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उड़ीसा-कर्नाटक में धारा 355 की तैयारी

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उड़ीसा में हिंसा के पीछे धर्मातंरण के विवाद को मुख्य वजह माना जा रहा है
केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए सरकार उड़ीसा और कर्नाटक राज्यों के ख़िलाफ़ धारा 355 लागू करने की तैयारी कर रही है. इन दोनों राज्यों में ईसाइयों पर हमले हो रहे हैं.

केंद्रीय गृहराज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने बताया कि सरकार ने इसका मन बना लिया है और अब सरकार ज़रूरी तथ्य जुटा रही है.

इन दोनों एनडीए शासित राज्यों में अल्पसंख्यक ईसाइयों पर हमले हो रहे हैं.

उड़ीसा में 23 अगस्त के बाद से लगातार ईसाइयों और गिरजाघरों पर हमले हो रहे हैं और वहाँ इस दौरान कम से कम 18 लोगों की मौत हुई है और सैकड़ों लोग बेघर हुए हैं.

इसी तरह कर्नाटक में पिछले एक हफ़्ते से गिरजाघरों पर हमले का सिलसिला शुरु हुआ है.

यूँ तो क़ानून व्यवस्था राज्य सरकार का मसला होता है लेकिन संविधान की धारा 355 के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार मिलता है कि 'केंद्र आपातस्थिति में राज्य में किसी भी बाहरी हमले या किसी भी तरह की अंदरूनी बाधा को दूर करने के लिए कार्रवाई करे.'

विवादास्पद

केंद्र सरकार ने गुरुवार की रात दोनों राज्यों के ख़िलाफ़ धारा 355 के तहत कार्रवाई करने का मन बनाया है और केंद्रीय गृहराज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने मीडिया से हुई चर्चा में इसकी पुष्टि की है.

इन दोनों राज्यों में केंद्र के मुख्य विपक्षी दल एनडीए का शासन है. उड़ीसा में बीजू जनता दल (बीजेडी)के नेतृत्व में सरकार चल रही है और वहाँ भाजपा बीजेडी की मुख्य सहयोगी है.

वहीँ कर्नाटक में पिछले मई में ही एनडीए के मुख्य घटक दल भाजपा की सरकार बनी है. यह दक्षिण भारत में भाजपा की पहली सरकार है.

केंद्र और राज्य शासन के बीच तालमेल को लेकर संविधान की तीन धाराओं पर विवाद रहा है.

इनमें से एक धारा 352 है. यह धारा केंद्र सरकार को अधिकार देती है कि वह अगर उचित माने तो किसी भी राज्य में आपातकाल की घोषणा कर दे.

उड़ीसा सरकार के आश्वासनों के बावजूद वहाँ हिंसा रुक नहीं रही है

धारा 355 केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि वह राज्य में क़ानून व्यवस्था की स्थिति संभालने के लिए हस्तक्षेप करे.

और धारा 356 कहती है कि यदि किसी राज्य की सरकार स्थिति को संभालने में अक्षम दिखती है तो उस राज्य सरकार को केंद्र सरकार बर्खास्त कर दे और वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू कर दे.

इन तीनों धाराओं को लागू करने के लिए ज़रूरी है कि केंद्र सरकार के पास इनमें से किसी को भी लागू करने का पर्याप्त आधार हो.

सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 में केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर चले 'एसआर बोम्मई विरुद्ध केंद्र सरकार' मामले में फ़ैसला दिया था कि जब तक केंद्र सरकार धारा 355 के सभी प्रावधानों का पूरी तरह से उपयोग न कर ले, उसे धारा 356 लागू करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए.

केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा को लेकर गठिन सरकारिया आयोग ने भी इसी तरह के सुझाव दिए थे.

कई राजनीतिक दल, ख़ासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) इन दोनों धाराओं, 355 और 356 के उपयोग के ख़िलाफ़ रही हैं.

ये दोनों पार्टियाँ चाहती हैं कि इन धाराओं को ख़त्म कर दिया जाए.

जबकि सबसे अधिक बार धारा 356 की मार झेलने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पिछले साल ही माँग की थी कि नंदीग्राम में हुई हिंसा के बाद पश्चिम बंगाल में धारा 355 लागू कर दिया जाए.

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