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    परमाणु करार : भारत केवल 123 समझौता मानने को बाध्य (इंट्रो राउंडअप-1)

    By Staff
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    नई दिल्ली/वाशिंगटन, 3 सितम्बर (आईएएनएस)। परमाणु परीक्षण करने की स्थिति में प्रौद्योगिकी व ईंधन की आपूर्ति रोकने संबंधी अमेरिकी प्रशासन के 'गोपनीय पत्र' के उजागर होने के बाद भारत ने कहा है कि वह केवल '123 द्विपक्षीय समझौते' के प्रति बाध्य है और उसे आशा है कि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में उसे छूट मिल जाएगी।

    एनएसजी की गुरुवार को होने वाली दो दिवसीय बैठक से पूर्व उजागर हुए इस तथ्य के बाद देश में मचे राजनीतिक बवंडर के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की और वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। करार के मसले पर देश को गुमराह करने के विपक्ष के आरोपों के बीच बुधवार रात को यह बैठक बुलाई गई।

    इससे पूर्व विदेश मंत्रलाय के प्रवक्ता नवतेज सरना ने दिल्ली में एक बयान में कहा, "सरकार का ध्यान अमेरिकी समाचार पत्र की रिपोर्ट ने खींचा है। हम दूसरी सरकारों के विभिन्न विभागों के बीच आंतरिक संवादों पर प्रतिक्रिया नहीं देते।"

    सरना ने कहा, "हम केवल अमेरिका के साथ द्विपक्षीय समझौते, भारत के लिए विशेष सेफगार्ड समझौते और एनएसजी से छूट के बारे में जानते हैं। हमें आशा है कि 4-5 सितम्बर को होने वाली एनएसजी की बैठक में भारत को परमाणु व्यापार की छूट मिल जाएगा।"

    सरना अमेरिकी विदेश विभाग के उस पत्र पर प्रतिक्रिया दे रहे थे जिसमें कहा गया है कि भारत के परमाणु परीक्षण करने की स्थिति में अमेरिका उसको परमाणु प्रौद्योगिकी व ईंधन की आपूर्ति रोक देगा।

    बुश प्रशासन द्वारा अमेरिकी संसद के विदेश मामलों की समिति को 16 जनवरी 2008 को भेजे 26 पृष्ठों के जवाबी पत्र से इन तथ्यों का खुलासा हुआ है। समिति के अध्यक्ष हार्वर्ड ली. बर्मन के पूर्ववर्ती टॉम लैनटॉस ने अक्टूबर 2007 में अमेरिकी विदेश विभाग से परमाणु करार से संबंधित 45 सवाल पूछे थे। इस संवाद को विदेश विभाग के अनुरोध पर पिछले नौ महीने से गोपनीय रखा गया था।

    बर्मन ने संवाद को मंगलवार को सार्वजनिक किया था, जिसे बुधवार को समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट ने प्रकाशित किया। यह नाटकीय खुलासा गुरुवार को विएना में 45 सदस्यीय परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की होने वाली बैठक से पहले हुआ है। गुरुवार से शुरू हो रही दो दिवसीय बैठक में भारत के साथ परमाणु व्यापार की छूट देने पर विचार किया जाएगा।

    अखबार में छपी रिपोर्ट में बर्मन के प्रवक्ता लिन्ने वेल ने कहा, "उन्होंने इन जवाबों को मंगलवार को सार्वजनिक किया था। उन्होंने कहा कि यदि एनएसजी भारत के साथ परमाणु व्यापार की छूट दे देता है तो करार को अंतिम मंजूरी के लिए शीघ्र अमेरिकी कांग्रेस के समक्ष पेश किया जाएगा। ऐसे में वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि इस बारे में अमेरिकी कांग्रेस के पास प्र्याप्त जानकारियां मौजूद हों।"

    इधर, भारत में अमेरिका के राजदूत डेविड मलफोर्ड ने नई दिल्ली में कहा कि 16 जनवरी के पत्र में कोई गोपनीय चीज नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्र में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिसे अब तक अमेरिकी संसद और भारत सरकार के समक्ष उजागर नहीं किया गया हो।

    इन बीच भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रमुख अनिल काकोडकर को दिल्ली बुलाया है ताकि इस खुलासे के बाद एनएसजी को गए नकारात्मक संकेतों से निपटने के लिए रणनीति बनाई जा सके।

    इस सबके बीच करार को लेकर देश की राजनीति में नया बवंडर खड़ा हो गया है। खुलासे के बाद प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तीफा मांगा है।

    पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी की ओर से जारी किए गए एक साझा बयान में कहा गया है कि इस पत्र ने मनमोहन सरकार की पोल खोल कर रख दी है।

    भाजपा नेताओं ने कहा है कि इस खुलासे ने परमाणु सरकार को लेकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (सपं्रग) सरकार द्वारा बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए जा रहे दावों को खोखला साबित कर दिया है और साथ ही भाजपा की आपत्तियों को सही साबित ठहाराया है।

    यद्यपि, सत्ताधारी कांग्रेस ने कहा है कि भारत सरकार केवल 123 द्विपक्षीय समझौते से जुड़ी हुई है। नई दिल्ली में कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा, "इसमें चिंतित होने वाली कोई चीज नहीं है। हमें समझौते पर पुनर्विचार और पुनर्मूल्यांकन करने की कोई जरूरत नहीं है।"

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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