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जामिया नगर में है दहशत का माहौल

By पाणिनी आनंद
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स्थानीय लोगों में मुठभेड़ के बाद से घबराहट है
दिल्ली में पुलिस मुठभेड़ में संदिग्ध चरमपंथियों के मारे जाने की ख़बर के बाद से ही जामिया नगर में तनाव का माहौल है और मुस्लिम समुदाय इससे चिंतित है.

वजह साफ़ है, यह किसी पॉकेटमार, कत्ली या माफ़िया के इनकाउंटर का मामला नहीं है. पुलिस के मुताबिक संदिग्ध चरमपंथियों के साथ मुठभेड़ हुई है. दो मारे गए हैं. एक हिरासत में है और दो फ़रार हो गए.

पर इस तनाव में एक बौखलाहट, डर, घबराहट, चिंता और सफ़ाईनामे का भाव भी मिला हुआ था. शायद इलाके का मुस्लिम बाहुल्य होना इसकी सबसे अहम वजह था.

जामिया नगर का इलाक़ा मुस्लिम बाहुल्य इलाक़ा है. शुक्रवार को जुमे की वजह से और फिर रमजान का महीना होने से यहाँ वैसे भी ख़ासी चहल-पहल थी.

पर सुबह जिस वक्त लोग काम पर जा रहे थे, छात्र-छात्राएं रोज़ की तरह जामिया के जाने-माने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में पढ़ने जा रहे थे, उसी वक्त इस मुठभेड़ ने लोगों को चौंका कर रख दिया.

मुठभेड़ जिस गली में हुई है वहाँ लोग ज़्यादा घबराए हुए हैं

मुठभेड़ बाटला हाउस मोहल्ले के एल-18 मकान में हुई. पड़ोसी घबराए हुए हैं और सकते में हैं कि उनके इलाक़े में आकर रहनेवाले लोग उनके जैसे आम चेहरे नहीं, कथित तौर पर चरमपंथी थे.

पड़ोस के लोगों से बात की तो कुछ बौखलाहट भरे शब्दों में सुनाई दिया, "हमारे इलाक़े को बदनाम किया जा रहा है. प्रशासन अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहा है और जामिया के इलाके को आतंकवादियों का अड्डा घोषित करने की तैयारी हो रही है."

दरअसल, मामले की सच्चाई कुछ भी हो, अल्पसंख्यक समुदाय के बीच ख़ुद पर बार-बार उंगली उठाए जाने की बौखलाहट तो है ही. फिर मामला मोहल्ले-पड़ोस का हो तो बेवजह सताए जाने का डर पैदा हो ही जाता है.

जामिया के प्रोफ़ेसर फ़य्याज़ अहमद ख़ान इंजीनियरिंग विभाग में पढ़ाते हैं. वो भी उसी मकान के पीछे रहते हैं जहाँ यह मुठभेड़ हुई.

अब बदल जाएगी तस्वीर

फ़य्याज़ ख़ान जामिया में पढ़ने वाले छात्रों को लेकर चिंतित हैं. उन्होंने बताया, "जामिया के केवल 40 प्रतिशत बच्चों को हॉस्टल नसीब है. बाकी के 60 प्रतिशत ऐसे ही रहते हैं, इस इलाके के घरों में. अब उनपर भी सवाल उठेंगे. उन्हें भी शक की निगाह से देखा जाएगा. पहले क्या कम इल्ज़ाम मिले हैं जो अब यह और जुड़ गया."

उन्होंने कहा, "यह इलाक़ा आज़ादी की लड़ाई के वक्त गांधी, नेहरू की गतिविधियों का केंद्र था पर अब मीडिया की ख़बरों और मुठभेड़ के बाद लोगों के मन में इस मुस्लिम इलाक़े की अलग तस्वीर खींच ली जाएगी."

जामिया के क़रीब 60 प्रतिशत छात्रों को छात्रावास उपलब्ध नहीं है

घटनास्थल के दो-तीन किलोमीटर के दायरे में लोगों के मन में शंकाएं, चिंताएं, डर, तनाव.. इन सब का मिला-जुला भाव देखने को मिल रहा था.

एक व्यक्ति सुबह घर से निकला था. पड़ोस में ही मुठभेड़ हुई. तब से दोपहर दो बजे तक घर में बच्चों और परिवार से नहीं मिल सका क्योंकि पुलिस उसे गली में नहीं जाने दे रही थी. डर, चिंता और घबराहट में उसके हाथ कांप रहे थे, हलक सूख रहा था और वो जबरन चेहरे पर एक मुस्कान लाकर पुलिसवालों से घर जाने देने की फ़रियाद कर रहा था.

छात्र अपने घरवालों को अपनी कुशलक्षेम बता रहे थे. टीवी पर मुठभेड़ की ख़बरें घरवालों को चिंतित तो कर ही रही थीं. इन छात्रों के लिए आज छात्र से ज़्यादा बड़ी पहचान और चिंता उनका अल्पसंख्यक होना बन गया था.

रोज़मर्रा के शोर की जगह पुलिस की गाड़ियों के सायरन थे, टीवी कैमरों के सामने लगभग चिल्लाते मीडियाकर्मी थे और पुलिस की फटकार, तेज़ी से दौड़ते सुरक्षाबल, चेतावनियाँ दोहराते अफ़सर थे.

बाटला हाउस मोहल्ले से ठीक बाहर जामिया नगर की पुलिया के पास जहाँ रोज़ कई भिखारी नज़र आते थे, आज केवल तमाशबीनों की भीड़ थी. भीख मांगने वालों के पास मांगने के लिए मुँह नहीं रहा शायद, सो तमाशबीनों में शामिल हो गए.

इन कथित चरमपंथियों से शायद आस-पड़ोस में किसी का भी बहुत मिलना-जुलना न रहा हो पर हज़ारों की तादाद में इकट्ठा हुए स्थानीय लोगों की बातों से लग रहा था जैसे इस प्रकरण के लिए सीधे उन्हें ही दोषी करार दिया गया हो और इसीलिए सबकी ज़बान से एक सफ़ाईनामा सामने आ रहा था.

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