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परमाणु क़रारः होठों से प्याले तक की दूरी

By ब्रजेश उपाध्याय
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बुश प्रशासन चाहता है कि मनमोहन सिंह की यात्रा के दौरान ही समझौता हो जाए
अमरीकी सीनेट की विदेश मामलों की समिति ने भारत-अमरीका परमाणु समझौते को मंज़ूरी दे दी है पर सीनेट में समझौते का पारित होना बाक़ी है.

इसके साथ ही भारत अमरीका परमाणु क़रार के लिए एक द्वार और खुल गया है. पर जिसे हम मुहावरे की भाषा में होठों से प्याले तक की दूरी कहते हैं, वो अभी भी बची हुई है.

वजह है सीनेट में इस प्रस्ताव पर प्रतीक्षित मतदान और मतदान में इस प्रस्ताव के पारित होने तक सबकुछ हरा-हरा ही नज़र नहीं आता.

हालांकि विदेश मामलों की समिति में इस समझौते पर मतदान हुआ और समझौते को 2 के मुक़ाबले 19 वोट से मंज़ूरी मिली.

अब केवल अमरीकी संसद में इस प्रस्ताव पर मतदान की प्रक्रिया बाकी है.

वर्तमान संसद का समापन 26 सितंबर को हो रहा है और बुश प्रशासन को अमरीकी सांसदों को राज़ी करना होगा कि वे सत्रावसान से पहले ही इस समझौते को मंज़ूरी दे दें.

अमरीकी संसद में अमूमन ऐसे समझौतों को पारित करने के लिए 30 दिनों का समय दिया जाना होता है.

इस दौरान समझौतों पर बहस होती है और फिर मतदान से उसका भविष्य तय होता है पर अमरीकी संसद का वर्तमान सत्र 26 सितंबर को समाप्त हो रहा है.

ऐसे में सत्र के समापन से पहले मतदान करा पाना और प्रस्ताव को पारित करा ले जाना आसान काम नहीं है.

यह राह नहीं आसां...

संसद की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष हैं बाइडन जो कि डेमोक्रेट पार्टी के उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं. उन्होंने भी इस समझौते का पक्ष लेते हुए कहा कि सीनेट इसे जल्द से जल्द पास कर दे.

पर क्या इतने कम समय में ऐसा हो सकता है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है.

इस दिशा में कई तरह के प्रयास हो रहे हैं. एक प्रयास यह भी है कि समझौते को संसद के कॉन्टीन्यूइंग रिज़ॉल्यूशन बिल के साथ जोड़ दिया जाए.

इस बिल पर हर हाल में मतदान होगा ही इसलिए इस बिल पर मतदान के साथ ही परमाणु समझौते पर भी मतदान हो जाएगा और वो पारित हो सकता है.

दरअसल, कॉन्टीन्यूइंग रिज़ॉल्यूशन बिल वो बिल है जो सत्र के बाद से अगले राष्ट्रपति के चुनाव तक के सरकारी खर्च को मंजूर करता है.

अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो दूसरी संभावना इस बात की बनेगी कि संसद का सत्र एक सप्ताह के लिए बढ़ा दिया जाए पर बुश प्रशासन की कोशिश रहेगी कि मनमोहन सिंह की अमरीका यात्रा के दौरान ही यह प्रस्ताव पारित हो जाए क्योंकि इसका सांकेतिक महत्व भी होगा.

इन्हीं कोशिशों के बीच बुधवार को भारतीय मूल के कुछ प्रभावशाली लोग अमरीकी सीनेट के सदस्यों के लिए एक रिसेप्शन का आयोजन भी कर रहे हैं जहाँ सांसदों से समझौते के पक्ष में मतदान करने के लिए कहा जाएगा.

पर चाय के प्याले और होठ के बीच अभी भी कुछ बाधाएं तो हैं.

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