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'बिग बैंग' प्रयोग के प्रणेता हैं बोस, पर नहीं मिला नोबल

By Staff
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लंदन, 10 सितम्बर (आईएएनएस)। जेनेवा में बुधवार को होने जा रहे अब तक के सबसे बड़े वैज्ञानिक प्रयोग के पीछे मुख्य रूप से वर्तमान और पूर्व के तीन बड़े वैज्ञानिकों का हाथ है। इनमें से एक को नोबल पुरस्कार से नवाजा जा चुका है, जबकि दूसरे को नवाजा जा सकता है। लेकिन, तीसरे वैज्ञानिक जो भारतीय थे और जिनके सिद्धांतों पर यह पूरा प्रयोग टिका है उन्हें आज तक नोबल से नवाजा नहीं जा सका।

लंदन, 10 सितम्बर (आईएएनएस)। जेनेवा में बुधवार को होने जा रहे अब तक के सबसे बड़े वैज्ञानिक प्रयोग के पीछे मुख्य रूप से वर्तमान और पूर्व के तीन बड़े वैज्ञानिकों का हाथ है। इनमें से एक को नोबल पुरस्कार से नवाजा जा चुका है, जबकि दूसरे को नवाजा जा सकता है। लेकिन, तीसरे वैज्ञानिक जो भारतीय थे और जिनके सिद्धांतों पर यह पूरा प्रयोग टिका है उन्हें आज तक नोबल से नवाजा नहीं जा सका।

सत्येंद्र नाथ बोस ही वह भारतीय वैज्ञानिक थे, जिनके शोध को भौतिक जगत ने स्वीकार करते हुए उनके नाम पर एक उप परमाणविक कण का नाम 'बोसोन' रखा। यह अंग्रजी भाषा में एक मात्र संज्ञा है, जिसे किसी भारतीय के नाम पर रखा गया है।

स्विटजरलैंड में आज किया जाने वाला वैज्ञानिक प्रयोग बोस और अल्बर्ट आइंस्टीन के सिद्धांतों के बगैर संभव नहीं हो सकता।

सन् 1924 में बोस ने एक सांख्यिकीय गणना का जिक्र करते हुए एक पत्र आइंस्टीन के पास भेजा था, जिसके आधार पर बोस-आइंस्टीन के गैस को द्रवीकृत करने के सिद्धांत का जन्म हुआ।

इस सिद्धांत के आधार पर ही प्राथमिक कणों को दो भागों में बांटा जा सका और इनमें से एक का नाम बोसोन रखा गया जबकि दूसरे का नाम इटली के भौतिक वैज्ञानिक इनरिको फैरमी के नाम पर रखा गया।

सन 1921 में आइंस्टीन को नोबल पुरस्कार से नवाजा गया जबकि फैरमी को 1938 में उनके 'फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट' संबंधी सिद्धांत के लिए नोबल से सम्मानित किया गया।

दशकों बाद 1964 में ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्गस ने बिग बैंग के बाद एक सेकेंड के अरबें हिस्से में ब्रह्मांड के द्रव्यों को मिलने वाले भार का सिद्धांत दिया, जो बोस के बोसोन सिद्धांत पर ही आधारित था। इसे बाद में 'हिग्गस-बोसोन' के नाम से जाना गया।

इस सिद्धांत ने न केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्यों को जानने में मददगार साबित हुआ बल्कि इसके स्वरूप को परिभाषित करने में भी मदद की।

बुधवार को यूरोपीय सेंटर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च द्वारा स्विटजरलैंड में किए जा रहे प्रयोग में काफी तेज गति से प्रोटोनों का एक दूसरे से भिड़ंत करवाया जाएगा, जो 'हिग्गस-बोसोन' का पहला व्यावहारिक परीक्षण है।

दरअसल, हिग्गस बोसोन अंतिम प्राथमिक कण है जिसे व्यावहारिक रूप में नहीं देखा गया है। हिग्गस, जो वर्तमान में इडेनबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, नोबल पुरस्कार जीतने की कतार में हैं। यह संभावना तब और प्रबल हो जाएगी जब हिग्गस बोसोन कण को खोज निकाला जाएगा।

भौतिक विज्ञान का पहला नोबल तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों-इरिक कॉरनेल, कार्ल विइमैन और वोल्फगैंग केटेरले को दिया गया था। इन्हें एक नए द्रव्य 'कंडेनसेट' की खोज के लिए यह पुरस्कार दिया गया, जिसकी कल्पना बोस और आइंस्टीन ने पहले ही कर दी थी।

बोस के पोते फाल्गुनी सरकार के मुताबिक बोस की सांख्यिकी के क्षेत्र में कार्य करने वाले छह अन्य वैज्ञानिकों को पहले ही नोबल से नवाजा चुका है। लेकिन कुछ कारणों से सत्येंद्र नाथ बोस कभी यह पुरस्कार नहीं जीत पाए।

एक अंग्रेज विज्ञान लेखिका और प्रसारणकर्ता शौरोन अन हॉलगेट ने बीबीसी के लिए बनाई अपनी डाक्यूमेंट्री में कहा था कि उनको कोई संदेह नहीं कि बोस नोबल पुरस्कार पाने के काबिल थे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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