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'सुरक्षाबल-माओवादी बच्चों को बख़्श दें'

By Staff
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एसपीओ को नक्सलियों से निपटने के लिए बंदूक दिए गए हैं
अमरीका के मानवाधिकार संगठन ने कहा है कि सुरक्षा बल और माओवादी विद्रोही दोनों ही छत्तीसगढ़ के संघर्ष में बच्चों का उपयोग करना तत्काल बंद कर दें.

ह्यूमनराइट्स वॉच ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा है कि छत्तीसगढ़ में दोनों ही पक्ष हथियारबंद संघर्ष में बच्चों का उपयोग कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद या माओवाद को देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बताया है.

पिछले 20 सालों में विद्रोहियों से जुड़ी हिंसा में छह हज़ार से भी अधिक लोगों की मौत हो चुकी है.

हालांकि भारत के 29 राज्यों में से लगभग आधे राज्य माओवादी हिंसा के शिकार हैं लेकिन छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश में यह समस्या सबसे अधिक है.

भयावह

'ख़तरनाक ड्यूटी: बच्चे और छत्तीसगढ़ का संघर्ष' शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों को हथियारबंद संघर्ष में लगाने से न केवल उनके घायल होने और मारे जाने का ख़तरा पैदा होता है बल्कि इससे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का भी उल्लंघन होता है.

यह शर्मनाक है कि सरकार और नक्सलवादी दोनों ही ऐसे ख़तरनाक ढंग से बच्चों का शोषण कर रहे हैं
ह्यूमन राइट्स वॉच की ओर से बच्चों के अधिकार की वकालत करने वाले जो बेकर ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है, "यह भयावह है कि छत्तीसगढ़ के संघर्ष में बच्चे भी हिस्सा ले रहे हैं."

उन्होंने कहा है, "यह शर्मनाक है कि सरकार और नक्सलवादी दोनों ही ऐसे ख़तरनाक ढंग से बच्चों का शोषण कर रहे हैं."

रिपोर्ट में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ के हथियारबंद संघर्ष में दोनो ही पक्ष बच्चों का उपयोग कर रहे हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि विद्रोहियों का कहना है कि उनकी नीति है कि वे 16 साल से अधिक उम्र के बच्चों को ही अपने दल में भर्ती करते हैं लेकिन उन्होंने माना है कि कई बार वे 12 साल के बच्चों को भी अपने दल में भर्ती कर लेते हैं.

दूसरी ओर सरकार समर्थित सलवा जुड़ुम में नक्सल-विरोधी कार्रवाइयों के लिए बच्चों का उपयोग किया जा रहा है.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों और सलवा जुड़ुम के बीच भीषण संघर्ष चल रहा है

रिपोर्ट में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने माना है कि उसने 18 साल से कम उम्र के बच्चों को स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर्स (एसपीओ) के रूप में भर्ती किया है क्योंकि उनके पास कोई उम्र प्रमाणपत्र नहीं था.

ह्यमनराइट्स वॉच का कहना है कि हालांकि सरकार का कहना है कि उन्होंने कम उम्र के बच्चों को एसपीओ के पद से हटा दिया है लेकिन संस्था की जाँच में पता चला है कि वे अभी भी पुलिस के साथ काम कर रहे हैं और नक्सल विरोधी कार्रवाइयों में हिस्सा ले रहे हैं.

संस्था ने भारत सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार दोनों से अपील की है कि वे कम उम्र के ऐसे बच्चों की पहचान और उनके पुनर्वास के लिए कोई योजना बनाएँ, जो एसपीओ की तरह काम कर रहे हैं या नक्सलियों के दलों में भर्ती कर लिए गए हैं.

विरोधाभास

ह्यमन राइट्स वॉच की 58 पृष्ठों की यह रिपोर्ट 160 लोगों से हुई बातचीत पर आधारित है.

इन लोगों में ग्रामीण, सलवा जुड़ुम के कैंप निवासी, पुलिस, एसपीओ और पहले नक्सलियों के साथ रह चुके बच्चे शामिल हैं.

नक्सली 12 साल के बच्चों को भी भर्ती कर लेते हैं

संस्था का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने 2005 में दंतेवाड़ा और बीजापुर ज़िलों में 3500 एसपीओ की भर्ती की थी इसमें अज्ञात संख्या में बच्चे भी शामिल थे.

ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि वर्ष 2007 के अंत में छत्तीसगढ़ पुलिस ने स्वीकार किया था कि उन्होंने ग़लती से ही कम उम्र के बच्चों को एसपीओ के रुप में भर्ती कर लिया था और 150 लोगों को पद से हटा दिया गया है.

लेकिन एसपीओ और सामाजिक कार्यकर्ता स्वीकार करते हैं कि 18 साल से कम उम्र के बच्चे अभी भी एसपीओ के रुप में कार्य कर रहे हैं.

विज्ञप्ति के अनुसार जुलाई 2008 में भारत के गृहमंत्रालय ने ह्यूमन राइट्स वॉच की इस रिपोर्ट को एकदम ग़लत बताया था कि छत्तीसगढ़ पुलिस कम उम्र के बच्चों को एसपीओ के रुप में भर्ती कर रही है लेकिन केंद्रीय गृहमंत्रालय का यह दावा छत्तीसगढ़ पुलिस की स्वीकारोक्ति का विरोधाभासी था.

संस्था का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने यह स्वीकारोक्ति ह्यूमनराइट्स वॉच और राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग जैसी सरकारी संस्था के समक्ष की थी.

रिपोर्ट में एर्राबोर कैंप में रह रहे एक बच्चे के हवाले से कहा गया है, "पुलिस ने मुझे एसपीओ बनने को कहा लेकिन मैंने मना कर दिया क्योंकि मैं हिंसा में शामिल नहीं होना चाहता था. मैं लोगों को गोली नहीं मारना चाहता था. उन्होंने मुझसे नहीं पूछा कि मेरी उम्र क्या है. यदि कोई 14 साल का भी है तो एसपीओ बन सकता है."

नक्सलियों के बारे में संस्था ने कहा है कि वे एक दशक से भी ज़्यादा समय से वे बच्चों को अपने दल में भर्ती कर रहे हैं.

संस्था का कहना है कि नक्सली इन बच्चों का उपयोग सूचना एकत्रित करने के अलावा बारूदी सुरंग बिछाने और बम लगाने के लिए भी करते रहे हैं.

जो बेकर ने कहा है, "पीपुल्स वार यानी जनसंघर्ष के नाम पर बच्चों को संघर्ष के लिए भर्ती करना हरगिज़ स्वीकार्य नहीं है."

नक्सलियों के साथ काम करने के बाद आत्मसमर्पण करने वाले बच्चों को एक और तो नक्सली प्रताड़ित करते हैं और दूसरी और छत्तीसगढ़ पुलिस उन्हें पुनर्वास के रुप में एसपीओ बना देती है
रिपोर्ट में नक्सलियों के साथ काम कर चुके एक बच्चे के अनुभव भी है, "मैं 13 या 14 साल का था, मैं एक आश्रम स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था. हॉस्टल में नक्सली आए और मुझे साथ चलने को कहा. मैं दसवीं तक पढ़ना चाहता था लेकिन उनके साथ जाना पड़ा.....हमें हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया गया, बारूदी सुरंग के बारे में बताया गया और थोड़ा कराटे सिखाया गया....एक साल बाद मैं निकल भागने में सफल हुआ....नक्सलियों ने मेरे दोनों भाइयों को मार डाला, उन्होंने मेरी माँ को मारा और उसका हाथ तोड़ दिया. उन्होंने हमारा घर भी जला दिया."

संस्था का कहना है कि नक्सलियों के साथ काम करने वाले बच्चे यदि आत्मसमर्पण भी करते हैं तो उनकी मुसीबतें ख़त्म नहीं होतीं.

रिपोर्ट में कहा गया है, "नक्सलियों के साथ काम करने के बाद आत्मसमर्पण करने वाले बच्चों को एक ओर तो नक्सली प्रताड़ित करते हैं और दूसरी ओर छत्तीसगढ़ पुलिस उन्हें पुनर्वास के रुप में एसपीओ बना देती है."

ह्यूमन राइट्स वॉच को पता चला है कि बच्चे नक्सलियों को छत्तीसगढ़ पुलिस अगर पकड़ लेती है तो उन्हें मारापीटा जाता है और प्रताड़ित किया जाता है.

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