• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

सदाबहार आम और अमरूद

By रामदत्त त्रिपाठी
|
हाजी कलीमुल्लाह की नर्सरी औरों से निराली है
उत्तर प्रदेश के कलीमुल्लाह ने आम की क़िस्मों में नई ईजाद की है. उनका उगाया आम बारहों महीने उपलब्ध होता है.

यह करिश्मा कर दिखाया है एक अनपढ़ किसान हाजी कलीमुल्लाह ने. हाजी कलीमुल्लाह को उनके इस हुनर के लिए भारत सरकार पद्मश्री से सम्मानित कर चुकी है.

लखनऊ से पश्चिम हरदोई जाने वाली सड़क पर सोलह किलोमीटर पर मलीहाबाद क़स्बा है. मलीहाबाद भारत में आम की एक प्रमुख मंदी और पेड़ पौधों की नर्सरी है. अनुमान है कि साल में ढाई से तीन सौ करोड़ तक का आम का बिजनेस यहाँ से होता है.

लखनऊ से मलीहाबाद तक सड़क के दोनों ओर हरे भरे बगीचे और नर्सरी ही नर्सरी हैं.

लेकिन मलीहाबाद चौराहे से थोड़ा पहले अब्दुल्लाह नर्सरी इन सबमे निराली है. करीब छह एकड़ में फैली यह है हाजी कलीमुल्लाह की नर्सरी.

अड़सठ बसंत देख चुके हाजी कलीमुल्लाह का मन पढाई में नही लगा. मगर ज्ञान और विज्ञान किताबों का मोहताज नही.

''मेरे ख़्याल में दुनिया में इस तरह का दूसरा कोई आम तो सुनने को नहीं मिला जिसमे दो तरह के छिलके हों और दो रंग का गूदा हो. और इन्तिहाई पतली गुࢠली. उसमें गूदा भी बहुत ज़्यादा होता है.
अपनी पचास साल की मेहनत से हाजी कलीमुलाह ने अनोखा कमाल कर दिखाया है. उन्होंने आम के एक ही पेड़ में कलमें बाँध बांधकर तीन सौ से ज्यादा किस्म के आम पैदा किए.

देश विदेश से लोग आम के इस पेड़ को देखने आते हैं.

कलीमुल्लाह बड़े ही गर्व और प्यार के साथ लोगों को ले जाते हैं इस आम के पास, और उसकी हर डाल पर लगे अलग अलग क़िस्म के आम की खूबी गिनाते हैं.

आम दिमाग़ का टॉनिक

कलीमुल्लाह के मुताबिक आम दिमाग़ का टॉनिक और कई बीमारियों की दवाई भी है.

कलीमुल्लाह सात साल की उम्र से अपने पिता के साथ इस नर्सरी में आते हैं. ''असल में पढ़ाई में मन नहीं लगा. पढाई में बहुत कमजोर रहे. अंग्रेज़ी में सिफ़र मिला और यही सिफ़र लेकर हम इस नर्सरी में आ गए.''

एक ही पेड़ में कई तरह के आम लगाने का आइडिया उन्हें अपने दोस्तों से मिला. दोस्तों ने कहा गुलाब के एक पेड़ में कई रंग के फूल खिलते हैं. कलीमुल्लाह ने सोचा फिर आम क्यों नही.

फ़िर क्या था, एक धुन सवार हुई और आम का मुश्तैनी बगीचा उनकी प्रयोगशाला बन गया.

बाईस साल की उम्र में कलीमुल्लाह ने एक ऐसा पेड़ बना लिया जिसमें सात क़िस्म के आम थे.लेकिन वर्ष 1960 की बाढ़ में उनका यह पेड़ और नर्सरी सब नष्ट हो गया. फिर शादी हुई और वह दूसरे धंधों में लग गए.

कलीमुल्लाह बड़े गर्व से अपनी इस ईजाद का ज़िक्र करते हैं

वर्ष 1987 में कलीमुल्लाह फ़िर अपनी प्रयोगशाला में वापस आए और 1992 तक आते आते उन्होंने उसमें कलम लगा लगा कर 35 क़िस्म के आम बना लिए.

किसी जमाने में मलीहाबाद में 1300 किस्म के आम होते थे. कलीमुल्लाह ने खोज खोज कर कलम बांधी. उन्होंने सहारनपुर और भोपाल से भी कलम मंगाई.

और कुल मिलाकर उन्होंने सौ साल पुराने एक पेड़ में तीन सौ से ज़्यादा क़िस्म के आम उगा लिए. ऐसा ही एक नया पेड़ भी उन्होंने तैयार किया.

देश-विदेश में शोहरत

कलीमुल्ला को शोहरत मिली. देश विदेश से लोग आने लगे. तब उन्होंने अपने अनुभव और ज्ञान से आम की नई क़िस्में खोज निकालीं.

इनके नाम भी निराले हैं अनारकली, नूरजहाँ और नयनतारा.

हाजी कलीमुल्लाह ने अपनी लगन और मेहनत से आम की जो नई किस्म ईजाद की है इसमें मिठास ज़्यादा न होना भी एक खूबी है.

वह कहते हैं,''मेरे ख़्याल में दुनिया में इस तरह का दूसरा कोई आम तो सुनने को नहीं मिला जिसमे दो तरह के छिलके हों और दो रंग का गूदा हो. और इन्तिहाई पतली गुठली. उसमें गूदा भी बहुत ज़्यादा होता है.''

कलीमुल्लाह को इस पर भी तसल्ली नहीं हुई. उन्होंने एक ऐसा आम बनाया है जिसमें 365 दिन यानी बारहों महीने आम मिलेंगे.

उनके बेटे नाज़िमुल्लाह कहते हैं कि यह आम उनकी पौधशाला में उपलब्ध है.

अमरूद की नई पौध

कलीमुल्लाह की कारीगरी आम तक ही सीमित नही है. हमेशा कुछ न कुछ नया खोजते और बनाते रहने की अपनी सनक से अमरुद की भी एक नयी किस्म ईजाद की है. यह अमरुद बारहों महीने फल देता है. अभी इस अमरुद का नामकरण बाकी है.

लोग कलीमुल्लाह को सनकी और पागल तक कहते हैं मगर कलीमुल्लाह अपने को एक आशिक़ और दीवाना मानते हैं.

उनका कहना है,''हम तो कभी कभी देख रहे हैं कि लैला भी हम हैं और मजनू भी हम हैं. आम को भी कभी कभी हम देख रहे हैं आम भी लैला भी है और मजनू भी . इस तरह हमारा इसका साथ हो गया है.''

कलीमुल्लाह का पेड़ पौधों के साथ परिवार का सा रिश्ता है. कहते हैं कि पेड़ भी इंसान की तरह दुःख और सुख की भावनाएँ व्यक्त करते हैं और अपने मालिक के प्रति वफ़ादारी निभाते हैं.

कलीमुल्लाह ने न तो किताबें पढ़ीं, न किसी विज्ञान की प्रयोगशाला में गए. मगर उनका ज्ञान बड़े बड़े वैज्ञानिकों को अचरज में डाल देता है.

कलीमुल्लाह कहते हैं कि उन्होंने ऊसर ज़मीन को हराभरा करने की तकनीक ईजाद कर ली है.

कलीमुल्लाह को शिकायत है कि उनके ज्ञान का उपयोग नही किया जा रहा है. मगर वह उसका राज़ खोलने को तैयार नहीं हैं. अपने ज्ञान को गुप्त ही रखना चाहते हैं कलीमुल्लाह ताकि उसका श्रेय कोई और न ले उड़े.

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts

Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more