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अब चिकित्सक सिर्फ धन कमाने की सोचता है : डा. प्रकाश आमटे

By Staff
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नई दिल्ली, 10 सितम्बर (आईएएनएस)। जनजातीय बहुल इलाकों में वर्षों से चिकित्सकीय सेवा में जुटे चिकित्सक और मैगसेसे पुरस्कार विजेता डा. प्रकाश आमटे का मानना है कि सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अत्यधिक पैसा आने से युवा वर्ग उस ओर आकर्षित हुआ है। अब चिकित्सक भी उनके बराबर रुपये कमाना चाहते हैं।

नई दिल्ली, 10 सितम्बर (आईएएनएस)। जनजातीय बहुल इलाकों में वर्षों से चिकित्सकीय सेवा में जुटे चिकित्सक और मैगसेसे पुरस्कार विजेता डा. प्रकाश आमटे का मानना है कि सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अत्यधिक पैसा आने से युवा वर्ग उस ओर आकर्षित हुआ है। अब चिकित्सक भी उनके बराबर रुपये कमाना चाहते हैं।

डा. प्रकाश समाजसेवी स्व. बाबा आमटे के पुत्र हैं। गत 35 वर्षो से वे अपनी पत्नी डा. मंदाकिनी आमटे के साथ मिलकर महाराष्ट्र के जनजातीय बहुल हेमलकसा गांव में सामाजिक कार्य कर रहे हैं। डा. दंपति प्रत्येक वर्ष विभिन्न राज्यों से आने वाले 50 हजार से अधिक मरीजों का इलाज करते हैं। यहां पेश हैं डा. प्रकाश आमटे से हाल ही में तमाम मसलों पर हुई बातचीत के मुख्य अंश :

प्रश्न- वर्तमान चिकित्सा तंत्र के शहरोन्मुखी और अमीरों के प्रति बढ़ती जवाबदेही पर आप क्या सोचते हैं?

उत्तर- सत्तर के दशक में चिकित्सा शिक्षा इतनी महंगी नहीं थी। तब युवाओं में एक प्रेरणा थी और वे वंचित वर्ग के प्रति संवेदनशील भी थे। आज सूचना प्रौैद्योगिकी क्षेत्र में अत्यधिक पैसा आ जाने से युवा वर्ग उस तरफ आकर्षित हुआ है और चिकित्सक भी उतना ही धन कमाने की सोचने लगा है। भारत की 20 प्रतिशत समृद्ध आबादी 80 प्रतिशत चिकित्सा व्यय का उपभोग कर रही है, जबकि 80 प्रतिशत आबादी को 20 प्रतिशत चिकित्सा व्यय में अपना काम चलाना पड़ता है। वह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। यह ठीक है कि गांव में सुविधाएं नहीं हैं लेकिन वहां भी तो इंसान ही रहते हैं।

आज युवा वर्ग के सामने कोई प्रेरणा नहीं है। बाबा (बाबा आमटे) ने कभी इस बात की चिंता नहीं की कि उनके बेटे कहां पढ़ेंगे। मैं चिकित्सक बना और विकास (भाई)इंजीनियर, परंतु हमें अपने बच्चों की चिंता थी। मित्रों के सहयोग से वे भी अब डाक्टर व इंजीनियर बन कर हमारे साथ ही काम कर रहे हैं।

प्रश्न- पुरस्कारों के बारे में आपकी क्या राय है?

उत्तर- अजीब बात है कि पुरस्कार उसी बात पर दिए जाते हैं जो बातें या कर्म प्रत्येक व्यक्ति को सामान्य तौर पर करना चाहिए। हर धर्म बताता है कि एक व्यक्ति को क्या करना चाहिए। एक व्यक्ति को केवल इसलिए पुरस्कृत कर दें कि वह चोरी नहीं करता तो इसका क्या अर्थ होगा? परंतु लोगों को लगता है कि मैंने कोई बड़ा काम किया है और अगर वे इससे उत्साहित होकर समाज के हित में कुछ करते हैं तो मुझे मिले इस पुरस्कार का कोई अर्थ है। हम लोगों ने जो कुछ किया है वह किसी प्रतिफल की आशा में नहीं किया है।

प्रश्न- आदिवासियों के बीच में कार्य करते हुए आपको नक्सलवाद से भी उलझना पड़ रहा है?

उत्तर- यह एक बड़ा मुद्दा है। सरकार के पास नक्सलवाद का कोई इलाज नहीं है। मूल समस्या यह है कि जब शोषण के खिलाफ शिकायत करने पर भी न्याय नहीं मिलता तब इसकी परिणिति कहीं न कहीं नक्सलवाद के रूप में होती है। हमें थोड़ी सफलता जरूर मिली है। इसकी वजह है शिक्षा का प्रसार। इसी के साथ हमने भ्रष्ट लोगों को पकड़वाया भी है, जो ज्यादा रुपये कमाते हैं और शोषण भी करते हैं। मेरा मानना है कि जब तक समाज में खुद झगड़ने की प्रक्रिया प्रारंभ नहीं होगी तब तक स्थितियों में सुधार नहीं होगा। अब डाक्टर बिनायक सेन को ही ले लीजिए। सारे मानवाधिकार संगठनों की मांग के बावजूद उन्हें नहीं छोड़ा गया। सरकारों को इस दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए।

प्रश्न- आपके प्राणी संग्रहालय की वर्तमान स्थिति क्या है?

उत्तर- भारत सरकार ने इसे शरणगाह (रेस्क्यूहोम) की तरह मान्यता दे दी है। इससे शरणगाह के गैरकानूनी होने की समस्या समाप्त हो गई है। पहले जनजातीय तो जंगल और शिकार पर ही निर्भर थे। वे सभी प्रकार के जीव-जंतु खा जाते थे। बंदरों के बच्चे तक खा जाते थे। हम लोगों ने उन्हें समझाया कि वे जानवरों के बच्चों को न मारें। फिर उनके लिए कृषि का विकास किया। उनके बच्चों के लिए स्कूल खोला गया। आज इस स्कूल में छह सौ बच्चे पढ़ते हैं। धीरे-धीरे उनकी शिकार पर निर्भरता समाप्त हो गई। यहां मेरे कहने का आशय यह है कि बिना विकल्प के आप समाधान नहीं कर सकते।

प्रश्न-अपने कार्य से आप कितने संतुष्ट हैं और इसमें किस तरह का विस्तार चाहते हैं?

उत्तर- मैं अपने कार्य से काफी हद तक संतुष्ट हूं। संतुष्टि की एक वजह यह भी है कि मेरे दोनों बेटे मेरे साथ ही काम करने लगे हैं। अभी भी वित्तीय संकट बरकरार है। मेरे कार्य का क्षेत्र भी विस्तृत हुआ है। मैं अपने कार्य को शिक्षा के क्षेत्र में और फैलाना चाहता हूं। शिक्षा का प्रसार आज की प्राथमिकता है। शिक्षित होकर ही आम आदमी अपनी मजदूरी और हक की लड़ाई लड़ सकता है।

प्रश्न-हमेशा ही बाबा आमटे के पुत्र के रूप में पहचाना जाना कभी ऊब पैदा नहीं करता?

उत्तर- ऐसा तो नहीं है। बाबा और ताई ने मुझसे कभी नहीं कहा कि ट्रक ड्राइवर बनो या डाक्टर बनो। हां यह ग्लानि अवश्य होती थी कि वे हम दोनों भाइयों के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाए। बाबा से हमने प्रेरणा ली, परंतु हम लोगों ने उनकी नकल नहीं किया। हम लोग अपनी सीमा जानते थे। जो कुछ मिला यह उसी का परिणाम है। यह बहुत ही अनूठा सम्मान है जो पिता और पुत्र दोनों को मैगसेसे के रूप में प्राप्त हुआ है। जहां तक बाबा आमटे के पुत्र के रूप में पहचाना की बात है, तो इस बारे मेरा कहना है कि जो चलता है वही नाम सामने आता है। बाबा मुखर थे और मैं अंतर्मुखी हूं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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