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पूँजीवाद के स्वरूप पर बहस गर्म

By मुकेश शर्मा
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    इस आर्थिक संकट में सरकारी हस्तक्षेप ने पूँजीवाद के भविष्य पर सवालिया निशान लगाए हैं
    दुनिया की अर्थव्यवस्था में उतार चढ़ावे के बाद अमरीका को जिस तरह बाज़ार में हस्तक्षेप करना पड़ा उससे पश्चिम में पूँजीवाद को लेकर बहस गर्म है.

    अमरीकी सरकार और यूरोप में सरकारें जिस तरह बैंकों को बचाने के लिए बड़े-बड़े आर्थिक पैकेज दे रही हैं उसके बाद सवाल उठ रहा है कि क्या पूँजीवाद का स्वरूप बदल गया है या पूँजीवाद समाप्त हो रहा है.

    बड़े-बड़े, दिग्गज अर्थशास्त्रियों को भी अंदाज़ा नहीं था कि संकट की कितनी पर्तें एक के बाद एक खुलेंगी और बात यहाँ तक पहुँचेगी कि पूँजीवाद की वकालत करने वाला अमरीका अपने यहाँ के आर्थिक संस्थानों को बचाने के लिए सरकारी हस्तक्षेप का सहारा लेगा.

    अमरीका अब तक ये कहता रहा है कि बाज़ार में सरकार का दख़ल कम होना चाहिए और जब भी चीन या भारत में सरकार ने संस्थानों को बचाने की कोशिश की अमरीका ने उसका विरोध किया. मगर अब अमरीका के पास ऐसा करने का मुँह नहीं बचेगा
    और सहारा भी ऐसा वैसा नहीं 700 अरब डॉलर का, यानी अमरीका में डूबती कंपनियों को सहारा देने के लिए हर अमरीकी- बूढ़े से लेकर बच्चे तक, की ओर से लगभग सवा दो हज़ार डॉलर की मदद.

    इस पैकेज को लेकर ख़ुद अमरीकी राजनीतिज्ञ लेकर कितना असहज थे उसका अंदाज़ा इसी बात से लगता है कि प्रस्ताव जब अमरीकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में दूसरी बार पहुँचा तो अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की पुरज़ोर कोशिश के बावजूद, उनकी रिपब्लिकन पार्टी के 91 सदस्यों ने इस पैकेज का समर्थन किया और 108 ने विरोध.

    अगर डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों ने साथ न दिया होता तो ये प्रस्ताव कभी पारित नहीं हो पाता.

    मगर ये पूरा नाटकीय घटनाक्रम अमरीकी पूँजीवाद पर सवाल ज़रूर उठा गया.

    बढ़ता हस्तक्षेप

    मोटे तौर पर पूँजीवाद एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ बाज़ार किसी भी केंद्रीय आर्थिक नियंत्रण या हस्तक्षेप से मुक्त है और लाभ के लिए उत्पादन और वितरण मुक्त बाज़ार ही तय करता है.

    दुनिया भर के शेयर बाज़ार इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं

    विश्व बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष शाहिद जावेद बर्की अमरीका में डगमगाते पूँजीवाद के बारे में कहते हैं, "पूँजीवाद काफ़ी ज़बरदस्त तरीक़े से बदला है. इसकी वजह से अब निवेश बैंकिंग समाप्त हो गई है और जो निवेश बैंक बचे हैं वे व्यावसायिक हो गए हैं."

    बर्की के अनुसार, "अब पूरी व्यवस्था पर निगरानी रखने वाली एक नई प्रणाली बनेगी जिससे वित्तीय संस्थानों पर अमरीकी सरकार का नियँत्रण बढ़ेगा."

    मगर भारतीय प्रबंधन संस्थान के पूर्व प्रोफ़ेसर डॉक्टर भरत झुनझुनवाला मानते हैं कि हस्तक्षेप पूँजीवाद के एक हिस्से को प्रभावित करेगा.

    उनका कहना है, "अमरीका अब तक मानता था कि खुली अर्थव्यवस्था में हम जीतेंगे. मगर अब उसे समझ में आएगा कि इस खुली अर्थव्यवस्था में दूसरे देश भी जीत सकते हैं. इसलिए अमरीका खुली अर्थव्यवस्था से पीछे हटकर संरक्षणवाद को अपनाएगा मगर पूँजीवाद समाप्त नहीं होगा."

    सामाजिक पूँजीवाद

    इस बारे में ब्रिटेन में बेडफ़र्ड के क्रैनफ़ील्ड स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में प्रोफ़ेसर सुनील पोशाकवाले कहते हैं कि अमरीकी पूँजीवाद में अब समाजवाद की झलक भी मिलने लगी है यानी स्वरूप कुछ सामाजिक पूँजीवाद का हो गया है.

    हम नेहरू के समाजवाद से निकले हैं जहाँ सरकार की भूमिका काफ़ी अहम मानी जाती है. इसलिए सरकार के लिए यहाँ दख़ल देना कोई सैद्धांतिक परेशानी का सवाल नहीं है. मगर अमरीका में ये एक सिद्धांत की बात हो जाती है.
    पोशाकवाले कहते हैं, "ये अमरीका के लिए गहरी चोट है. अमरीका अब तक ये कहता रहा है कि बाज़ार में सरकार का दख़ल कम होना चाहिए और जब भी चीन या भारत में सरकार ने संस्थानों को बचाने की कोशिश की अमरीका ने उसका विरोध किया. मगर अब अमरीका के पास ऐसा करने का मुँह नहीं बचेगा."

    अमरीका में 700 अरब डॉलर के आर्थिक पैकेज के विरोधियों का कहना था कि जिन लोगों ने आर्थिक मामलों में इतना दुस्साहस किया, इतने बड़े ऋण लिए उन्हें सबक मिलना चाहिए, उन्हें आख़िर क्यों बचाया जाए.

    मगर शाहिद जावेद बर्की के मुताबिक़ ये समय उनसे बदला लेने का नहीं है. बर्की का कहना है, "उससे फिर आम लोगों को काफ़ी नुक़सान होता. जिन्होंने पैसा कमाया वो तो अमरीका में फ़्लोरिडा में बड़े-बड़े घरों में आराम कर रहे हैं मगर ये समय उनसे बदला लेने का नहीं है. "

    वह कहते हैं, "अभी तो सिस्टम को चलाना है और अगर बैंकिंग क्षेत्र में संकट बढ़ता गया या शेयर बाज़ार गिरता गया तो हम जैसे लोग काफ़ी मुश्किल में पड़ जाएँगे. इसलिए पैकेज का ये फ़ैसला सही था."

    अमरीकी साख पर सवाल

    पर सवाल ये भी है कि अगर बैंकिंग क्षेत्र को संकट से बचा लिया जाए तो क्या उससे आर्थिक संकट की जड़ दूर हो जाएगी. हालात सँभल जाएँगे.

    अमरीका में एक के बाद एक वित्तीय संस्थाओं की मुश्किलें बढ़ती गईं और सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा

    इस बारे में सुनील पोशाकवाले कहते हैं, "सवाल ये भी है कि 700 अरब डॉलर की राशि आख़िर किस आधार पर तय की गई है कल को अगर पता चला कि ख़राब असेट्स की क़ीमत 1400 अरब से ऊपर है तो बाज़ार का विश्वास और टूटेगा. जो भी क़दम उठाए जा रहे हैं वो ख़तरे से ख़ाली नहीं हैं."

    इस संकट ने दुनिया में अमरीका की साख पर भी सवालिया निशान लगाया है.

    न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय में ‘सेंटर फ़ॉर कैपिटलिज़्म ऐंड सोसाइटी में प्रोफ़ेसर और दो साल पहले अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार जीतने वाले एडमंड फ़ेल्प्स का इस बारे में कहना है, "निश्चय ही अमरीका की छवि को नुक़सान पहुँचा है. अमरीकी अर्थव्यवस्था एक बहुत ही बुरे ढंग से चलाई जा रही अर्थव्यवस्था के तौर पर दिखती है. "

    फ़ेल्प्स कहते हैं कि आलोचकों को पूँजीवाद की क़मियाँ दिख गई है, "पूँजीवाद की आलोचना तो हमेशा ही होती रही है मगर अब उसके विरोधियों को मौक़ा मिल गया है और वे इस व्यवस्था की ख़ामियाँ देख पा रहे हैं."

    पूँजीवाद और भारत

    वैसे भारत में भी अमरीका का अनुसरण करने वालों का एक बड़ा तबका है और माना जाता है कि कुछ वैसा ही पूँजीवाद भारत में भी पैर पसार रहा है.

    मगर डॉक्टर भरत झुनझुनवाला कहते हैं कि भारत की स्थिति अमरीका जैसी नहीं होगी, "भारत में शेयर बाज़ार और रिज़र्व बैंक की भूमिका तो अमरीका जैसी है मगर उस प्रणाली को चलाने के ढंग में अमरीका और भारत में काफ़ी अंतर है."

    डॉक्टर झुनझुनवाला के अनुसार, "हम नेहरू के समाजवाद से निकले हैं जहाँ सरकार की भूमिका काफ़ी अहम मानी जाती है. इसलिए सरकार के लिए यहाँ दख़ल देना कोई सैद्धांतिक परेशानी का सवाल नहीं है. मगर अमरीका में ये एक सिद्धांत की बात हो जाती है. इसलिए दोनों देशों की मूल प्रणाली भले ही एक जैसी दिखे मगर दोनों को चलाने के ढंग में अंतर है."

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