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पाकिस्तान को अपनाए भारत

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भारत और पाकिस्तान का तनाव ख़तरनाक है
पाकिस्तान की अस्थिरता के प्रति अमरीका से ज़्यादा भारत को चिंतित होना चाहिए क्योंकि उसके बिखरने का सीधा असर भारत पर पड़ेगा. पाकिस्तान बहुत तेज़ी से एक विफल राष्ट्र बनने की तरफ़ जा रहा है. और अगर पाकिस्तान फ़ेल होता है तो ये अमरीका से ज़्यादा भारत के लिए बहुत बड़ी समस्या होगी.

पाकिस्तान को लेकर अपनी नीतियों में परिवर्तन करके भारत बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है और क्षेत्रीय मामलों में अमरीका की जगह ले सकता है. पाकिस्तान की विफलता से भारत को चिंतित होना चाहिए. ग्लोबल पैटर्न्स ऑफ़ टेररिज़म की रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवाद की घटनाओं की संख्या पाकिस्तान के बाद भारत में सबसे ज़्यादा हुई हैं. इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान से भी ज़्यादा.

चिंता

भारत के लिए यही चिंता का विषय होना चाहिए. भारत की जनता और सरकार पाकिस्तान की समस्याओं को अमरीका के मुकाबले अच्छी तरह समझती है. इसलिए भारत अगर अमरीका के नेतृत्व को स्वीकार करने की बजाए स्वतंत्र नीति अपनाए तो वो उसके भी हित में होगा.

भारत की भूमिका के महत्व को पाकिस्तानी समाज का आगे बढ़ा हुआ तबक़ा समझता है लेकिन आम लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे. दोनों देशों के समाजों की सोच ठीक एक दूसरे जैसी नहीं है. पाकिस्तान के लोग हिंदूवाद से डरे हुए हैं तो भारत के लोग पाकिस्तान से नाराज़ हैं क्योंकि वो देश के बँटवारे का कारण बना.

पाकिस्तान का संकट गहरा है. वहाँ की सबसे विश्वसनीय संस्था सेना थी. जब जब पाकिस्तान में सिविल सोसाइटी लड़खड़ाती थी तो सेना ख़ुद का विस्तार करके राज्य की भूमिका में आती रही है.

पाकिस्तानी सेना में कट्टरवाद बढ़ा है लेकिन अब स्पष्ट हो चुका है कि सेना में भी एकराय नहीं है. काबुल में भारतीय दूतावास पर बम हमले से ज़ाहिर हुआ कि पाकिस्तान की सेना के एक हिस्से का इसमें हाथ था लेकिन कमांड को इसकी जानकारी नहीं थी.

अमरीकी नीतियाँ

पाकिस्तानी सेना में भी बदलाव आया है. वहाँ अब तालेबान, अल क़ायदा और इस्लामी कट्टरवादियों के समर्थक बढ़ गए हैं. इसलिए अमरीका को चाहिए कि वो ऐसी नीतियाँ लागू न करे जिनसे पाकिस्तान सोमालिया की तरह फ़ेल्ड स्टेट बन जाए.

अमरीकी नीति में पाकिस्तान को लेकर एक दो महीने पहले ही बदलाव आया है. परवेज़ मुशर्रफ़ के दौर में पाकिस्तान की सीमाओं के भीतर अमरीकी कार्रवाई पाकिस्तानी सेना के सहयोग से होती थी.

ऑपरेशन अमरीकी फ़ौजें करती थीं लेकिन ज़िम्मेदारी पाकिस्तानी सेना लेती थी. लेकिन जब से मुशर्रफ़ कमज़ोर पड़े तब से पाक सेना के साथ अमरीका का सहयोग नहीं है. पाक सेना को सूचना दिए बिना अमरीका पाक सीमा के भीतर पिछले तीन चार महीने में तीन चार कार्रवाइयाँ कर चुका है.

मुशर्रफ़ का दौर

मुशर्रफ़ का हनीमून अमरीका के साथ कुछ दो तीन साल तक चला. वो हर महीने अल क़ायदा के एक आदमी को पकड़कर अमरीका के हवाले कर देते थे. वॉशिंगटन में तो मज़ाक चल पड़ा था कि अलक़ायदा पकड़ो -- अमरीका को दूर रखो.

पिछले दो तीन साल में न कोई अल क़ायदा नेता पकड़ा गया है. बल्कि तालेबान और अलक़ायदा और मज़बूत हो चुके हैं. मुशर्रफ़ ने तालेबान के साथ शांति समझौते करने शुरू किए क्योंकि ख़ुद उनकी लोकप्रियता काफ़ी कम हो गई थी.

नतीजा ये हुआ कि अमरीका ने पाकिस्तानी धरती पर सीधे सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी. आगे भी अगर ऐसा हुआ तो पाकिस्तानी समाज में अमरीका विरोध बढ़ेगा. यही नहीं वहाँ के लोग ख़ुद अपनी सरकार के ख़िलाफ़ खड़े हो जाएँगे और इस्लामी कट्टरपंथियों की ओर झुकेंगे.

पर अमरीका चाहता है कि या तो पाकिस्तान उसकी मदद करे या फिर ख़ामोश खड़ा देखता रहे. इस स्थिति में अगर पाकिस्तान बिखरता है तो सीधा असर भारत पर पड़ेगा अमरीका पर नहीं. क्योंकि अमरीका काफ़ी दूर है. अल क़ायदा और तालेबान उसके लिए चुनौती ज़रूर हैं ख़तरा नहीं. भारत और ईरान के लिए ये सीधा ख़तरा हैं.

(मुकेश शर्मा से बातचीत पर आधारित, ये बातचीत आप साप्ताहिक कार्यक्रम परिक्रमा में सुन सकते हैं)

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