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परमाणु समझौता प्रतिनिधि सभा में पारित

By ब्रजेश उपाध्याय
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दोनों सरकारों को इस समझौते को लेकर बहुत सी राजनीतिक और कूटनीतिक अड़चनों का सामना करना पड़ा है
अमरीकी संसद की प्रतिनिधि सभा ने असैन्य परमाणु समझौते को 117 के मुक़ाबले 298 मतों से पारित कर दिया है. अब इसे सीनेट को भेजा जाएगा.

अब इसे उच्च सदन यानी सीनेट की मंज़ूरी के लिए भेजा जाएगा और संभावना है कि अगले हफ़्ते इस पर मत विभाजन हो.

शनिवार को हुए इस फ़ैसले के बाद अब यह लगभग तय हो गया है कि यह समझौता राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल में ही लागू हो जाए.

बहुत विवाद और अड़चनों के बीच यह समझौता इस पड़ाव तक पहुँचा है.

जुलाई 2005 में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति बुश के बीच पहली बार इस समझौते पर सहमति बनी थी.

बाधा पार

इस समझौते को प्रतिनिधि सभा की मंज़ूरी को कई विशेषज्ञ बुश प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे थे हालांकि सभी का मत था कि आख़िरकार इसे मंज़ूरी मिल जाएगी.

इस विधेयक पर शुक्रवार को गर्मागर्म बहस हुई थी और एक प्रमुख डेमोक्रैट सांसद की आपत्ति के बाद मत विभाजन एक दिन के लिए टाल दिया गया था.

शनिवार को इस पर मत विभाजन हुआ और प्रतिनिधि सभा ने इसे दो तिहाई बहुमत से पारित कर दिया.

298 सांसदों ने इसके पक्ष में मतदान किया जबकि 117 ने इसके विरोध में मत डाले. एक सांसद ने अपना मत किसी भी पक्ष में नहीं डाला.

हालांकि एक सांसद ने इस निर्णय पर अपनी आपत्ति भी दर्ज करवाई है. विशेषज्ञों का कहना है कि अब सीनेट इस विधेयक पर चर्चा शुरु करने से पहले इस सांसद से बात करेगी.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस आपत्ति को बड़ी बाधा नहीं माना जाना चाहिए.

संसद के दोनों सदनों की मंज़ूरी परमाणु समझौते के लिए आख़िरी पड़ाव है और अगले हफ़्ते यदि सीनेट इसे मंज़ूरी दे देती है तो फिर इसे लागू किया जा सकता है.

समर्थन और आपत्तियाँ

भारत-अमरीका परमाणु समझौते के संबंध में विधेयक को गुरुवार को अमरीकी प्रतिनिधि सभा में संशोधनों के साथ पेश किया गया था.

सीनेट की समिति के मंज़ूर विधेयक के संस्करण के अनुसार भारत के परमाणु परीक्षण करने की स्थिति में परमाणु आपूर्तिकर्ता देश परमाणु उपकरण, सामग्री और तकनीक के हस्तांतरण पर रोक लग जाएगी.

इस संबंध में जब भारतीय विदेश सचिव शिवशंकर मेनन का कहना था कि भारत को 123 समझौते से मतलब है, बाकी ये अमरीका का आंतरिक मामला है.

शुक्रवार को प्रतिनिधि सभा में इस विधेयक पर जमकर बहस हुई थी.

लेकिन मत विभाजन से पहले डेमोक्रैट सांसद एडवर्ड मर्की ने आपत्ति लगा दी थी कि मत विभाजन रिकॉर्ड पर होना चाहिए.

भारत इस असैन्य परमाणु समझौते को दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम बता रहा है

अमरीकी संसद के नियमों के अनुसार इसका मतलब यह था कि अब इस विधेयक पर मत डालने वाले हर सांसद का मत रिकॉर्ड किया जाए कि किसने समर्थन में वोट दिया और किसने विरोध में.

अगर रिकॉर्ड में वोट नहीं डालना होता तो पक्ष और विपक्ष के वोट गिनकर ही काम चल जाता.

बहुत से डेमौक्रैट सांसद इसका विरोध में रहे और उनका कहना था कि भारत के साथ इस तरह का समझौता करने के बाद पाकिस्तान, ईरान और उत्तर कोरिया को परमाणु हथियारों की होड़ से रोकना संभव नहीं होगा.

एडवर्ड मर्की का कहना था कि पाकिस्तान में एक्यू ख़ान जैसे लोग रहते हैं और वहाँ अल-क़ायदा भी है.

उनका तर्क था कि भारत के साथ समझौता होने के बाद पाकिस्तान भी परमाणु होड़ में शामिल हो जाएगा तो इससे दुनिया के लिए ख़तरा पैदा हो जाएगा.

लेकिन इसका समर्थन करने वाले सांसदों का कहना था कि यह समझौता इसलिए अच्छा है क्योंकि इसके ज़रिए भारत-अमरीका के रिश्ते मज़बूत होंगे और भारत परमाणु अप्रसार के दायरे में आ जाएगा.

उनका कहना था कि ऐसा इसलिए होगा क्योंकि इसके बाद भारत के दो तिहाई परमाणु संयंत्र अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की निगरानी में आ जाएगा.

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