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'कुष्ठ रोगियों के चुनाव लड़ने पर रोक सही'

By Staff
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भारत में कुष्ठ रोग को लेकर बहुत सी भ्रांतियाँ हैं
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया है कि कुष्ठ रोगियों को नगरपालिका के चुनाव लड़ने से रोकने वाला उड़ीसा का क़ानून सही है.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उन दो लोगों ने दाख़िल किया था जो 2003 में उड़ीसा में एक स्थानीय निकाय का चुनाव जीते थे लेकिन उन्हें बाद में इन पदों के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया क्योंकि राज्य में ऐसा क़ानून लागू है.

कुष्ठ रोग के ख़िलाफ़ सामाजिक अभियान चलाने वाले संगठन सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले पर हतप्रभ हैं और उनका कहना है कि कुष्ठ रोगियों के ख़िलाफ़ इस तरह का भेदभाव करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.

दुनिया भर में जितने कुष्ठ रोगी हैं उनका लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा भारत में है.

भारत में हालाँकि सरकार और अनेक संस्थाएं कुष्ठ रोग के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं और सरकार दावा करती है कि कुष्ठ रोग का उन्मूलन कर दिया गया है.

लेकिन ग़ैर-सरकारी संस्थाओं और संगठनों का कहना है कि भारत में हर साल लगभग एक लाख लोगों को कुष्ठ रोग होता है.

अयोग्यता

उड़ीसा नगरपालिका क़ानून 1950 में ऐसे लोगों के कोई पद संभालने पर रोक लगाई गई है जिन्हें या तो टीबी या कुष्ठ रोग हो.

सुप्रीम कोर्ट के जज सीके ठक्कर और डीके जैन ने अपने फ़ैसले में कहा है, "विधायिका ने यह क़ानून बनाने में अपनी बुद्धिमत्ता से काम लेते हुए यह बात भी ध्यान में रखी कि इन बीमारियों को अन्य लोगों में फैलने के ख़तरे से बचने के लिए इस क़ानून की ज़रूरत है."

उड़ीसा के इस क़ानून के तहत अयोग्य ठहराए गए इन दो पार्षदों ने उड़ीसा के उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था लेकिन न्यायालय ने फ़ैसला दिया था कि यह फ़ैसला भेदभावकारी नहीं है.

भारत में कुष्ठ रोगियों को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है

सुप्रीम कोर्ट ने भी उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को सही ठहराते हुए कहा है, "हमें उच्च न्यायालय के फ़ैसले में ऐसी कोई बात नज़र नहीं आती जो क़ानून के ख़िलाफ़ लगे या जिस दख़लअंदाज़ी की ज़रूरत हो."

लेकिन कुष्ठ रोग के उन्मूलन के लिए काम करने वाले संगठन और कार्यकर्ता सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से ख़ासे नाराज़ हैं.

ऐसे ही एक संगठन सासाकावा इंडिया लेप्रसी फाउंडेशन की विनीता शंकर का कहना था, "यह फ़ैसला झटका देने वाला है. यह हमारी समझ से बाहर है कि सुप्रीम कोर्ट भला इस तरह की बात कैसे कह सकता है. ऐसा कोई वैज्ञानिक आधार मौजूद नहीं है कि कुष्ठ रोगी के ख़िलाफ़ कोई भेदभाव किया जाए. सुप्रीम कोर्ट का आदेश समुचित जानकारी नहीं मिलने की वजह से ऐसा है."

विनीता शंकर का कहना था कि भारत संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव के एक हस्ताक्षरकर्ता देश है जिसमें कहा गया है कि कुष्ठ रोगियों के ख़िलाफ़ किसी भी तरह का भेदभाव समाप्त होना चाहिए.

विनीता शंकर ने कहा, "भारत सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय कुष्ठ रोगियों के ख़िलाफ़ भेदभाव मिटाने में काफ़ी बढ़चढ़कर काम करते रहे हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों को लिखा भी है कि ऐसे पुराने क़ानूनों को बदला जाए जो कुष्ठ रोग से संबंधित हैं क्योंकि अब कुष्ठ रोग छूत की बीमारी नहीं है."

कुष्ठ रोग दुनिया के सबसे पुराने रोगों में से एक है और भारत में इस बीमारी का लिखित संदर्भ 600 ईसा पूर्व में मिलता है.

हालाँकि कुष्ठ रोग आसानी से नहीं फैलता और इसके फैलने के बहुत ही असाधारण हालात होते हैं मगर भारत में आम धारणा है कि कुष्ठ रोगी को देखने भर या छूने भर से ही यह बीमारी हो सकती है जिसकी वजह से कुष्ठ रोगी को समाज में हर तरफ़ भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

भारतीय समाज के कुछ हिस्सों में तो ऐसी धारणा भी प्रचलित है कि कुष्ठ रोग एक दैवी अभिशाप है.

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