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    क़रार के बाद कारोबार की तैयारी

    By Staff
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    असैनिक परमाणु समझौते को हरी झंडी मिलता देख देश-विदेश की कई कंपनियाँ भारत के परमाणु बिजली कारोबार में दस्तक देने के लिए तैयार हो रही हैं.

    हालाँकि परमाणु ऊर्जा का विरोध करने वाले रेडियोधर्मिता से जुड़े ख़तरों और रिएक्टरों से बनने वाली बिजली की क़ीमत का मुद्दा उठा रहे हैं.

    भारत-अमरीका असैनिक परमाणु समझौते को परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह (एनएसजी) से मंज़ूरी मिल चुकी है और संभावना जताई जा रही है कि अमरीकी कॉंग्रेस भी कुछ दिनों के भीतर ही इस पर मुहर लगा देगी.

    हालाँकि एनएसजी से मंज़ूरी मिलने के बाद भारत इस समूह के दूसरे देशों के साथ परमाणु व्यापार करने के लिए स्वतंत्र हो चुका है.

    भारत में अभी न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) की अगुआई में सात रिएक्टरों की 17 इकाईयों से चार हज़ार 120 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है.

    निजी क्षेत्र को अनुमति पर विचार

    भारत में स्थापित बिजली इकाईयों की कुल क्षमता एक लाख 45 हज़ार 587 मेगावाट है जिसमें परमाणु बिजली की भागीदारी मात्र 2.9 फ़ीसदी है.

    किसका कितना हिस्सा थर्मल पावर - 93 हज़ार मेगावाट (64 प्रतिशत) पनबिजली - 36 हज़ार मेगावाट (24 प्रतिशत) परमाणु बिजली- 4120 मेगावाट (तीन प्रतिशत)

    हालाँकि इन इकाईयों की कुल स्थापित क्षमता भी माँग को पूरा करने में असमर्थ है. यही नहीं भारत के लगभग 40 हज़ार गाँवों में अभी भी बिजली नहीं पहुँच पाई है.

    इसका हवाला देते हुए भारत सरकार का कहना है कि परमाणु समझौते के बाद बिजली क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी.

    अभी तक भारत में निजी कंपनियों को परमाणु बिजली संयंत्र लगाने की अनुमति नहीं है. परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) से जुड़े स्वप्नेष मल्होत्रा बताते हैं, "अभी भारत में सिर्फ़ वही कंपनियाँ परमाणु रिएक्टर लगा सकती हैं जिनमें सरकार की कम से कम 51 फ़ीसदी भागीदारी हो."

    लेकिन सरकार इस नीति में बदलाव करने जा रही है. केंद्रीय अक्षय ऊर्जा मंत्री विलासराव मुत्तेमवार कहते हैं, "परमाणु समझौते के बाद निजी क्षेत्र को अनुमति देने की बात पर विचार चल रहा है. मुझे लगता है कि इसे मंज़ूरी मिल ही जाएगी."

    उनका कहना है, "हमने वर्ष 2020 तक परमाणु रिएक्टरों से बीस हज़ार मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया था, लेकिन परमाणु समझौते के बाद ये लक्ष्य उससे पहले ही प्राप्त किया जाएगा."

    कंपनियों की तैयारी

    इस लिहाज़ से सरकारी क्षेत्र की कंपनियों को समझौते का लाभ सबसे पहले मिलेगा. स्वप्नेष मल्होत्रा कहते हैं, "समझौते से यूरेनियम आयात करने का रास्ता साफ़ होगा और इसका फ़ायदा छह महीने के भीतर हमारे मौजूदा रिएक्टरों को पहुँच सकता है जो ईंधन की कमी के कारण क्षमता से कम बिजली पैदा कर रहे हैं."

    फ़्रांसीसी कंपनी आरेवा के साथ कुछ भारतीय कंपनियों की बात चल रही है

    सरकारी क्षेत्र में एनपीसीआईएल के अलावा भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) और राष्ट्रीय ताप बिजली निगम (एनटीपीसी) इस मौक़े को भुनाने के लिए तैयार हैं क्योंकि इन्हें सरकार से कोई मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं है.

    दूसरी ओर निजी क्षेत्र में रिलायंस पावर, जीएमआर इंफ़्रास्ट्रक्चर्स, रोल्टा इंडिया, टाटा पावर जैसी कंपनियों ने अपनी तैयारी अभी से शुरू कर दी है.

    भेल के मुख्य प्रबंध निदेशक के रवि कुमार कहते हैं, "निश्चित रूप से ये समझौता बिजली संयंत्रों के उपकरण बनाने वाली कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा करेगा और भेल की इसमें सक्रिय भूमिका होगी."

    उन्होंने कहा कि भेल ने परमाणु बिजली क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ तकनीकी साझीदारी पर बातचती शुरु कर दी है.

    बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अमरीका की जेनरल इलेक्ट्रिक्स, वेस्टिंग हाउस, फ़्रांस की आरेवा और रूसी कंपनी रॉसऑटमॉस भारत में निवेश करने की इच्छा जता चुकी हैं.

    दूर है सफ़र

    लेकिन निजी कंपनियों को वास्तव में परमाणु बिजली रिएक्टर स्थापित करने में काफी समय लगेगा.

    अमरीकी पत्रिका साइंस के पत्रकार पल्लव बागला कहते हैं, "भारतीय निजी कंपनियों को परमाणु बिजली के क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं है. एक तो उन्हें सरकार से मंज़ूरी मिलने में समय लगेगा और अगर मिली भी तो उन्हें रिएक्टर बनाने में आठ साल का समय लगेगा."

    जीएमआर इंफ़्रा के महाप्रबंधक विजय माहेश्वरी कहते हैं, "अभी कुछ भी कहना ज़ल्दबाज़ी होगी. हम निजी क्षेत्र के लिए नियम क़ानूनों का इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन हमारी तैयारी भी है."

    रिलायंस पावर ने तो बकायदा वीके चतुर्वेदी को अपना परमाणु ऊर्जा सलाहकार नियुक्त किया है जो एनपीसीआईएल के पूर्व चेयरमैन हैं. ऐसी ख़बरें भी हैं कि रिलायंस पावर फ़्रांसीसी कंपनी आरेवा के साथ समझौता करने वाली है, हालाँकि कंपनी ने इसकी पुष्टि करने से इनकार कर दिया.

    क्या होगी क़ीमत?

    फ़िलहाल भारत में सरकारी रिएक्टरों से जो बिजली मिलती है, उस पर सब्सिडी होती है लेकिन जब निजी कंपनियाँ बाज़ार में उतरेंगी तो उनका ध्यान मुनाफ़े पर होना लाज़िमी है.

    एनपीसीआईएल के पूर्व चेयरमैन ए गोपालकृष्णन स्पष्ट कहते हैं, "मुझे जो अनुभव है उसके आधार पर कह सकता हूँ परमाणु बिजली ढाईगुणा महँगी होगी. इस समझौते से सिर्फ़ कॉर्पोरेट घरानों को फ़ायदा पहुँचने वाला है. आम जनता के हित में यह कतई नहीं है."

    परमाणु बिजली की क़ीमत और सुरक्षा पर सवाल उठाए जा रहे हैं

    वो कहते हैं, "परमाणु ऊर्जा विभाग अपनी विफलता छिपाने के लिए कह रहा है कि यूरेनियम की कमी से स्थापित रिएक्टरों में दिक्कत हो रही है लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारे देश में दस हज़ार मेगावाट बिजली उत्पादन के लायक यूरेनियम मौजूद है जिसका दोहन नहीं हो रहा है."

    डीएई के स्वप्नेष मल्होत्रा बताते हैं, "परमाणु रिएक्टर लगाने में प्रति मेगावाट पाँच से छह करोड़ रूपए की लागत आएगी."

    इस लिहाज़ से 220 मेगावाट क्षमता वाला एक रिएक्टर लगाने के लिए लगभग 13 अरब रूपयों की ज़रूरत होगी.

    पत्रकार पल्लव बागला कहते हैं कि कारोबार के लिहाज़ असैनिक परमाणु समझौते के अमल में आने के बाद अमरीका, फ़्रांस और रूस की कंपनियों को अगले छह-आठ वर्षों में अरबों डॉलर के ऑर्डर मिल सकते हैं.

    सुरक्षा का सवाल

    अक्षय ऊर्जा मंत्री विलासराव मुत्तेमवार भी मानते हैं कि परमाणु रिएक्टर की लागत ज़्यादा होती है लेकिन वो इसे पर्यावरण से जोड़ कर देखते हैं.

    केंद्र सरकार निजी कंपनियों की भागीदारी पर विचार कर रही है

    उनका कहना है, "हमें नहीं भूलना चाहिए परमाणु बिजली स्वच्छ ऊर्जा है. थर्मल संयंत्र से जितना कार्बन उत्सर्जन होता है और उससे जो हानि होती है वो ज़्यादा ख़तरनाक है. पूरे विश्व समुदाय की चिंता ग्लोबल वार्मिंग है. इस लिहाज़ से परमाणु बिजली बेहतर है."

    एनपीसीआईएल के पूर्व चेयरमैन ए गोपालकृष्णन और पत्रकार पल्लव बागला चेर्नोबिल की घटना का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि भारत सरकार के लिए परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा बड़ी चुनौती होगी.

    लेकिन अक्षय ऊर्जा मंत्री विलासराव मुत्तेमवार इस आशंका को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहते हैं, "उस घटना के बाद काफ़ी तकनीकी विकास हो चुका है. हमें असैनिक समझौते के बाद विकसित देशों की तकनीक भी तो मिलेगी."

    सुरक्षा के कड़े मानदंडों को देखते हुए पल्लव बागला का मानना है कि किसी निजी कंपनी को रिएक्टर के लिए मंज़ूरी प्राप्त करने में काफ़ी समय लग सकता है.

    उनका कहना है कि रुसी कंपनियों को तुरंत फ़ायदा मिल सकता है क्योंकि वहाँ की परमाणु ऊर्जा कंपनियाँ रूस के नियामक संस्थान से मंज़ूरी लेने के बाद ही इस कारोबार में उतरती हैं.

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