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भारत को ख़ुद लड़नी पड़ेगी ये लड़ाई

By अरुण भगत
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9/11 के सात साल बाद आतंकवाद के मोर्चे पर स्थितियों में कोई बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आया है. लेकिन एक बात तय है भारत को अपनी लड़ाई ख़ुद लड़नी पड़ेगी.

कई आतंकवादी संगठन भारत के ख़िलाफ़ अभी तक सक्रिय हैं. भारत सरकार ने इस मोर्चे पर वो दृढ़ता नहीं दिखाई है. इसलिए भारत में आतंकवाद का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ है.

भारत 9/11 से पहले भी आतंकवाद से प्रभावित था, लेकिन 9/11 के बाद भारत को इस मोर्चे पर कुछ सफलता भी मिली. इसके इनकार नहीं है.

मसलन कई आतंकवादी संगठनों पर पाबंदी लगी. पाकिस्तान पर भी दबाव बना कि वो इन गुटों की सहायता करना बंद करे.

लेकिन इन सबके कारण भारत को बड़ा नुक़सान भी हुआ है. नुक़सान ये कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय गुटों पर थोड़ी लगाम तो लगी लेकिन भारत के अंदर कई गुट सक्रिय हो गए. भारत को अपने घर में ही इन गुटों से चुनौतियाँ मिलने लगी.

नुक़सान

भारत के अंदर के संगठनों के तार अंतरराष्ट्रीय गुटों से जुड़ने लगे. भारत को इससे बड़ा नुक़सान हुआ. 9/11 के बाद पश्चिमी देशों का नज़रिया तो बदला लेकिन यह सहानुभूति के रूप में ज़्यादा सामने आया.

भारत के अंदर के संगࢠनों के तार अंतरराष्ट्रीय गुटों से जुड़ने लगे. भारत को इससे बड़ा नुक़सान हुआ. 9/11 के बाद पश्चिमी देशों का नज़रिया तो बदला लेकिन यह सहानुभूति के रूप में ज़्यादा सामने आया

मैं ये नहीं कहता कि भारत को इस मोर्चे पर मदद नहीं मिली है. अबू सलेम जैसे लोगों के प्रत्यर्पण में भी भारत को सफलता मिली है.

एक और अहम सफलता मिली आतंकवादी गुटों के वित्तीय नेटवर्क पर नियंत्रण स्थापित करने में. लेकिन ज़मीनी सच्चाई ये है कि इन आतंकवादी गुटों पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने में सफलता नहीं मिल पाई.

एक सकारात्मक चीज़े ये हुई कि पहले पश्चिमी देश ये मानने को तैयार नहीं थे कि आतंकवाद से पूरी दुनिया प्रभावित है. पहले पश्चिमी देश इसकी अनदेखी कर रहे थे.

बदलाव

लेकिन 9/11 के बाद हालात बदले और पश्चिमी देश यह मान गए कि भारत आतंकवाद से प्रभावित है. इस बात से भी मैं इनकार नहीं करता कि पश्चिमी देश भारत के मसले को लेकर गंभीर नहीं हैं.

9/11 के बाद पश्चिमी देशों का नज़रिया बदला

वे गंभीर तो हैं लेकिन भारत को अपनी लड़ाई तो ख़ुद ही लड़नी पड़ेगी. आतंकवाद के मोर्चे पर जो नाकामी है, वो हमारी कमी है. 11 सितंबर के बाद एक और चीज़, जो बदली है- वह है ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ सहयोग और समन्वय.

सहयोग और समन्वय का स्तर बढ़ा है. सूचनाओं का आदान-प्रदान भी अब नियमित रूप से हो रहा है.

इन सबके बावजूद एक पूर्व अधिकारी होने के नाते मुझे लगता है कि आतंकवाद के मोर्चे पर लड़ाई को लेकर राजनीतिक तौर पर भारत कमज़ोर हुआ है.

अब वोट बैंक राजनीति भी इसमें आ गई है. बड़े क़दम उठाते समय इस पर ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है कि कहीं इससे वोट बैंक तो प्रभावित नहीं होगा.

ये एक बड़ी वजह है कि आतंकवाद के मोर्चे पर भारत सफल नहीं हो पा रहा है और ऐसी कई घटनाएँ हो रही हैं.

(पंकज प्रियदर्शी से बातचीत पर आधारित)

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