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आज़मगढ़ के सरायमीर में दहशत का माहौल

By रामदत्त त्रिपाठी
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आज़मगढ़ ज़िले के लोग रोजी रोटी की तलाश में देश-विदेश में लंबे समय से रह रहे हैं
दिल्ली में पुलिस के साथ चरमपंथियों की मुठभेड़ बाद सरायमीर क़स्बे और उसके आसपास के गाँवों में भय, अविश्वास और दहशत का माहौल है.

मुस्लिम बहुल गाँवों और मोहल्लों में विशेषकर लोग डरे हुए हैं. अपनी सुरक्षा से ज़्यादा उन लोगों की सलामती की चिंता है जो पढ़ाई या रोज़गार के सिलसिले में दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में गए हैं या फिर दुबई, मस्कट या विदेश में कहीं और.

ये घनी आबादी वाला इलाक़ा है. लोगों के पास ज़मीन बहुत कम है इसलिए शिक्षा और रोजी-रोटी के तलाश में आज़मगढ़ और सरायमीर के लोग दुनिया के हर हिस्से में गए.

एक जमाने में यहाँ जब्तशुदा विदेशी सामान की अनेक दुकानें हुआ करती थी और इसीलिए सरायमीर मिनी दुबई कहलाया.

इस इलाक़े में अनेक नामी गिरामी मदरसे हैं और बड़ी तादाद में मस्जिदें. बिहार और अन्य राज्यों के ग़रीब मुस्लिम बच्चे भी यहाँ पढने आते हैं क्योंकि मदरसों में पढ़ने के अलावा रहने और खाने की भी व्यवस्था मुफ़्त है. लेकिन आधुनिक शिक्षा के साधन कम हैं.

कई वर्षों से सरायमीर के चर्चा में रहा हैं. हाजी मस्तान ने अपनी दो बेटियों की शादी यहाँ की. दाऊद इब्राहीम के भाई की ससुराल यहीं है और मुबंई के जेल में बंद अबू सलेम का पैतृक गाँव भी सरायमीर है.

प्रतिबंधित इस्लामी छात्र संगठन सिमी के संस्थापक अध्यक्ष शाहिद बद्र इसी आजमगढ़ ज़िले के रहने वाले हैं. शाहिद बद्र लंबे अरसे तक जेल में रहने के बाद अब यहीं आजमगढ़ शहर में डॉक्टरी करते हैं और अपनी संस्था सिमी की बहाली के लिए सुप्रीम कोर्ट में क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.

पृष्ठभूमि के लिए यह भी बताते चलें कि अयोध्या और काशी के मध्य स्थित आज़मगढ़ दक्षिणपंथी उग्र विचारधारा वाले हिंदू संगठनों का भी कार्यक्षेत्र रहा है.

हाल ही में गोरखपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद योगी आदित्यनाथ'आतंकवाद विरोधी हिंदू चेतना रैली' करने यहाँ आए थे तो मुस्लिम समुदाय के साथ उनके काफ़िले का टकराव हुआ, जिसमें एक व्यक्ति मारा गया और दंगा होते होते बचा.

संदिग्ध चरमपंथियों का घर

पिछले हफ़्ते दिल्ली के जामियानगर इलाक़े में पुलिस की मुठभेड़ में मारे गए दोनों संदिग्ध मुस्लिम चरमपंथी सरायमीर के पास ही संजरपुर गाँव के रहने वाले थे.

इस मुठभेड़ के बाद पकड़े गए कई संदिग्ध चरमपंथी यहीं आसपास के रहने वाले हैं.

अहमदाबाद और जयपुर बम धमाकों के मास्टर माइंड होने के आरोप में पिछले महीने गिरफ़्तार मुफ़्ती अबुल बशर सरायमीर के पास बीनापार गाँव का रहने वाला है.

''पूरे मामले की निष्पक्ष न्यायायिक जांच हो और तब अगर मेरा बेटा दोषी पाया जाए तो चाहे जो सज़ा दी जाए. मुझे क़ानून और अदालत पर पूरा भरोसा हैं और मेरा मानना है कि दिल्ली पुलिस ने बम ब्लास्ट में अपनी नाकामी छिपाने के लिए मेरे बेटे को फंसाया है
भारतीय पुलिस का कहना है कि आज़मगढ़, विशेषकर सरायमीर इस्लामी आतकंवाद की पाठशाला है और यहाँ के युवकों को बाहर ले जाकर उन्हें जिहादी बनाया जा रहा है.

इस गंभीर आरोप ने इस इलाक़े के लोगों को हिलाकर रख दिया है. लोग डरे, सहमे और सदमे में हैं.

इस आरोप के पीछे उन्हें गंभीर साज़िश नज़र आती है. हर कोई जानना चाहता है कि सच्चाई क्या है. क्या यहाँ सीधे साधे दिखने वाले युवक बाहर जाकर सचमुच आतंकवादी हो गए हैं ?

पुलिस मुठभेड़ में मारे गए संदिग्ध चरमपंथी आतिफ़ और साज़िद के गाँव संजरपुर में मातम का माहौल है.

लोग कहते हैं कि दो दिन तक तो यहाँ चूल्हा नहीं जला. गाँव के बाहर सड़क पर पुलिस का पहरा है.

घटना के तुंरत बाद मीडिया वालों ने धावा बोल दिया. गाँव वालों ने पथराव किया तो एक पुलिस अफ़सर की गाड़ी का शीशा टूट गया. पुलिस पर हमले के आरोप में कई लोग पकड़ लिए गए.

दिल्ली में गिरफ़्तार युवक सैफ़ के पिता सादाब उर्फ़ मिस्टर का कहना है कि उनका बेटा एमए पास करने के बाद कुछ हफ़्ते पहले ही दिल्ली गया था कंप्यूटर सीखने और वह आतंकवादी हो ही नही सकता.

सादाब कहते हैं, ''पूरे मामले की निष्पक्ष न्यायायिक जांच हो और तब अगर मेरा बेटा दोषी पाया जाए तो चाहे जो सज़ा दी जाए. मुझे क़ानून और अदालत पर पूरा भरोसा हैं और मेरा मानना है कि दिल्ली पुलिस ने बम धमाकों में अपनी नाकामी छिपाने के लिए मेरे बेटे को फंसाया है.''

सादाब समाजवादी पार्टी के नेता हें और लोगों के बीच उनकी छवि अच्छी है.

मारे गए साज़िद की उम्र 16 वर्ष के आसपास बतायी गई. वह हाईस्कूल करके दिल्ली पढ़ने गया था, जबकि आतिफ़ इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा था.

सहमे हुए लोग

अब्दुल गनी का कहना है कि दिल्ली की घटना से गाँव के लोग सहमे हुए हैं

पड़ोस के बीनापार गाँव के एक बुज़ुर्ग अब्दुल गनी कहते हैं '' दिल्ली वाली घटना से आदमी इतना सहम गया कि अब वह सोचता है कि बच्चों को कैसे बाहर पढ़ने भेजें. जो वहाँ जाकर गोली का निशाना बन जाते हैं.''

गाँव के प्रधान मोहम्मद शाहिद कहते हैं ''हमारा गाँव रात भर दहशत में रहता है. पाँच पाँच आदमी की टोली बनती है और गाँव के चारों तरफ़ हम पहरा देते हैं.''

गाँव के लोगों के डर की वजह यह है कि पिछली 14 अगस्त को गुजरात और उत्तर प्रदेश पुलिस के लोग सादी वर्दी में आए थे.

गाँव के एक युवक मुफ्ती अबुल बशर को उसके भाई की शादी की बातचीत के बहाने बुलाया और फिर ज़बरदस्ती गाड़ी में डालकर उठा ले गए.

स्थानीय पुलिस को कुछ पता नहीं था. दो दिन बाद ख़बर आई कि अहमदाबाद बम धमाकों की साजिश में बशर को लखनऊ में गिरफ़्तार किया गया.

सरायमीर क़स्बे के लोग एक और घटना बताते हैं. पिछले वर्ष 22 दिसंबर को हक़ीम तारिक़ कासमी नाम के युवक को रानी सरानी चेक पोस्ट से पकडा गया और कुछ रोज़ बाद उसे बाराबंकी में ढेर सारे गोला बारूद के साथ गिरफ़्तार दिखाया गया.

पुलिस के मुताबिक कासमी आंतकवादी है और उस पर फैज़ाबाद और वाराणसी कचहरी बम धमाकों कि साज़िश में शामिल होने का आरोप है.

इन दो घटनाओं से स्थानीय लोगों को पुलिस की हर कहानी पर शक होता है. कई लोगों ने गुस्से भरे लहजे में शिकायत की कि यहाँ के लोग बाहर मजदूरी करके पैसा लाते हें और खुशहाल हैं यह देखा नही जा रहा.

कई लोग इसे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की साज़िश मानते हैं क्योंकि अबुल बशर की गिरफ़्तारी अहमदाबाद पुलिस ने की थी और फिर उसके बाद दिल्ली के बटला हाउस में मुठभेड़ हुई.

स्थानीय पुलिस का कहना है कि दिल्ली पुलिस ने उसे अभी तक कोई जानकारी नही दी. इसलिए वह कुछ नही कह सकते.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सर्वेश राणा का कहना है कि दिल्ली में मारे और गिरफ्तार किए गए युवकों के घर पूछताछ और तलाशी हुई पर कोई आपत्तिजनक चीज़ नहीं मिली.

स्थानीय पुलिस कि सबसे बड़ी चिंता यही है कि यहाँ शांति बनी रहे. माहौल ऊपर से शांत है लेकिन अंदर ही अंदर तनाव है.

प्रशासन ने अभी तक लोगों को भरोसे में लेने के प्रयास नही किए हैं और अविश्वास का माहौल कभी भी गंभीर संकट में बदल सकता है.

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