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परमाणु मुद्दा: भारतीय विपक्ष नाराज़

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भाजपा और वामदलों ने परमाणु समझौते की दोबारा कड़ी आलोचना की है
भारत-अमरीका परमाणु समझौते को सीनेट की मंज़ूरी का कई हलकों में स्वागत हुआ है. उधर भारत में वामदलों और भाजपा ने कड़ी आलोचना की है. अमरीकी कांग्रेस यानी प्रतिनिधि सभा पहले ही इस समझौते को मंज़ूरी दे चुकी है और अब इस समझौते पर केवल अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के हस्ताक्षर होने हैं. इसके बाद परमाणु ईंधन और तकनीक के व्यापार में भारत पर तीन दशकों से लगी हुई रोक ख़त्म हो जाएगी.

अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने सीनेट में समझौता पारित होने का स्वागत करते हुए कहा, "इस समझौते से दुनिया में परमाणु अप्रसार को मज़बूत करने के प्रयासों को बल मिलेगा, नई नौकरियाँ पैदा होंगी और भारत को अपनी बढ़ रही ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी. इससे भारत-अमरीका सामरिक साझेदारी को भी बल मिलेगा."

अमरीका में भारतीय ख़ुश

बीबीसी के वॉशिंगटन संवाददाता ब्रजेश उपाध्याय के अनुसार अमरीका में भारतीय राजदूत रोनेन सेन ने कहा है, "वर्ष 1974 में तारापुर संयंत्र के लिए परमाणु ईंधन देने से अमरीका के इनकार के बाद अब इतिहास ने फिर करवट ली है. ये समझौता न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेहतर है क्योंकि ये इतिहास में एक नई शुरुआत है."

भारत सरकार यह जानते समझते हुए इस जाल में फंसी है कि उसके पास इससे बाहर आने का कोई रास्ता नहीं है. हमने एक तरह से परमाणु अप्रसार संधि को मान लिया है और ये देश की संप्रभुता और परमाणु स्वतंत्रता के साथ समझौता है. ये चिंता का समय है लेकिन कांग्रेस वाले अपनी ही डफली बजाने में जुटे हुए हैं
भारत-अमरीका मित्रता परिषद के स्वदेश चटर्जी का कहना था, "ये 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारी है. अमरीका में बसे भारतीय हर मामले पर अलग-अलग मत रखते हैं लेकिन हमने दिखाया है कि जब हम एकजुट होकर काम करें तो कमाल कर सकते हैं."

अमरीका में एक अन्य संस्था यूएस-इंडिया पोलिटिकल एक्शन कमेटी के संजय पुरी ने ब्रजेश उपाध्याय को बताया, "ये भावुक कर देने वाला क्षण है. ये समझौता दुनिया को एक नई दिशा दिखाएगा."

भाजपा, वाम का कड़ा विरोध

उधर प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है कि भारत परमाणु अप्रसार संधि के जाल में फंस गया है.

इस समझौते से दुनिया में परमाणु अप्रसार को मज़बूत करने के प्रयासों को बल मिलेगा, नई नौकरियाँ पैदा होंगी और भारत को अपनी बढ़ रही ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी. इससे भारत-अमरीका सामरिक साझेदारी को भी बल मिलेगा
समाचार एजेंसियों से बात करते हुए भाजपा नेता राजीव प्रताप सिंह रूडी ने कहा, "भारत सरकार यह जानते समझते हुए इस जाल में फंसी है कि उसके पास इससे बाहर आने का कोई रास्ता नहीं है. हमने एक तरह से परमाणु अप्रसार संधि को मान लिया है और ये देश की संप्रभुता और परमाणु स्वतंत्रता के साथ समझौता है. ये चिंता का समय है लेकिन कांग्रेस वाले अपनी ही डफली बजाने में जुटे हुए हैं."

वरिष्ठ वामपंथी नेता डी राजा का कहना था, "वाम दल अब भी भारत-अमरीका परमाणु समझौते का विरोध करते हैं. ये समझौता भारत के हित में नहीं है और भारत को इस समझौते को लागू नहीं करना चाहिए. हम इस बारे में अपना विरोध और तेज़ करेंगे."

उधर भारत में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताया है. कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल का कहना था, "इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी दूरदर्शी सोच और इस कदम के लिए याद किया जाएगा. भारत को ऊर्जा की ज़रूरत है और हम जनता को भी यह बताएँगे कि इसके बाद उनकी बिजली की ज़रूरत पूरी करने में मदद मिलेगी."

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