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    सिलिकोसिस के शिकार मज़दूरों की दास्तान

    By फ़ैसल मोहम्मद अली
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    मिल की फिज़ा में उड़ रही सिलिका साँस के ज़रिए वहां काम करने वालों के फेफड़ों में जमने लगती है
    फेफड़े की ख़तरनाक बीमारी सिलिकोसिस के शिकार हज़ारों मज़दूर प्रशासन की बेरुख़ी के कारण तिल तिल कर मरने को मजबूर हैं.

    रोज़ी रोटी की तलाश धनबाई को अगलगोटा से वडोदरा ले गई जहाँ उसे चंद दिनों का काम मिला,थोड़े रूपए मिले और मिला फेफड़े की ख़तरनाक बीमारी-सिलिकोसिस.

    मक्के के खेतों के बीच बनी अपनी झोंपडी में पड़ी 30 वर्ष की धनबाई अब अपने मौत के इंतज़ार में हैं. उसकी साँसे धौंकनी की तरह चल रही है.

    ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए किए गए वडोदरा के सफ़र में धनबाई के साथ उसके पति, दो बेटे और बेटी भी शामिल थे.

    एक बेटे मुकेश को सिलिकोसिस ने निगल लिया है और संगीता का फेफड़ा दिन ब दिन सिकुड़ता जा रहा है.

    इन सभी लोगों ने कुछ दिन क्वार्टज़ फैक्ट्रियों में काम किया था जहाँ पत्थर को मशीनों में पीसकर शीशा बनाने के लिए सिलिका डस्ट तैयार किया जाता है.

    मिल की फिज़ा में उड़ रही सिलिका साँस के ज़रिए वहां काम करने वालों के फेफड़ों में जमने लगती है जिससे व्यक्ति की साँस लेने की ताक़त घटी जाती है और फिर कम ऑक्सिजन मिलने की वजह से शरीर दूसरी बीमारियों का भी शिकार होने लगता है.

    बीमा और डाक्टर से लगातार परीक्षण की बात तो दूर काफ़ी मिल मालिक बिजली की बचत के चलते डस्ट कलेक्टर तक बंद कर देते हैं जो फिजा में धूल को कंट्रोल करता है.
    चिकित्सक प्रकाश ढोके कहते हैं कि सिलिकोसिस होने के बाद बीमार की मौत निश्चित है उसकी ज़िन्दगी के दिनों को दवा और अच्छे भोजन की मदद से कुछ लंबा ज़रूर किया जा सकता है.

    हज़ारों घरों की दास्तान

    गुजरात की सीमा से लगे दक्षिणी पश्चिमी मध्य प्रदेश के हज़ारों घरों की लगभग यही दास्तान है.

    कहीं पूरा का पूरा खानदान ही रोज़गार के साथ मिली इस बीमारी की भेंट चढ़ गया, जैसे रोडधा के ईदल सिंह के यहाँ से 14 लोग काम के लिए गुजरात गए अब उनमें से एक भी नहीं बचा है.

    या फिर गाँव के बीच एक लाइन से ढहते मिट्टी के घर जिनमें इस कहानी को कहने वाला भी कोई नहीं बचा.

    स्वंयसेवी संस्थान सिलिकोसिस से पीड़ितों की निश्चित संख्या जानने के लिए सर्वे करवाने पर जोर दे रहे हैं

    स्वयंसेवी संस्था खेडूत मजदूर चेतना संगठन, आदिवासी दलित मोर्चा और इंदौर स्थित शिल्पी केंद्र के रिपोर्टों के आधार पर दक्षिणी पश्चिमी प्रदेश के तीन जिलों के सिर्फ़ 61 गाँव में ही पिछले दो सालों में 800 से ज़्यादा लोग फेफड़े में जम गए शीशे की धूल की भेंट चढ़ गए.

    खेडूत मजदूर चेतना संगठन के शंकर तडवला के अनुसार अपने सर्वे के दौरान वह जिन गाँव में गए वहां उन्हें दूसरे गाँव में भी पीड़ित लोगों के बारे में बताया गया.

    वे कहते हैं कि कि सिर्फ़ मध्य प्रदेश ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों राजस्थान के बांसवाडा, डूंगरपुर और गुजरात के पंचमहल, गोधरा, दाहोद, वडोदरा वगैरह में भी मजदूर इसकी चपेट में हैं.

    स्वयंसेवी संस्थाओं का कहना है कि प्रशासन को सिलिकोसिस से ग्रसित मजदूरों की सही संख्या जानने के लिए एक व्यापक अंतर्राज्यीय सर्वे करवाना चाहिए.

    लेकिन पिछले लगभग एक दशक से गुजरात, फिर राजस्थान और अब मध्य प्रदेश में इस मामले पर उठी आवाज़ों के बावजूद सरकारों ने इस पर कोई पहल नहीं की.

    बेफ़िक्र प्रशासन

    मध्य प्रदेश के झाबुआ,धार और अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल इलाकों से मजदूरों का भारी संख्या में पास के राज्यों में पलायन होता है जहाँ वह खेतों, भवन निर्माण के आलावे सिलिका निकालने वाली फैक्ट्रियों में भी काम करते हैं.

    फैक्ट्रियों में धूल कंट्रोल करने वाली मशीनों की ग़ैर मौज़ूदगी या फिर उनका उनका इस्तेमाल नहीं किए जाने और मजदूरों के मास्क प्रयोग नहीं करने की वजह से सिलिका डस्ट वहां काम करने वालों के फेफड़ों में जमा होने लगता है.

    हालांकि गोधरा स्थित एक कारखाना मालिक हातिम अब्बास मिल 'ऑटोमेटेड प्लांट' दिखाते हुए कहते हैं कि वहां धूल की कोई गुंजाइश ही नहीं, फिर भी वह मज़दूरों को मास्क वगैरह देते है, डॉक्टर से उनका नियमित परीक्षण होता है और मजदूरों के लिए बीमा कि सुविधा भी है.

    शिल्पी केन्द्र के अमूल्य निधि का कहना है, "बीमा और डाक्टर से लगातार परीक्षण की बात तो दूर काफ़ी मिल मालिक बिजली की बचत के चलते डस्ट कलेक्टर तक बंद कर देते हैं जो फिजा में धूल को कंट्रोल करता है. मजदूरों का नाम रजिस्टर पर चढ़ा ही नहीं होता तो बीमा कहाँ से मिलेगा?"

    अलीराजपुर के मालवी ग्राम में सिलिकोसिस पीड़ित सुमारिया के मान से यह पूछने पर कि वह बेटे का इलाज कैसे करवा रही है वह कहती है, "इलाज के लिए रूपए कहाँ? घर के बर्तन, बकरी, मुर्गा-मुर्गी तक तो बिक चुका है?"

    तो घर कैसे चलता है?

    उनका कहना है, "कभी जंगल की लकड़ी बेचकर या भीख मांग कर."

    प्रशासन की बेरुखी से हताश संस्थाओं ने हाल में ही राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग के सामने यह मामला पेश किया जिसके आदेश पर मुंबई स्थित सेंट्रल लेबर संस्थान ने सर्वेक्षण किया.

    इस सर्वेक्षण में सिलिकोसिस के 41 निश्चित मरीज़ पाए गए.

    अमूल्य निधि कहते हैं कि इस रिपोर्ट के बाद फर्क सिर्फ़ इतना आया है कि प्रशासन यह मान रहा है कि इलाके में सिलिकोसिस है.

    इधर मानवधिकार आयोग ने लिखा है कि वह अब इस मामले में कुछ नहीं कर सकता क्योंकि इसको लेकर एक मुक़दमा अदालत में दर्ज है.

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