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विवेचना: बजरंग दल पर प्रतिबंध की माँग

By रेणु अगाल
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    उड़ीसा और कर्नाटक में गिरजाघरों को दंगाइयों ने निशाना बनाया
    उड़ीसा-कर्नाटक में हिंसा के बाद ईसाई संगठनों और राजनीतिक पार्टियों की बजरंग दल पर प्रतिबंध की माँग पर बीबीसी हिंदी की विवेचना.

    बजरंग दल के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब इस संगठन पर क़ानून को अपने हाथों में लेने के आरोप लगे हैं. अपनी स्थापना के पच्चीसवें वर्ष में बजरंग दल एक बार फिर ग़लत कारणों से चर्चा में है.

    हालात अब ऐसे हैं कि कई नेता और राजनीतिक पार्टियाँ बजरंग दल पर प्रतिबंध की माँग कर रहे हैं.

    बजरंग दल का मक़सद

    बजरंग दल के पूर्व संयोजक और अब भारतीय जनता पार्टी के सासंद विनय कटियार बताते हैं कि बजरंग दल की स्थापना विश्व हिंदू परिषद के युवा दल के रूप में की गई थी.

    विनय कटियार कहते हैं, ''सबसे बड़ा उद्देश्य अयोध्या में रामजन्म भूमि को मुक्त कराना था. विदेशी आक्रान्ताओं ने जिस तरह हमारे मठ-मंदिरों को अपमानित किया, उसके बारे में समाज को बताना और आगे ऐसा न हो, इसके लिए समाज को संगठित करना हमारा उद्देश्य है. हम इस धरती पर गाय माता का रक्त बहने से रोकना चाहते हैं. बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालना चाहते हैं. लालच और धोखे से धर्मान्तरण को रोकना चाहते हैं.''

    उड़ीसा में लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद से ईसाइयों के ख़िलाफ़ जारी लगातार हिंसा के लिए बजरंग दल इन दिनों चर्चा में है. लेकिन बजरंग दल के संयोजक प्रकाश शर्मा इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं.

    यह उनकी विचारधारा है और वह लोग मारपीट करके साफ़ तौर पर कह रहे हैं कि ईसाई लोग जबरन धर्म परिवर्तन कर रहे हैं. उनकी संख्या बढती जा रही है और ये लोग भारत में कहीं बहुसंख्यक नहीं हो जाएं, इसलिए इन्हें मारपीट कर किसी तरह क़ाबू में किया जाए. कर्नाटक में तो उन्होंने कह दिया है कि वे यह सब जारी रखेंगे
    प्रकाश शर्मा कहते हैं, ''उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पिछले 40 वर्षों से वहाँ के वनवासियों के बीच काम कर रहे थे. उनकी हत्या के कारण वनवासियों में रोष उत्पन्न हुआ और फिर जो कुछ हुआ, वह उस रोष की प्रतिक्रिया थी. भारत सरकार और तथाकथित सेकुलर दल इसे हमारे सिर मढने का प्रयास कर रहें हैं. मेरा यह मानना है कि कर्नाटक और उड़ीसा की घटनाओं में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद कहीं शामिल नहीं है. ''

    फ़ादर डोमेनिक इमैनुअल का आरोप है कि देश में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा के पीछे बजरंग दल का हाथ है.

    बजरंग दल के संयोजक चाहे हिंसा के आरोपों को ख़ारिज करें लेकिन अपने संगठन की हिंदू राष्ट्र स्थापना की मंशा को ज़रूर स्वीकार करते हैं.

    ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा ही नहीं है जिसने बजरंग दल को चर्चा का विषय बनाया. इस वर्ष अगस्त में कानपुर में बम बनाते हुए दो लोग मारे गए थे. बताया जाता है कि इनका संबंध बजरंग दल से है. वर्ष 2006 में नांदेड में बम बनाते बजरंग दल के दो तथाकथित सदस्य मारे गए थे.

    'अंकुश ज़रूरी'

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य रह चुके और अब संगठन पर पैनी नज़र रखने वाले डीआर गोयल कहते हैं कि बजरंग दल जैसे संगठन संविधान को भी नहीं मानते और इन पर अंकुश लगाना ज़रूरी है.

    उड़ीसा संप्रदायिक तौर पर संवेदनशील है और यहाँ ईसाइयों पर पहले भी हमले होते रहे हैं

    वे कहते हैं, '' विश्व हिंदू परिषद ने आज तक जो कुछ भी किया, भारतीय संविधान के हिसाब से ग़लत है. बजरंग दल प्रमुख का एक बयान आया जिसमें उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य हिंदू राष्ट्र बनाना है. लेकिन देश हिंदू राष्ट्र तो नहीं है. लेकिन वह हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो इसका मतलब है कि वह एक अलग संविधान चाहते हैं. इस संगठन और इसके सरपरस्त भारतीय संविधान के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं. ''

    सामाजिक कार्यकर्ता जावेद आनंद कहते हैं कि नांदेड में बम बनाने के काम में बजरंग दल शामिल था और महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते के पास इसके सबूत हैं.

    जावेद आनंद कहते हैं, ''वर्ष 2006 में पाँच और छह अप्रैल में नांदेड में एक सेवानिवृत्त इंजीनियर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक के सदस्य के घर में विस्फोट हुआ. उस समय घर में छह लोग थे. सभी बजरंग दल के सदस्य थे. दो की मौत हुई और चार बुरी तरह जख़्मी हुए थे.''

    जावेद आनंद कहते हैं, ''आतंकवाद निरोधक दस्ते ने पूरी छानबीन के बाद जो आरोप पत्र तैयार किया, उसमें कहा गया है कि वर्ष 2003 और 2004 में परभणी, जालना और पूर्णा की मस्जिदों में हुए धमाकों में ये सभी शामिल थे. इन लोगों ने पूना में बम बनाने का प्रशिक्षण लिया था. इससे स्पष्ट है कि ये लोग बम बनाने और बम फोड़ने के काम में लगे हुए हैं. इन्हें यह सिखाया गया कि यदि हमने तीन-चार सौ को नहीं मारा तो हमें हिजड़ा कहा जाएगा.''

    बजरंग यानि हनुमान के नाम पर काम करने वाले बजरंग दल की चर्चा अक्सर हिंसक कृत्यों से जुड़ी रहती है. विनय कटियार मानते हैं कि इससे संगठन की छवि बिगड़ती है.

    विनय कटियार कहते हैं, ''मुझे लगता है कि इस प्रकार की घटना होने पर निश्चित रूप से संगठन पर असर पड़ता है. एक व्यक्ति के कारण संगठन बदनाम हो जाता है. जैसे कानपुर की घटना में क्या हुआ, किसने किया, यह जाँच तो होती रहेगी लेकिन संगठन को इससे क्षति पहुँची है.''

    राजनीतिक स्तर पर भी बजरंग दल पर प्रतिबंध की माँगें तेज़ हो रही हैं. राष्ट्रीय जनता दल नेता लालू प्रसाद यादव कहते हैं, ''जब तक ठोकर नहीं लगती, आदमी बढता जाता है, कहीं कोई स्पीड ब्रेकर नहीं है. सरकार के पास इन लोगों की सूची है. इन्हें जेल में बंद कर दीजिए.''

    सिमी से तुलना

    कई दल यह भी कहते हैं कि सिमी पर जिस तरह प्रतिबंध लगा, वैसा ही प्रतिबंध बजरंग दल पर लगना चाहिए. बजरंग दल के प्रकाश शर्मा दोनों संगठनों की तुलना से ही भड़क जाते हैं.

    प्रकाश शर्मा कहते हैं, ''सिमी के आईएसआई और हिज़बुल मुजाहिदीन से संबंध जगज़ाहिर हैं. मैं मानता हूं कि बजरंग दल की सिमी से तुलना करना राष्ट्रभक्तों का अपमान है. सिमी से जुडे लोग वह हैं जो कश्मीर घाटी में पाकिस्तान का झंडा फहराने का समर्थन करते हैं. सिमी से जुडे लोग बम विस्फोट करते हैं. यदि देश के राजनीतिक नेताओं को दोनों में फ़र्क नज़र नहीं आता तो मैं इसे देश की राजनीति का दुर्भाग्य कहता हूं. ''

    वहीं जावेद आनंद कहते हैं कि सिमी और बजरंग दल में ज़्यादा अंतर नहीं है. वह कहते हैं, ''दोनों में एक ही फ़र्क हैं कि सिमी पर आईएसआई और अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठनों से संबंध का आरोप है. यह बात बजरंग दल के बारे में नहीं कही जा सकती. अनलॉफ़ुल एक्टीविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट 1967 के प्रावधानों के हिसाब से सिमी पर यदि प्रतिबंध लगता है तो बजरंग दल पर इससे दस गुना ज़्यादा प्रतिबंध लगाना चाहिए.''

    हम भारत को हिंदू राष्ट्र बनाएंगे. भारत के हिंदू राष्ट्र बनने पर ही विश्व सुखी होगा. हिंदू अपमानित महसूस कर रहा है. हिंदू मारा जा रहा है. और उसके बाद हमीं को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है.
    ईसाई संगठन भी लगातार केंद्र सरकार से बजरंग दल पर प्रतिबंध की माँग कर रहे हैं. फॉदर डोमेनिक इमैनुअल कहते हैं, ''केंद्र सरकार से हम माँग कर रहे हैं कि सबसे पहले कर्नाटक और उड़ीसा में हिंसा बंद की जाए. बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद पर प्रतिबंध लगाया जाए. जिन्होंने आतंक फैला रखा है, उनकी धरपकड़ की जाए. आतंक फैलाना ही इनका उद्देश्य है.''

    वोट बैंक की राजनीति

    डीआर गोयल का मानना है कि कांग्रेस में भी कमज़ोरियाँ हैं. यदि ऐसा नहीं होती तो ये स्थिति पैदा ही नहीं होती. केंद्र की यूपीए सरकार के मंत्री कहते हैं कि वह बजरंग दल पर नज़र रखें हुए हैं.

    बजरंग दल पर प्रतिबंध की माँग भी होती है लेकिन इसपर प्रतिबंध क्यों नहीं लगता? इस बारे में डी आर गोयल कहते हैं कि वोट बैंक की राजनीति के कारण कांग्रेस भी सांप्रदायिक ताक़तों का खुलकर विरोध नहीं करती. लेकिन वह वामदलों से और भी ज़्यादा नाख़ुश हैं.

    वह कहते हैं, ''कम्युनिस्ट पार्टियाँ धर्मनिरपेक्षता की बात तो करती हैं, लेकिन इसके लिए जो गतिविधियाँ चलानी चाहिए, वह नहीं हैं. जिस तरह से वह परमाणु करार के ख़िलाफ़ लड़े़, उस तरह से वह दंगाइयों के ख़िलाफ़ नहीं लड़ते.''

    कभी ऐसा नहीं हुआ कि वाम दलों ने भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बजरंग दल के ख़िलाफ़ कोई मुहिम चलाई हो. कांग्रेस ने जब यह नहीं किया तो वामदलों ने उसे ज़रूर बदनाम किया
    दूसरी ओर प्रतिबंधों की माँग के पीछे बजरंग दल को भी राजनीति नज़र आती है. दल के संयोजक प्रकाश शर्मा कहते हैं कि उनका दल अपनी राह पर चलता रहेगा.

    प्रकाश शर्मा कहते हैं, '' क़ानून और लोकतांत्रिक तरीक़े से हम प्रतिबंध का सामना करेंगे और मुझे पूरा भरोसा है कि हम जीतेंगे, सोना तपकर कुंदन बनकर निकलेगा. हम बजरंग दल के गाँव गाँव में विस्तार का लक्ष्य लेकर चलें हैं. ''

    वहीं विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार, बजरंग दल का इस्तेमाल एक ऐसे वर्ग की आवाज़ उठाने के लिए करता है जिसे लगता है कि मौजूदा व्यवस्था में उसे वह हक़ नहीं मिला, जो उसे मिलना चाहिए था. लेकिन जब दल के कारनामें बढ़ जाते हैं तो वह दल से अपनी दूरी बना लेते हैं.

    वहीं कांग्रेस पार्टी भी चुनाव पर नज़र रखती है और बजरंग दल के ख़िलाफ़ कार्रवाई से परहेज़ करती है. इन सबका नतीज़ा यह है कि अल्पसंख्यक स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है और उसके भीतर भी चरमपंथी आवाज़ों को बल मिलता है. लेकिन इसका असर भारतीय समाज पर कितना भयावह हो सकता है, यह सोचकर भी डर लगता है.

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