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चर्च के दरवाज़े खुले हैं समलैंगिकों के लिए

By ब्रजेश उपाध्याय
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चर्च में दो पुरुषों या दो महिलाओं के संबंधों पर उंगली नहीं उठाई जाती
अमरीका के टेक्सस में ऐसा भी एक चर्च है जिसके दरवाज़े समलैंगिकों के लिए खुले हैं. यहाँ इन्हें गुनहगार नहीं समझा जाता है.

टेक्सस अमरीका के उन राज्यों में से है जिन्हें यहां के चर्च बेल्ट का यानि रूढ़िवादी सोच का हिस्सा माना जाता है.

और अगर मैं आपसे कहूं कि टेक्सस के डैलस शहर में दुनिया में समलैंगिकों के लिए बना सबसे बड़ा चर्च पिछले तीस सालों से भी ज़्यादा समय से मौजूद है तो आप चौक उठेंगे.

लेकिन रविवार की सुबह, अगर आप इस चर्च में जाएँ तो आपको हर उम्र के गे, लेस्बियन जोड़े, अपने बच्चों के साथ, ज़्यादातर ऐसे बच्चे जिन्हें उन्होंने गोद लिया है या फिर जिन्होंने टेस्ट ट्यूब बेबी पैदा किए और उन्हें पालपोस कर बड़ा किया है, उतने ही मन से जीसस को याद करते हुए दिखेंगे जैसे दूसरे चर्चों में दिखता है.

लेकिन ऐसे लोग जिन्हें चर्च गुनाहगार मानता है, भटका हुआ समझता है, उन्हें कैसे वो अपना सकता है? क्या उन्हें ये समझाया जाता है यहां कि वो जो कर रहे हैं ग़लत है और वो सही रास्ते पर आ जाएं?

बिल्कुल नहीं.

सबको अपनाने पर यक़ीन

कथीड्रल ऑफ़ होप नाम के इस चर्च के निर्देशक मंडल के चेयरमैन टिम टेलर का कहना है कि ये एक लिबरल चर्च है जो सबको अपनाने में यकीन रखता है और गे या लेस्बियन होना यहां पाप की तरह नहीं देखा जाता.

हम लोगों को उनकी समलैंगिगता की वजह से भला या बुरा नहीं आंकते. वो कहते हैं बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने परिवार से, अपने समाज से अपने झुकाव को छिपा कर रखते हैं वो रविवार की सुबह यहाँ आकर अपने को खुला महसूस करते
कहते हैं कि हम लोगों को उनकी समलैंगिगता की वजह से भला या बुरा नहीं आंकते. वो कहते हैं बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने परिवार से, अपने समाज से अपने झुकाव को छिपा कर रखते हैं वो रविवार की सुबह यहाँ आकर अपने को खुला महसूस करते हैं.

लेकिन यहाँ ज़्यादातर वे लोग आते हैं जो अब समाज के सामने आ चुके हैं और एक आम ज़िदगी बिताने की कोशिश कर रहे हैं.

शेरी डॉस 62 साल की हैं और उनकी जोड़ीदार डेबी कारट्रेल 52 की हैं और डेबी ने दो बच्चों को कृत्रिम तरीके से जन्म दिया है. वो बच्चे अब कॉलेज में जा रहे हैं. क्या बच्चों को पालने में मुश्किलें नहीं आतीं?

डेबी कहती हैं कि सबसे पहली मुश्किल तो तब आई जब अस्पताल में हीं एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि आप ये जान लें कि आपके बच्चे नाजायज़ कहलाएँगे.

वो कहती हैं कि ये बच्चे स्कूल में कुछ दोस्तों को बताते थे कि उनकी दो मांएँ हैं लेकिन ज़्यादातर लोगों से कुछ नहीं कहते.

नौकरी जाने का भय

डेबी स्कूल में टीचर हैं और उनके कुछ दोस्तों को तो पता है लेकिन उन्हें हमेशा डर रहता है कि कभी किसी बच्चे के मांबाप को पता चला और उन्होंने एतराज़ किया तो उनकी नौकरी जा सकती है.

चौंतीस साल के जेरी किंग इंजीनियर हैं और उनके पिता चर्च के मिनिस्टर थे. जेरी 19 साल के थे जब उनके परिवार को उनके गे होने के बारे में पता चला और उन्हें बाहर निकाल दिया गया.

जेरी को इस चर्च ने पनाह दी और वो आज बड़े आराम से ज़िदगी का सामना कर रहे हैं, लेकिन अमरीका के चर्चों के लिए उनका ग़ुस्सा बरकरार है.

चर्च में समलैंगिक पुरुष और महिलाएँ नियमित रूप से आते हैं

कहते हैं, "अमरीकी ईसाइयत चरमपंथी मुसलमानों की तरह ही है. उनके ढांचे में आप फ़िट नहीं बैठते तो वो आपको समाज से परिवार से काट कर मिटा देने की कोशिश करते हैं."

लेकिन इस सोच में कुछ बदलाव नज़र आने लगा है. रॉनल्ड बॉसन इसी चर्च में पैस्टर हैं और कहते हैं कि बीस साल पहले उनके जैसे अफ़्रीकी अमरीकी आदमी के लिए इस इलाक़े में घुसना भी मुश्किल था लेकिन अब ऐसा नहीं है.

तो अब जब चुनाव होने जा रहे हैं, गे और लेस्बियन लोगों का हक एक चुनावी मुद्दा है तो ये लोग किस उम्मीदवार की तरफ़ देख रहे हैं?

मुझे ज़्यादातर डेमोक्रैट या बराक ओबामा के चाहनेवाले नज़र आए लेकिन शेरी डॉस जैसी लेस्बियंस मैकेन के साथ दिखीं.

उनका कहना है कि चाहे जो भी राष्ट्रपति बने, गे और लेस्बियंस के हालात बहुत नहीं बदलनेवाले इस देश में. तो फिर ऐसा उम्मीदवार क्यों न चुनें जिसकी पॉलिसी दूसरे मुद्दों पर अच्छी लगे.

गर्भपात जैसे मुद्दों पर भी इनकी आपसी सोच अलग अलग है.

इन्हें अगर कुछ एकजुट करती है तो बस एक सोच कि समाज उन्हें उसी तरह अपनाए, उन्हें वही हक़ दे जैसे एक आम इंसान के होते हैं क्योंकि उनका कहना है कि वो गे या लेस्बियन सोचसमझ कर या जानबूझ कर नहीं बने हैं.

वो कुछ और बन ही नही सकते थे.

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