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राजशाही पर राजनीति का खेल

By Staff
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ज्ञानेंद्र से सभी अधिकार छीन लिए गए हैं
नेपाल में माओवादियों के नेतृत्व में सरकार तो बन गई है और राजशाही ख़त्म भी हो गई है. लेकिन राजशाही को लेकर लोगों के मन में सवाल भी हैं.

लेकिन राजा बीरेंद्र की हत्या के बाद धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा. माओवादी तो शुरू से ही राजशाही के ख़िलाफ़ थे.

लेकिन राजा बीरेंद्र की हत्या और राजा ज्ञानेंद्र के सिंहासन संभालने के बाद माओवादियों के उस विचार को ज़्यादा से ज़्यादा समर्थन मिलने लगा, जिसमें वे राजशाही को पूरी तरह ख़त्म करने की बात करते थे.

राजनीतिक अस्थिरता के बीच हुए लोकप्रिय आंदोलन का अंत ये हुआ कि राजशाही ख़त्म हो गई. राजा ज्ञानेंद्र नारायण हिटी पैलेस छोड़कर नागार्जुन पैलेस में चले गए हैं.

नारायण हिटी पैलेस के मुक़ाबले नागार्जुन पैलेस काफ़ी छोटा है. राजा लोगों से मिलते तो हैं लेकिन बहुत कम. उनके पर पूरी तरह कतर दिए गए हैं और अब वे आम नागरिक की तरह रह रहे हैं.

सत्ता का केंद्र अब संसद हो गया है और राजा-राजशाही पुरानी बात लगने लगी है.

सवाल

नेपाल में माओवादियों के नेतृत्व में सरकार तो बन गई है और राजशाही ख़त्म भी हो गई है. लेकिन नेपाल में यह सवाल भी क़ायम है कि क्या राजशाही को पूरी तरह ख़त्म करना उचित था?

नेपाल में राजशाही ख़त्म करने के लिए जनता की सीधी राय अभी तक प्रकट नहीं हो पाई है. उस समय जो आंदोलन हुआ था, उसका उद्देश्य राजशाही को पूरी तरह ख़त्म करना नहीं था बल्कि जनता निरंकुशता के ख़िलाफ़ थी
माओवादियों के नेतृत्व में अंतरिम सरकार संविधान बनाने पर काम कर रही है लेकिन देश की शासन व्यवस्था भी उसके हाथ में है. डर यही है कि अगर माओवादियों की सरकार जनता की उम्मीद पर खरा नहीं उतरी, तो राजशाही के समर्थन में नारे लगाने वाले लोगों को एक मुद्दा मिल जाएगा.

राजा ज्ञानेंद्र के प्रत्यक्ष शासन में नेपाल के गृह मंत्री रहे कमल थापा तो यहाँ तक दावा करते हैं कि जनता राजशाही को हटाने के पक्ष में नहीं थी. उनका आरोप है कि राजा को असंवैधानिक तरीक़े से हटाया गया है.

राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी के नेता कमल थापा का कहना है कि राजशाही जाने के बाद नेपाल के सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक परिवेश में जो ख़ालीपन आया है, उसे ठीक से नहीं भरा जा रहा है.

प्रचंड बने हैं नेपाल के नए प्रधानमंत्री

हाल ही में प्रचंड की सरकार के वित्त मंत्री बाबूराम भट्टाराई ने जब बजट पेश किया तो कुछ धार्मिक उत्सवों के लिए दिए जाने वाले सरकारी धन पर रोक लगाने की घोषणा कर दी.

नेपाल के कई हिस्सों में इस पर विरोध शुरू हो गया. अब नेपाल में विश्व हिंदू परिषद का कहना है कि ये सब राजशाही हटाने का नतीजा है.

लेकिन नेपाल मामलों के विशेषज्ञ आनंद स्वरूप वर्मा का कहना है कि ये बातें वही लोग कह रहे हैं जिनके निहित स्वार्थ हैं और जो वहाँ के सामंतवाद से जुड़े रहे हैं.

दूसरी ओर नेपाल में राजशाही के समर्थन में खड़े नेता कमल थापा का कहना है नेपाल में राजशाही ख़त्म करने के लिए जनता की सीधी राय अभी तक प्रकट नहीं हो पाई है. उस समय जो आंदोलन हुआ था, उसका उद्देश्य राजशाही को पूरी तरह ख़त्म करना नहीं था बल्कि जनता निरंकुशता के ख़िलाफ़ थी.

उनका दावा है कि देश की जनता इस बात से नाराज़ है कि राजशाही के बाद से व्यवस्था ठीक से नहीं चल रही है. बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, "नेपाल में राजशाही ख़त्म करने के लिए जनता की सीधी राय अभी तक प्रकट नहीं हो पाई है. उस समय जो आंदोलन हुआ था, उसका उद्देश्य राजशाही को पूरी तरह ख़त्म करना नहीं था बल्कि जनता निरंकुशता के ख़िलाफ़ थी."

दावा

तो क्या नेपाल में राजशाही का प्रासंगिकता पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है, कमल थापा कहते हैं- जिस तरह से राजशाही को ख़त्म किया गया, उससे भी राजशाही की प्रासंगिकता पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है. सिद्धांत रूप में देखिए तो कई जगह राजशाही ख़त्म होने के बाद भी वापस आई है.

इस समय राजशाही के पक्ष में बोलने वालों का कोई जनाधार नहीं है. नेपाल भले ही हिंदू राष्ट्र रहा हो लेकिन पिछले 50 सालों के दौरान यहाँ अलग-अलग वामपंथी धाराएँ भी रही हैं. ये धाराएँ इतनी मज़बूत रही हैं कि कभी सांप्रदायिक शक्तियों को, कभी धार्मिक कट्टरपंथियों को उन्होंने पनपने नहीं दिया. इसिलए विश्व हिंदू परिषद जैसे संगࢠनों की नेपाल में कुछ नहीं चलती है
नेपाल में राजशाही के पक्ष में वहाँ की विश्व हिंदू परिषद भी है. परिषद के पूर्व अध्यक्ष भरत केशर सिंह तो इतने नाराज़ हैं कि वे देश की शांति व्यवस्था और स्थिरता पर सवाल उठा रहे हैं.

नाराज़ केशर सिंह कहते हैं- ये राज्य राजा ने खड़ा किया है. राजा का क्या दोष था कि 250 वर्षों की गौरवमय परंपरा को ख़त्म किया जा रहा है.

केशर सिंह कभी-कभी राजा से मिलने जाते हैं. लेकिन राजा के वैभव को क़रीब से देखने वाले केशर सिंह को भी इसका मलाल है कि उनके राजा के साथ ऐसे सलूक किया गया.

नेपाल मामलों के विशेषज्ञ आनंद स्वरूप वर्मा इन आवाज़ों को बहुमत की आवाज़ नहीं मानते. उनका कहना है कि नेपाल की जनता में इतना धैर्य है कि वे माओवादियों के नए नेतृत्व की मुश्किलें समझ सकें.

नेपाल में लोकतंत्र का ख़ूब स्वागत हुआ था

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "इस समय राजशाही के पक्ष में बोलने वालों का कोई जनाधार नहीं है. नेपाल भले ही हिंदू राष्ट्र रहा हो लेकिन पिछले 50 सालों के दौरान यहाँ अलग-अलग वामपंथी धाराएँ भी रही हैं. ये धाराएँ इतनी मज़बूत रही हैं कि कभी सांप्रदायिक शक्तियों को, कभी धार्मिक कट्टरपंथियों को उन्होंने पनपने नहीं दिया. इसिलए विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों की नेपाल में कुछ नहीं चलती है."

वे राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी के दावे को सही नहीं ठहराते कि राजशाही को जनता का समर्थन हासिल था. उनका कहना है कि अगर राजा को इतना समर्थन मिलता तो वे नारायण हिटी पैलेस क्यों ख़ाली करते.

लेकिन वे भी मानते हैं कि माओवादियों के विफल होने पर राजा के आगे आने की संभावना है और इसी संभावना के कारण विश्व हिंदू परिषद और कई राजनीतिक पार्टियाँ राजशाही के प्रति नाउम्मीद नहीं हुई हैं.

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