव में ऐसा कह रहे हैं. वो अमरीका और भारत, दोनों को खुश करने के लिए ऐसी बातें कह रहे हैं. साथ ही गीलानी ने कहा कि कश्मीरी के विद्रोहियों को आतंकवादी कह देने से कश्मीर की स्वायत्ता और स्वतंत्रता का आंदोलन कमज़ोर पड़ने वाला नहीं है.

    लेकिन पाकिस्तानी संसद की कश्मीर समिति के प्रमुख मौलाना फ़ज़लुर्रहमान ने इस बयान के बाद बीबीसी से बातचीत में राष्ट्रपति ज़रदारी को अनुभवहीन क़रार दिया है.

    उन्होंने कहा, "पाकिस्तानी सरकार और जनता हमेशा से कश्मीरियों के संघर्ष का सम्मान करती है. राष्ट्रपति ज़रदारी को अभी बयान देने का और बयान में सही शब्दों के चुनाव का अनुभव नहीं है."

    मौलाना फ़ज़लुर्रहमान ने इसके बाद कहा कि उनकी अध्यक्षता वाली कश्मीर समिति राष्ट्रपति ज़रदारी से ये बयान वापस लेने के लिए कहेगी.

    भारत को कभी भी दुश्मन नहीं मानने के राष्ट्रपति ज़रदारी के बयान पर उन्होंने कहा, "अगर आप पाकिस्तानी सेना के किसी भी जवान से दुश्मन का मतलब पूछेंगे तो उसके लिए वो भारत ही होगा. मगर पाकिस्तान में सरकार भारत से दोस्ती चाहती है और ज़रदारी का बयान उसी भावना को उजागर करता है."

    विवादित हुआ बयान

    ज़रदारी ने कहा कि पाकिस्तान को भारत से ख़तरा नहीं है

    ज़रदारी ने कहा, "भारत कभी भी पाकिस्तान के लिए ख़तरा नहीं रहा है. न मैं और न ही हमारे देश की लोकतांत्रिक सरकार विदेशों में भारतीय प्रभाव से डरी हुई है."

    वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक़ ज़रदारी ने कहा कि कश्मीर में सक्रिय विद्रोही आतंकवादी हैं, अख़बार ने लिखा है कि आम तौर पर उम्मीद यही होती है कि ज़रदारी उन्हें आज़ादी की लड़ाई में जुटे लोग की संज्ञा देंगे.

    एक सवाल के जबाव में ज़रदारी ने कहा कि जब तक पाकिस्तान के साथ समान बर्ताव होता है तब तक उन्हें भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर कोई एतराज़ नहीं है.

    उन्होंने कहा, "अगर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र से दोस्ताना संबंध हैं तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है."

    भारत के साथ बेहतर संबंध के बारे में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान जैसे देश आर्थिक तौर पर टिक नहीं सकते, उन्हें पड़ोसी देशों के साथ व्यापार करना ही पड़ता है.

    पाकिस्तान में केंद्रीय बैंक के पास विदेशी मुद्रा का भंडार इतना भर है कि वो दो महीने तक तेल और खाद्य सामग्री के आयात का ख़र्च उठा सकता है. इस आर्थिक संकट पर ज़रदारी का कहना था कि वो बाक़ी देशों से 100 अरब डॉलर की उम्मीद करते हैं.

    अख़बार में लिखा गया है कि ज़रदारी की कल्पना है कि कि भारत में आधारभूत ढाँचे की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पाकिस्तानी सिमेंट फ़ैक्ट्रियाँ मदद करें, पाकिस्तानी टेक्सटाइल मिलें भारत को सामग्री उपलब्ध करवाएँ और भारतीय बंदरगाहों पर भीड़-भाड़ कम करने के लिए पाकिस्तानी बंदरगाहों का इस्तेमाल हो.

    बयान के मायने

    ज़रदारी का बयान भारत से संबंधों की एक नई पहल के तौर पर भी देखा जा रहा है

    ज़रदारी के इस ताज़ा बयान से भले ही विवाद भी खड़ा हो गया हो पर जानकार इसे भारत-पाकिस्तान संबंधों के लिहाज से एक नई तरह की पहल के तौर पर देखते हैं.

    पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार एहतेशाम-उल-हक़ ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ज़रदारी ने जो कुछ कहा है उससे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का मानस पता चलता है और इस बयान में कोई ख़ास नई बात नहीं है क्योंकि ऐसा पीपीपी पहले भी कहती रही है.

    वो बताते हैं, "बेनज़ीर भुट्टो ने भी अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में भारत के प्रति यही रुख़ दिखाया था. पीपीपी हमेशा से भारत के साथ शांतिपूर्ण माहौल और बेहतर संबंधों की हिमायती रही है. हालांकि बाकी के दल इस बयान को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया देंगे क्योंकि उनकी धारणा भारत और कश्मीर के सवाल पर कुछ अलग है."

    उन्होंने कहा कि इस बयान के कुछ मतलब साफ़ निकलते हैं. एक तो यह भी पाकिस्तान की वर्तमान हुकूमत का भारत के प्रति रुख़ स्पष्ट होता है. दूसरा यह कि कारगिल युद्ध और मुशर्रफ़ के सैन्य शासन के बाद राष्ट्रपति ज़रदारी ने पाकिस्तानी सेना को भी भारत के बारे में एक तरह का संकेत दिया है.

    जानकार एक नतीजा यह भी निकालते हैं कि पाकिस्तान एक बड़े सीमा क्षेत्र पर पहले से ही युद्ध जैसी स्थिति देख रहा है. अफ़ग़ानिस्तान के साथ लगी सीमा की स्थिति जो है, उसके बाद भारत से भी तनाव और सीमा पर गर्माहट के लिए पाकिस्तान के लिए यह सही वक्त नहीं है.

    हालांकि जानकार मानते हैं कि जहाँ इस बयान के लिए ज़रदारी और पीपीपी का घेराव पाकिस्तान की ही और पार्टियाँ करेंगी वहीं यह आरोप भी लगेगा कि पाकिस्तान की ओर से यह बयान अमरीकी दबाव की उपज है.

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