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तीन जादुई शब्द-- बॉन ज़्योर, मेर्सी, ऑग़्वा

By आकाश सोनी
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बॉन ज़्योर, मेर्सी, ऑग़्वा. सोचा था इन तीन जादुई शब्दों से फ़्रांसीसियों का दिल जीत लूँगा पर हो न सका.

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यात्रा कवर करने फ़्राँस आ रहा था. लोगों ने कहा कि भाषा फ़्राँस में एक बड़ी समस्या है. पर मन ही मन मैंने सोचा पहले फ़्राँस की राजधानी पेरिस जा चुका हूँ कोई दिक्कत नहीं होगी.

लंदन से पेरिस नहीं बल्कि फ़्राँस के दूसरे सबसे बड़े शहर मार्से आना था.

फ़्लाइट में ही आते-आते एक कहानी सोच ली थी. बस, एक आइडिया कि बीबीसी हिंदी के जो श्रोता और पाठक पहले फ़्राँस नहीं आए हैं उन्हें मौका मिलने पर बताता चलूँगा कि भाषा कोई समस्या नहीं है.

और ये बात भी मैं अनुभव के आधार पर कहता.

भाषा का हेर-फेर

फ़्राँस के लोगों को नाराज़गी है कि सब अंग्रेज़ी बोलते हैं लेकिन उनसे उन्हीं के देश में लोग उनकी भाषा नहीं बोलते.

लेकिन उनके दिल का ताला खोलने का एक तरीका मैंने खोज निकाला था. तीन जादुई शब्द. बॉन ज़्योर, मेर्सी, ऑग़्वा. यानि नमस्ते, धन्यवाद और बाय बाय.

बस, आपने ये शब्द बोले तो फ़्राँसीसी को खुशी होती है कि कम से कम इसने हमारी भाषा बोलने की कोशिश तो की. यहाँ तक कहानी मेरे हाथ में थी, मेरी पकड़ में थी.

लेकिन दो टैक्सी ड्राइवरों ने मेरी सोच बदल दी. एक मुझे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण से ठीक पहले मार्से के सोफ़ीटेल होटेल छोड़ रहा था.

मैंने ख़ुद देखा उसके मीटर पर 14 यूरो लिखा था लेकिन दस सेकेंड बाद जैसे ही गाड़ी रुकी तो बिल 20 यूरो का था. ज़ाहिर है, उसने मीटर से छेड़खानी की थी.

मैंने उसे कहा कि अभी तो मीटर 14 यूरो दिखा रहा था जिसपर वो हाथ हिलाहिलाकर फ़्रेंच में कुछ बोलकर नाराज़गी व्यक्त करने लगा.

मेरे लिए रुककर लड़ना संभव नहीं था इसीलिए कुछ हील हुज्जत के बाद मैंने उसे पैसे थमाकर प्रधानमंत्री का भाषण कवर करने के लिए कूच किया.

बात पैसे की नहीं विश्वास की थी. उसने समझ लिया कि इसकी फ़्रेंच तीन शब्दों तक सीमित है इसीलिए वो मुझे बेवकूफ़ बना सकता है.

नहीं चला जादू

उसी शाम दूसरा झटका लगा. एक टैक्सी ड्राइवर को समझाया कि मुझे होटल जाना है और फिर स्टेशन.

मैंने उसे पता भी बताया, लेकिन भाषा का ही कुछ हेर फेर था.

मुझे लगा कि मैंने उसे समझा दिया है कि मुझे कहाँ जाना है और फ़्रेंच में दिए गए उसके जवाब से भी लगा कि वो समझ गया है लेकिन जब कुछ देर तक कहीं नहीं पहुँचे तो फिर मैंने उसे अंग्रेज़ी में समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन न वो मुझे समझ सका न मैं उसे.

वो मुझे किसी और ही होटल तक ले गया. 14 यूरो का और नुक्सान हो गया, समय बर्बाद हुआ सो अलग. तभी मुझे समझ में आया कि मैं क्या कर सकता हूँ.

मेरे होटल की रिसेप्शनिस्ट अंग्रेज़ी और फ़्रेंच दोनों बोलती है. मैंने उसे फ़ोन लगाकर समझाया कि मुझे कहाँ कहाँ जाना है.

फिर रिसेप्शनिस्ट ने मोबाइल पर ही टैक्सी ड्राइवर को फ़्रेंच में समझाया. आख़िरकार मैं ट्रेन स्टेशन पहुँच तो गया लेकिन भाषा न समझ पाने की इस आपाधापी में मेरी ट्रेन छूट गई.

इन दो घटनाओं ने मेरा विश्वास कुछ कम कर दिया है. मेरे तीन जादुई शब्दों -- बॉन ज़्योर, मेर्सी, ऑग़्वा यानि नमस्ते, धन्यवाद और बाय बाय की सीमाएँ समझ में आ गईं.

सोचता हूँ -- फ़्लाइट में एक 25 यूरो का ट्राँस्लेटर मिल रहा था. बस, उसमें वाक्य डालो और वो फ़्रेंच या जर्मन भाषा का वाक्य आपको बता देता!

फ़्राँस या जर्मनी की अगली यात्रा के पहले मैं वो ट्राँस्लेटर ज़रूर ख़रीद लूँगा.

तब तक के लिए ऑग़्वा.

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