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बाढ़ पीड़ितों को रोज़े को लेकर दिक्कत

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बाढ़ पीड़ित मुसलमान को विशेष समस्या का सामना करना पड़ रहा है
अररिया में बाढ़ प्रभावितों की बड़ी संख्या मुसलमानों की है और राहत शिविरों में उन्हें रोज़े को लेकर दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है.

बाढ़ ने लोगों का सबकुछ छीन लिया है लेकिन वो नहीं चाहते कि मुसीबत के समय वो रोज़ा न रखें. सुबह से शाम भूखे रहने के बाद उन्हें राहत शिविरों में अगर कुछ मिल रहा है तो वो है बस खिचड़ी.

अररिया शहर में राहत शिविरों में स्थानीय लोग बहुत मदद कर रहे हैं और कुछ धार्मिक संगठनों ने रोज़े के दौरान बाढ़ पीड़ितों को रोज़े के लायक कुछ चीज़ें मुहैया कराने की कोशिश की है.

अररिया शहर के आज़ादनगर राहत शिविर में बड़ी संख्या में लोग सुपौल से आए हैं.

ऐसे ही एक शरणार्थी नसीब अख्तर कहते है,'' मुसीबत तो है ही. घर बार सब डूब गया लेकिन यहां रोज़े में भी खिचड़ी खाते खाते परेशान हो गए हैं. बच्चों को दूध नहीं है. हम दिन भर भूखे रहते हैं फिर शाम को खिचड़ी मिलती है. अब लोगों ने कहा है कुछ बेहतर मिल सकेगा.''

मुसीबत तो है ही. घर बार सब डूब गया लेकिन यहां रोज़े में भी खिचड़ी खाते खाते परेशान हो गए हैं. बच्चों को दूध नहीं है. हम दिन भर भूखे रहते हैं फिर शाम को खिचड़ी मिलती है. अब लोगों ने कहा है कुछ बेहतर मिल सकेगा

नसीब कहते हैं,'' कभी तो दो बार खाना मिलता है लेकिन कई बार तो एक ही बार खाना मिल पाता है. भूखे रह जाते हैं, सुबह कुछ नहीं मिलता है तो हम भूखे ही रह जाते हैं दिन भर फिर शाम को सिर्फ़ खिचड़ी. हमें तो दाल भात ही मिल जाए तो हम पेट भर लें.''

यही हालत कमोबेश उन सभी लोगों की है जो राहत शिविरों में हैं चाहे वो मुस्लिम हों या हिंदू. दिक्कतों से जूझ रहे लोग वैसे तो चुप रहते हैं लेकिन जैसे ही उन्हें लगता है कि कोई उनकी बात सुनेगा उनका दुख निकल पड़ता है.

अररिया शिविर चला रहे जमात उलेमा ए हिंद के प्रतिनिधियों ने कहा कि वो रोज़े के दौरान कुछ बेहतर भोजन उपलब्ध कराएंगे और वो चीज़ें उपलब्ध कराने की कोशिश करेंगे जो रोज़े के दौरान इस्तेमाल होती हैं, मसलन चना, खजूर कुछ फल इत्यादि.

कुछ संगठन अररिया शहर में चल रहे तकरीबन सभी राहत शिविरों के लिए मदद मुहैया करा रहे हैं और सरकारी मदद सिर्फ़ एक दो दिन पहले शुरु हो सकी है.

उधर फारबिसगंज के पास के राहत शिविरों में ऐसी न तो कोई व्यवस्था है और न ही कोई संगठन ही मुस्लिमों के लिए या किसी और की मदद के लिए आगे आया है.

बथनाहा राहत शिविर

बथनाहा राहत शिविर में जब हम पहुंचे तो लोगों ने ख़राब खाने की शिकायत की.

अररिया के राहत शिविरों में खाने को लेकर परेशानी पेश आ रही है

कई लोग तो वो खिचड़ी लेकर आ गए जो उन्हें दी गई थी. यह अत्यंत ख़राब थी और साफ़ नज़र आ रहा था कि जो खाएगा, वो बीमार पड़ जाएगा.

इस शिविर में कम से कम पांच हज़ार लोग हैं और कमोबेश सभी की यही शिकायत थी.

जब मैंने पूछा कि क्या रोज़े के कारण उन्हें खिचडी पसंद नहीं आ रही है तो उनका कहना था कि ऐसा नहीं है. वो इतना चाहते हैं कि हर दिन खिचड़ी न दी जाए और कम से कम चौबीस घंटे में दो बार खाना दिया जाए.

उन्हें पता था कि जहां एक बार खाना मिलना नसीब नहीं है वहां अच्छे खाने की मांग तो करना बेमानी है.

चैनपुर ब्लाक से यहां हज़ारों की संख्या में शरणार्थी जमा थे. सैकड़ों बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे और कई महिलाएं गर्भ से थीं जिनके लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी.

ऐसी ही एक महिला ने कहा,'' मैं पेट से हूँ और मेरा एक बच्चा बीमार है. उसे लगातार दस्त हो रहे हैं. ऐसी हालत में रोज़े रखती हूं आप ही बताइए क्या हालत होगी.''

लोगों ने मुझसे बार बार बस इतना आग्रह किया कि मैं जाकर भोजन बनाने वाले से इतना ज़रुर कहूं कि भोजन ऐसा मिले जो खाने योग्य हो.

अगर ऐसा ही ख़राब खाना खिलाकर मारना था तो पानी से क्यों निकाला. वहीं छोड़ दिया जाता हमें तो कम से कम अपने घर में तो मर जाते

रामशरण नाम के एक व्यक्ति तो इतना दुखी थे कि उन्होंने कहा,'' अगर ऐसा ही ख़राब खाना खिलाकर मारना था तो पानी से क्यों निकाला. वहीं छोड़ दिया जाता हमें तो कम से कम अपने घर में तो मर जाते.''

लोगों में इतना रोष था कि वो चिल्ला रहे थे कोई उनकी बात सुन ले लेकिन सरकारी शिविर में उनकी सुनने वाला कोई नहीं था.

कहीं कोई बीमार था तो कहीं कोई रो रहा था. जहां भोजन के लिए कतार लगी हुई थी वहां कोई डंडे लेकर लोगों को भगा रहा था.

जब मैंने इस राहत शिविर में भोजन की ज़िम्मेदारी निभा रहे प्रद्युम्न विश्वास से भोजन की समस्या के बारे में पूछा तो उनका कहना था,'' हाँ ये समस्या तो है और मुझे पता है. हम कोशिश कर रहे हैं कि कुछ किया जाए ताकि लोगों को दिक्कत कम हो. हम अब दो बार भोजन देने की कोशिश करेंगे सुबह से पहले और रात में ताकि रोज़े से पहले लोग कुछ खा सकें.''

बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए कुछ विशेष उपाय करने के बारे में पूछे जाने पर विश्वास ने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा कि सरकार से उन्हें दूध देने की अनुमति नहीं है और न ही किसी के लिए कोई विशेष आहार की.

इस अधिकारी के चेहरे से विवशता साफ झलक रही थी और अंतत उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा कि आप इस बारे में ज़िला प्रशासन से पूछिए क्योंकि वही लोग कुछ कर सकते हैं.

कोसी ने जात पात और धर्म का भेद किए बिना अपना क़हर सभी पर बरपाया है लेकिन इस मुसीबत में रोज़े रखने की मजबूरी ने मुसलमान शरणार्थियों की दिक्कतें और भी बढ़ा दी हैं.

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