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समझौते की अमरीकी संसद में होगी परीक्षा

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जुलाई, 2005 में मनमोहन-बुश बातचीत के बाद इस समझौते की प्रक्रिया शुरु हुई थी
परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों की मंज़ूरी मिलने के बाद घटनाक्रम अमरीका स्थानांतरित हो गया है. इसे अब अमरीकी कांग्रेस से अंतिम मंज़ूरी मिलनी बाकी है. प्रेक्षकों का कहना है कि बुश प्रशासन को अमरीकी सांसदों को 26 सितंबर को सत्रावसान से पहले इस समझौते को पारित करने के लिए राजी करना होगा.

अमूमन ऐसे समझौतों को पारित करने के लिए 30 दिनों का सत्र बुलाए जाने की ज़रूरत होती है. उनके सामने परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों की मंज़ूरी और भारत-अमरीका के बीच हुए 123 समझौते को रखा जाएगा जिसे उन्हें हरी झंडी देनी होगी, उसके बाद ही ये समझौता प्रभावी हो पाएगा.

इधर परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह की मंज़ूरी मिलने पर अमरीका और भारत की सरकारों ने इसे 'ऐतिहासिक' कदम बताया है.

हम इस फ़ैसले का स्वागत करते हैं....ये भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कदम है...ये दशकों से भारत के परमाणु मुख्यधारा से अलग-थलग होने को ख़त्म करता है. मैं अमरीका और परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के अन्य सदस्यों की इस बारे में भूमिका के लिए उनका शुक्रिया अदा करता हूँ.
लेकिन भारत में विपक्षी दलों ने इस बारे में अपनी चिंताएँ दोहराई हैं.

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बयान में कहा," हम इस फ़ैसले का स्वागत करते हैं....ये भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कदम है...ये दशकों से भारत के परमाणु मुख्यधारा से अलग-थलग होने को ख़त्म करता है. मैं अमरीका और परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के अन्य सदस्यों की इस बारे में भूमिका के लिए उनका शुक्रिया अदा करता हूँ."

अमरीका के हथियार नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के कार्यवाहक उपमंत्री जॉन रॉड ने कहा, "ये परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के लिए, भारत के लिए और भारत-अमरीका संबंधों के लिए ऐतिहासिक क्षण है."

उनका कहना था, "यही नहीं ये भारत के बाकी दुनिया के साथ संबंधों के संदर्भ में भी ऐतिहासिक समय है. ये परमाणु अप्रसार प्रणाली को मज़बूत बनाने के लिए भी महत्वपूर्ण समय है."

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा है, "तकनीक और परमाणु ईंधन की आपूर्ति की गारंटी के बिना परमाणु परीक्षण के अधिकार को त्याग देना, इस समझौते को बेमानी बना देता है. यदि भारत परीक्षण करता है तो परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह की शर्तों के तहत उसे ईंधन की सप्लाई बंद हो जाएगी और करोड़ों रुपयों का निवेश व्यर्थ जाएगा."

उधर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी का कहना था कि इससे असैनिक उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत और अन्य देशों के बीच सहयोग का नया दौर शुरु होगा.

उनका कहना था कि ये हमारी उम्मीदों के मुताबिक है और सरकार की नीति, निशस्त्रीकरण और अप्रसार पर राष्ट्रीय आम राय के अनुरूप है.

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