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जामिया नगर का सच ?

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क्षेत्र के लोगों के मन में अनेक सवाल हैं
दिल्ली के मुस्लिम बाहुल्य जामिया नगर में शुक्रवार को हुई मुठभेड़ के बारे में धटनास्थल के पड़ोस में रहते लोगों और अन्य स्थानिए निवासियों ने उठाए कई सवाल

मैंने जिन भी लोगों से बात की वे लोग पुलिस के मुठभेड़ के बयान को 'फ़र्ज़ी' मानते हैं और पुलिस कार्रवाई पर अनेक सवाल उठाते हैं. इन सवालों के फ़िलहाल संतोषजनक जवाब सामने नहीं आए हैं.

मैंने सबसे पहले कोशिश की किसी ऐसे शख़्स से बात करने की जिस ने पुलिस कार्रवाई या उससे संबंधित घटनाओं को देखा हो.

संयोग से जिस मकान की चौथी मंजिल पर चरमपंथी रहते थे उसी मकान की पहली मंजिल पर रहने वाली एक महिला से मेरी बातचीच हुई.

उन्होंने कहा, "मैंने ठीक ग्यारह बजे सीढ़ियों से सादे कपड़ो में कुछ लोगों को ऊपर जाते देखा था. और फिर कुछ ही मिनट बाद गोलियों की आवाज़ आने लगी जो तक़रीबन 15 से 20 मिनट तक चली. थोड़ी ही देर बाद मैंने सीढ़ी से आते जाते पुलिस वालों की आवाज़ें सुनी लेकिन मैं समझ नहीं पाई कि वो क्या कह रहे थे."

उस मकान के पीछे वाले मकान की दूसरी मंजिल पर रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया, "तक़रीबन 10.30 और 11 बजे के बीच हमने किसी के चीख़ने चिल्लाने की आवाज़ें सुनी और ऐसा लग रहा था कि कुछ लोग आपस में लड़ रहे हैं. उसके 15-20 मिनट बाद हमने गोलियों की आवाज़ें सुनी."

उसी परिवार की एक महिला ने बताया, "मैंने पुलिस को कमरे के बाहर दूसरी मंजिल पर गोलियां चलाते देखा. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर वो लड़के कमरे में थे तो पुलिस को कमरे के बाहर फ़ायरिंग करने की ज़रूरत कयों पड़ी. थोड़ी देर बाद पुलिस ने खिड़की के शीशे तोड़ दिए और सीढ़ियों पर रखे गमले भी तोड़े."

ये उस घर के पड़ोस में बसे वो लोग थे जो पुलिस कर्मियों और उनकी कार्रवाई को देखने का दावा करते हैं. इनके अलावा कुछ और दूसरे लोग भी सारी घटना को शक की निगाह से देखते हैं और कुछ सवाल करते हैं.

भागने का रास्ता नहीं

उस मकान से भागना ना मुमकिन है क्योंकि इमारत में दाख़िल होने और बाहर जाने का रास्ता एक ही है. फिर दो लड़के कैसे भाग गए?

स्थानिए नेता आसिफ़ मौहम्मद ख़ान का कहना है कि जहां मुठभेड़ हुई वहां से भागना भी मुश्किल है.

वो कहते हैं, "उस मकान से भागना नामुमकिन है क्योंकि इमारत में दाख़िल होने और बाहर जाने का रास्ता एक ही है. फिर दो लड़के कैसे भाग गए? और एक अन्य लड़के ज़ीशान ने एक निजी चैनल पर प्रसारण के दौरान आने की हिम्मत कैसे जुटाई. अगर वो चरमपंथी था और भागने में कामयाब हो गया था तो वो सब के सामने क्यों आएगा?"

ज़्यादातर लोगों का कहना था कि समर्पण करने वाले ज़ीशान को भी पुलिस गिरफ़तारी दिखाकर धमाकों में शामिल होने को क़ुबूलने की बात कर रही है.

लोग ये भी पूछ रहे हैं कि जिस पुलिस दल पर गोलियां चली हों और जिसके आला अधिकारी को गोलियां लगी हों क्या उन पुलिसकर्मियों में इतना धैर्य था कि उन्होंने सैफ़ पर पलटवार नहीं किया?

एक सज्जन ने यह भी कहा कि अगर उन चरमपंथियों के पास एके 47 रायफ़ल थी तो क्या उसका इस्तेमाल हुआ और अगर हुआ तो चरमपंथियों की तरफ़ से इतनी कम गोलियों क्यों चलीं.

यदि स्थानिए लोगों के मुठभेड़ के बारे में शक और सवाल जायज़ मान भी लिए जाएं फिर भी सबसे बड़ा सवाल ये है कि आख़िर इंस्पेक्टर शर्मा की मौत कैसे हुई?

एक स्थानिए निवासी वसीम ग़ाज़ी ने इंस्पेक्टर शर्मा की मौत पर दुख जताते हुए कहा कि अगर पुलिस स्थानिए लोगों को विश्वास में लेकर कार्रवाई करती तो इंस्पेक्टर शर्मा की मौत नहीं होती.

उन्होंने इस पूरे मामले की न्यायिक जाँच कराने की माँग की. यहाँ तक कहा कि अगर सरकार हमारी प्रार्थना स्वीकार नहीं करेगी तो हम लोग किसी पूर्व जज से गुज़ारिश करके अपनी स्वंय की एक जाँच समिति बनाने की कोशिश करेंगे.'

एक मुस्लिम संगठन जमाते-इस्लामी के महासचिव एजाज़ असलम ने कहा कि जब भी बम धमाके होते हैं तो फौरन मुस्लिम समुदाये सुरक्षा एजेंसियों की शक के घेरे में आ जाता है. लेकिन अगर ध्यान से देखिए तो राजनीतिक तौर पर इससे सबसे ज़्यादा फ़ायदा भाजपा का होता है.

उन्होंने आगे कहा कि जाँच के नाम पर आम लोगों को परेशान किया जाता है और पूरे मुस्लिम समाज की छवि ख़राब होती है. उनका कहना है कि भला मुसलमान ऐसी घटनाओं को अंजाम देकर ख़ुद अपना ही नुक़सान क्यों करेंगे.

इस मुठभेड़ में सच्चाई जो भी है सबसे बड़ी सच्चाई ये है कि दो व्यक्तियों की मौत हुई, एक पुलिस वाले ने अपनी जान गवाँई और स्थानिए लोगों ने पुलिस पर विश्वास करने से इंकार कर दिया है.

(इस लेख में केवल जामिया नगर के निवासियों के शुक्रवार को हुई मुठभेड़ के बारे में विचार दिए गए हैं. जामिया नगर में कई घंटे लोगों के बीच घूम कर और उनसे विस्तृत बातचीत कर उनकी भावनाओं और विचारों का जायज़ा लिया गया है.)

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