आसान नहीं है 123 समझौते की डगर

Condoleezza
वाशिंगटन, 5 अक्टूबरः भारत अमरीका असैंन्य परमाणु समझौते ने पिछले तीन साल में तमाम कूटनीतिक बाधाओं को भले ही पार कर लिया हो लेकिन इस ऐतिहासिक करार की राह में जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया के कुछ चरण अभी भी बाकी है।

कुछ प्रशासनिक औपचारिकताओं के पूरा न हो पाने के कारण ही इस पर राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के हस्ताक्षर नहीं हो पाए। इसी वजह से कल नई दिल्ली में अमरीकी विदेश मंत्री कोडालिजा राइस तथा विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी भी इस पर अपने अपने देश की ओर से आधिकारिक मुहर नहीं लगा सके।

बुश प्रशासन की ओर से इस समझौते को लागू करने के लिये जरूरी प्रशासनिक औपचारिकताओं का कल देर रात खुलासा किया गया। अमरीकी विदेश मंत्रालय की ओर से स्पष्ट किया गया कि भारत के साथ असैन्य परमाणु व्यापार शुरू करने से पहले दोनों देशों को एक समझौते पर हस्ताक्षर करने होंगे।

यह औपचारिकता 123 समझौते के प्रारूप पर जुलाई 2007 में दोनों देशों की ओर से हस्ताक्षर होने के साथ ही पूरी हो गई। इसके बाद इस प्रारूप को विधेयक के रूप में कांग्र्रेस के दोनों सदनों में पेश करना और इसे पारित कराना जरूरी है।

पिछले तीन साल की कवायद के बाद गत बुधवार को यह औपचारिकता भी पूरी हो गईं।

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