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आतंकवाद के मुकाबले के लिए समूचे सुरक्षा तंत्र को सुधारना होगा : ब्रजेश मिश्रा

By Staff
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नई दिल्ली, 24 सितम्बर (आईएएनएस)। देश के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा का मानना है कि देश में आतंरिक सुरक्षा की मौजूदा स्थिति बेहद खराब है। इसके लिए वे पूरे शासन तंत्र को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका मानना हैं कि शासन तंत्र का पतन हो गया है और वह इतना प्रभावहीन हो चुका है कि लोगों को उस पर भरोसा ही नहीं रहा। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासनकाल (1998-2004) के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधान सचिव भी रहे ब्रजेश मिश्रा से आतंरिक सुरक्षा को लेकर देश के मौजूदा हालात पर आईएएनएस ने विस्तार से बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश:

नई दिल्ली, 24 सितम्बर (आईएएनएस)। देश के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा का मानना है कि देश में आतंरिक सुरक्षा की मौजूदा स्थिति बेहद खराब है। इसके लिए वे पूरे शासन तंत्र को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका मानना हैं कि शासन तंत्र का पतन हो गया है और वह इतना प्रभावहीन हो चुका है कि लोगों को उस पर भरोसा ही नहीं रहा। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासनकाल (1998-2004) के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधान सचिव भी रहे ब्रजेश मिश्रा से आतंरिक सुरक्षा को लेकर देश के मौजूदा हालात पर आईएएनएस ने विस्तार से बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश:

सवाल : देश की आंतरिक सुरक्षा की मौजूदा स्थिति को आप कैसे आंकते हैं?

जवाब : स्थिति तो बहुत खराब है। पिछले चार-पांच सालों में देश के अलग-अलग कोने में, बड़े-बड़े शहरों में आतंकवादियों ने हमले किए हैं। पहले तो यह सब कश्मीर में ही होता था, लेकिन अब सारे देश में हो रहा है। हर जगह धमाके हो रहे हैं। इसलिए यह तो कहना लाजिमी है कि आंतरिक सुरक्षा की स्थिति बेहद खराब है।

सवाल : तो क्या आप मानते हैं कि हमारी आंतरिक सुरक्षा का पूरा ढांचा असफल हो गया है?

जवाब : नहीं, यह कहना उचित नहीं है। जितनी भी हमारी खुफिया एजेंसियां है, उन पर आरोप लगाना आसान है। आतंकवादी घटनाएं पहले भी होती थी और आज भी हो रही हैं। कारगिल के समय भी खुफिया तंत्र की असफलता का आरोप लगा था। ये तो पुरानी बातें हैं। हां, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जो हमारी खुफिया एजेंसियां हैं, उनकी कार्यशैली का स्तर घटा है। लेकिन यह सिर्फ खुफिया एजेंसी का ही मामला नहीं है। सवाल पुलिस का भी है। हमारी पुलिस की जो स्थिति है। वह बदतर हो चुकी है। उसकी कार्यशैली और ट्रेनिंग को और प्रभावी बनाना पड़ेगा। इसके अलावा जो मुहल्ला है, जहां से खबर मिलनी चाहिए। वह ठोस खबर होनी चाहिए। लेकिन यह नहीं हो रहा है। क्योंकि सड़क पर जो पुलिस वाला तैनात है। वह भ्रष्टाचार में लिप्त रहता है। आज तो सिर्फ सतही जानकारियां आती हैं कि दिल्ली में विस्फोट होने वाला है, अहमदाबाद में होने वाला है। लेकिन ठोस खबरें नहीं आती कि विस्फोट कब और कहां होना है। इसके अलावा, कुछ खुफिया एजेंसियां हैं जिनका राजनीतिक इस्तेमाल होता है। इन एजेंसियों के लोग लगे रहते हैं कि किस पार्टी में क्या चल रहा है। कौन किसके खिलाफ है और कौन क्या बोल रहा है।

सवाल : ऐसी सूरत में क्या आपको लगता है कि सख्त कानून बनाए जाने की आवश्यकता है?

जवाब : इसमें कोई शक नहीं कि आपको कानून सख्त बनाना पड़ेगा। गुजरात ने चार बार आतंकवाद निरोधक कानून (गुजकोक) पास किया। लेकिन केंद्र उसे रोक कर रखे हुए हैं। गुजरात में चुनी हुई विधानसभा और सरकार है। उसको आप दरकिनार कर रहे हैं। कहा यह जाता है कि यह कानून मानवाधिकारों के खिलाफ है। अरे भई जो दिल्ली में मरे हैं क्या उनके मानवाधिकार नहीं थे। कोई जवाब दे उनके परिजनों को। उन्हें कुछ लाख रुपये देकर आपने उनके मानवाधिकार बहाल कर दिए क्या? कलाम साहब ने भी पिछले दिनों सख्त कानून बनाने की बात कही थी तो क्या उस इंसान को मानवाधिकारों की फिक्र नहीं है।

सवाल : संघीय जांच एजेंसी बनाने या सीबीआई का पुनर्गठन या फिर आंतरिक सुरक्षा के लिए अलग मंत्रालय के गठन की चर्चा हो रही है। आपकी क्या राय है?

जवाब : जहां तक संघीय एजेंसी का सवाल है, वह भी होनी चाहिए। लेकिन एजेंसी भी सफल नहीं हो सकती, जब तक कि केंद्र का राज्यों से तालमेल न हो। सिर्फ एजेंसी बना देने से काम नहीं चलेगा। सख्त कानून भी होने ही चाहिए। लेकिन पुलिस सुधार के बगैर कुछ भी कारगर नहीं हो सकता। इन सबमें राजनीतिक दखलंदाजी खत्म होना बहुत जरुरी है। पूरे सुरक्षा तंत्र के राजनीतिक इस्तेमाल के खिलाफ लोगों को क्रांति करनी पड़ेगी।

सवाल : भाजपा पोटा बहाल करने की मांग कर रही है?

जवाब : पोटा लाने से कुछ नहीं हो सकता। संघीय एजेंसी के आने से भी कुछ नहीं हो सकता। सिर्फ कानून और एजेंसी से नहीं होगा। इन सभी को एक साथ करना होगा। समूचे सुरक्षा तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करना होगा। पोटा आ जाएगा तो जादू नहीं हो जाएगा। जब तक सब चीजें एक साथ नहीं होंगी, तब तक कुछ नहीं होगा।

सवाल : सब एक साथ करने से क्या आशय है आपका?

जवाब : आम आदमी को शिक्षित करना पड़ेगा। उन्हें पाबंदियों को स्वीकार करना होगा। आम आदमी को बताना होगा कि पाबंदियां आपके भले के लिए हैं। इस मामले में नेताओं को उदाहरण पेश करना चाहिए। जब तक नेता नहीं आगे आएंगे, आम आदमी से क्या उम्मीद करेंगे आप। इसके अलावा आम आदमी को भी सतर्क रहना होगा। उन्हें सतर्क रहने के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए। इसके लिए प्रचार-प्रसार करना होगा। आम आदमी को भी सामने आना पड़ेगा। लोग आज पुलिस से घबराते हैं। लोगों में पुलिस का भय खत्म होना चाहिए। यह सब दीर्घकालीन योजनाएं हैं। एजेंसी व कानून के साथ इन मोचरें पर काम नहीं करेंगे तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई आप हार जाएंगे, जैसे पाकिस्तान हार गया।

सवाल : आंतरिक सुरक्षा के मामले में राजग और संप्रग में से किसके कार्यकाल को बेहतर आकेंगे आप?

जवाब : मैं राजग और संप्रग के चक्कर में नहीं पड़ता। आतंकवाद राष्ट्रीय संकट है। ऐसे समय में दूसरे देशों में सब एकजुट हो जाते हैं। लेकिन अपने यहां कोई संकट होता है तो आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाता है। कारगिल हुआ तो कांग्रेस ने चिल्लाना प्रारंभ कर दिया। हाइजेकिंग (कंधार प्रकरण) हुआ तो भी वे शुरू हो गए। हमारी आदत है कि संकट की स्थिति में हम एक दूसरे के पर आरोप लगाना प्रारंभ कर देते हैं। हमारे चरित्र में ही यह खामी है। राजग के जमाने में भी आतंकवादी हमले हुए। इसको मैं राष्ट्रीय संकट कहता हूं। यह नहीं कह सकते कि राजग के समय सबकुछ ठीक था और अभी ही सब कुछ हो रहा है। सब लोगों को मिलकर काम करना पडेगा। 9/11 के बाद अमेरिका में कोई आतंकवादी वारदात नहीं हुई। क्योंकि वहां आतंकवाद के खिलाफ लोग मिलकर काम कर रहे हैं ।

सवाल : गृहमंत्री की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं ?

जवाब : सरकार की लीडरशीप तो होनी ही चाहिए। उसके बगैर तो काम चल ही नहीं सकता। कौन अच्छा है और कौन बुरा है, मैं इसमें नहीं पडू़ंगा। मैं किसी व्यक्ति विशेष को दोषी नहीं ठहराऊंगा। हर जगह कुछ अच्छे और कुछ खराब लोग होते हैं। कोई भी संगठन हो- वह सामाजिक ही क्यों न हो, राजनीतिक तो छोड़ दीजिए। हमें जो चीजें करनी है वे नहीं हो रही है।

सवाल : इंडियन मुजाहिदीन के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

जवाब : कहा तो जा रहा है कि सिमी का ही अंग है ये। सिमी तो आतंकवादी संगठन है। हमने प्रतिबंध लगाया था अपने जमाने में उस पर।

सवाल : कुछ राजनीतिक दल सिमी का पक्ष ले रहे हैं?

जवाब : जो राजनीतिक दल सिमी का समर्थन करते हैं वे वोट के लिए ऐसा करते हैं। उनको वोट चाहिए इसलिए वे ऐसे बयान देते हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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