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मोक्ष की आकांक्षा उन्हें ले आती है काशी

By Staff
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वाराणसी, 15 सितम्बर (आईएएनएस)। धर्म, अध्यात्म और मोक्ष की नगरी काशी के बारे में पौराणिक मान्यता है कि 'काश्याम् मरणान् मुक्ति:' अर्थात काशी में मरने मात्र से जीवात्मा को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए मुक्ति के आकांक्षी कई लोग आज भी जीवन के अंतिम पड़ाव पर यहां आ जाते हैं और यहां 'मुक्ति लाभ भवन' में रहते हुए अपनी अंतिम सांस छूटने का इंतजार करते हैं।

इस नगरी में मोक्षकामियों के रहने के लिए बाकायदा आठ आश्रम बनवाए गए थे। बीतते समय के साथ सात आश्रम तो बंद हो गए लेकिन एक आश्रम आज भी यथावत है, जिसमें अलग-अलग स्थानों से आए मोक्षकामियों की भीड़ लगी रहती है।

'मुक्ति लाभ भवन' के नाम से मशहूर इस सेवा आश्रम में ऐसे लोगों को प्रवेश दिया जाता है जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके होते हैं और काशी में ही रहकर प्राण त्यागना चाहते हैं। इस सेवा आश्रम में आने वाले लोगों के लिए रहने, खाने और यहां तक कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था की जाती है।

कई वर्षो से इस आश्रम की देखभाल करते आ रहे आश्रम के प्रबंधक राजकिशोर शुक्ल कहते हैं-"मोक्ष का मतलब ही होता है माया मोह और लेन-देन से विमुख हो जाना।" शुक्ल के अनुसार यहां आने वाले लोगों को यदि किसी चीज की जरूरत पड़ती है तो 'मुक्ति लाभ भवन' उन्हें उपलब्ध करवाता है।

इस आश्रम में जो लोग आते हैं उन्हें रहने के लिए एक कमरा दिया जाता है। मोक्ष की कामना रखने वाले लोगों की देखभाल करने वालों को भी सभी सुविधाएं दी जाती हैं। जैसे- खाना बनाने के लिए जगह, स्नान करने के लिए स्नानघर इत्यादि। इस मोक्षाश्रम का पूरा वातावरण भक्तिमय रहे इसके लिए यहां भजन-कीर्तन हमेशा होता रहता है।

आश्रम में ही राम-जानकी का एक मन्दिर है, जहां सुबह, दोपहर, शाम और रात में आरती होती है, जिसका प्रसाद गंगाजल और तुलसी मोक्षार्थी के मुंह में डाला जाता है। रहने के लिए वैसे तो यहां चाहे जितने दिन रहा जा सकता है लेकिन यहां आने वाले एक से दो सप्ताह में ही महायात्रा पर निकल पड़ते हैं। शुक्ल बताते हैं कि कभी-कभी ही ऐसा होता है कि यहां आने के बाद लोग वापस अपने घर लौट जाते हों।

काशी में अंतिम सांस की इच्छा लेकर आने वालों में उत्तरप्रदेश के अलावा बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के लोग सबसे ज्यादा होते हैं। इस आश्रम में कुल चौदह कमरे हैं जो आजकल पूरी तरह भरे हैं।

बिहार के रोहतास जिले के बेलहम गांव से अपने दादा को लेकर पिछले चार दिनों से यहां रह रहे विद्याधर पांडेय ने बताया, "हमारे दादाजी की अन्तिम इच्छा यही है कि वे अन्तिम सांस काशी में ही लें इसलिए हम लोग इन्हें लेकर यहां आए हैं।"

फिलहाल यहां 12 से अधिक वृद्ध महिला-पुरुष इस समय मुक्ति लाभ भवन में महायात्रा पर निकलने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। आम तौर पर किसी के मरने पर माहौल शोकाकुल हो जाता है लेकिन यहां रहते हुए जिनकी मृत्यु हो जाती है, उनके परिजनों के लिए यह सबसे हर्ष का विषय होता है। यहां से निकलने वाली शवयात्रा शोकाकुल नहीं होती है, बल्कि एक बारात की तरह निकलती है।

काशी में मरने पर मोक्ष मिलने की मान्यता का क्या कोई वैज्ञानिक आधार भी है, इस बारे में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और वैज्ञानिक डा. ओ. पी. उपाध्याय कहते हैं, "इसमें वैज्ञानिकता को ढूंढ़ना तर्क संगत नहीं है, क्योंकि मोक्ष की अवधारणा ही आस्था पर टिकी हुई है। ऐसे में यदि किसी को यह विश्वास हो जाए कि उसे मरने के बाद मोक्ष मिलने वाला है तो कम से कम वह चैन से मर तो सकेगा।"

वे कहते हैं, " हालांकि मरने के बाद जीवात्मा कहां जाती है? उसे स्वर्ग मिलता है या नरक? इस पर सदियों से वाद-विवाद होता रहा है लेकिन यह बात निर्विवाद है कि लोगों में 'मोक्ष' के प्रति हमेशा से आकर्षण रहा है।" काशी का 'मुक्ति लाभ भवन' उसी आकर्षण को सहलाने का काम कर रहा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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