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संघीय जांच एजेंसी के गठन की संभावनाएं प्रबल हुईं (राउंडअप)

By Staff
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नई दिल्ली, 16 सितम्बर (आईएएनएस)। प्रशासनिक सुधार आयोग (एआरसी) ने आतंकवाद के खिलाफ मौजूदा कानूनों को नाकाफी बताकर एक सख्त कानून बनाए जाने की जो सिफारिश की है, उसके मद्देनजर संघीय जांच एजेंसी के गठन की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।

एआरसी ने अपने आठवें प्रतिवेदन में आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून बनाए जाने की वकालत की है। एआरसी के अध्यक्ष एम. वीरप्पा मोइली ने आयोग की रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, "हमारा मानना है कि आतंकवादी घटनाओं की जांच के लिए एक संघीय जांच एजेंसी के गठन की जरूरत है।"

आयोग ने इसके अलावा आर्थिक आतंकवाद पर काबू पाने के लिए एक कड़ा कानून बनाए जाने की बात कही है। साथ ही आयोग ने आतंकवाद से संबंधित अपराधों के जल्द निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना किए जाने की भी वकालत की है।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यदि कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत अपराध करने का आरोपी पाया जाता हो तो उसे किसी भी कीमत पर जमानत नहीं मिलनी चाहिए।

आयोग ने अपनी सिफारिशों में आतंकवाद संबंधी सभी प्रकार के अपराधों के लिए एक विस्तृत और कारगर कानून बनाए जाने की भी वकालत की है। आयोग ने कहा है कि इस कानून में ऐसे प्रवाधान भी होने चाहिए ताकि कानून का दुरुपयोग न हो।

मोइली से जब पूछा गया कि प्रस्तावित कानून किस प्रकार का होगा तो इसके जवाब में उन्होंने कहा, "जो पोटा में नहीं था वो इस कानून में है। यह न तो पोटा की तरह है, न ही टाडा और ना ही मकोका की तरह है।"

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में आतंकवाद संबंधी मामलों की जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) में अलग से एक प्रकोष्ठ बनाए जाने की भी वकालत की है।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (सपं्रग) सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने सोमवार को आईएएनएस से विशेष बातचीत में कहा था, "लगातार बढ़ रही आतंकवादी घटनाओं से केंद्र सरकार चिंतित है। इससे निपटने के लिए सरकार संघीय जांच एजेंसी की स्थापना पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगले कुछ सप्ताह में हम एक ठोस रणनीति लेकर सामने आएंगे।"

उन्होंने कहा, "प्रस्तावित एजेंसी से संबंधित कागजी कार्रवाई भी शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री भी इसका प्रारुप देख चुके हैं। संघीय जांच एजेंसी की स्थापना को लेकर सभी राज्यों से हमें समर्थन मिल रहा है। प्रधानमंत्री इसे अपने अधीन रख सकते हैं या फिर गृह मंत्रालय के जिम्मे भी कर सकते हैं।"

उन्होंने कहा कि संघीय जांच एजेंसी की स्थापना के अलावा सीबीआई के पुनर्गठन के विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है। इसके तीन अलग-अलग विभाग बनाए जाने के बारे में बातचीत चल रही है। पहला विभाग आतंकवाद से जुड़ी खुफिया जानकारी एकत्र करेगा और उचित कार्रवाई करेगा। दूसरा विभाग आर्थिक अपराधों पर अपना ध्यान केंद्रित करेगा जबकि तीसरा विभाग राज्य सरकारों की मांगों के मद्देनजर अपराधों की जांच करेगा।

बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एआरसी की सिफारिशों को खारिज कर दिया है। भाजपा का कहना है कि पर्याप्त कानूनी प्रावधानों के बगैर संघीय जांच एजेंसी की स्थापना का कोई औचित्य ही नहीं है।

पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी ने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा, "पोटा जैसे आतंकवाद विरोधी कड़े कानून के बगैर संघीय जांच एजेंसी की स्थापना करने का कोई औचित्य नहीं है। संघीय जांच एजेंसी के गठन से क्या होगा जब तक कि आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कानून का प्रावधान नहीं होगा।"

भाजपा ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) में ही अलग से आतंकवाद विरोधी प्रकोष्ठ बनाए जाने की एआरसी की सिफारिशों को भी खारिज कर दिया। पार्टी प्रवक्ता ने कहा, "आज की तारीख में सीबीआई पर से लोगों का भरोसा उठ चुका है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के अधीन सीबीआई की क्वोत्रोची और चारा घोटाले समेत अन्य कई मामलों में भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में सीबीआई में अलग प्रकोष्ठ बनाए जाने की बात भी बेमानी साबित होगी।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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