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स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या से उपजे सवाल

By Staff
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नई दिल्ली, 4 सितम्बर (आईएएनएस)। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। स्पष्ट हो चुका है कि ईसाई मिशनरियों द्वारा षड्यंत्रपूर्वक यह हत्या की गई है। शासन और समाज के लोग उनकी हत्या किए जाने की आशंका के बावजूद उन्हें बचा नहीं सके, यह भी अत्यंत कष्टकारी और दुर्भाग्यपूर्ण है।

नई दिल्ली, 4 सितम्बर (आईएएनएस)। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। स्पष्ट हो चुका है कि ईसाई मिशनरियों द्वारा षड्यंत्रपूर्वक यह हत्या की गई है। शासन और समाज के लोग उनकी हत्या किए जाने की आशंका के बावजूद उन्हें बचा नहीं सके, यह भी अत्यंत कष्टकारी और दुर्भाग्यपूर्ण है।

छह माह पूर्व भी इन्हीं मिशनरी तत्वों के द्वारा स्वामी लक्ष्मणानंद पर हमला किया गया था। उस समय जितनी भी घटनाएं हुईं और प्रतिक्रियास्वरूप जो संघर्ष हुए, उसकी जांच में भी यह बात सामने आई थी कि उसमें कहीं न कहीं नक्सलवादी तत्व सक्रिय थे। यह बात भी स्पष्ट रूप से सामने आयी थी कि ईसाई मिशनरियां और नक्सलवादी एक-दूसरे को मदद पहुंचा रहे हैं।

इन दोनों की सोची-समझी, पूर्वनियोजित साजिश के तहत यह हत्या की गई है। इस घटना की गंभीरता को समझते हुए इस पूरे प्रकरण पर गहन चिंतन-मनन होना चाहिए ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

हम वनवासी क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता जानते हैं कि ईसाई मिशनरियां हमारे वनवासी बहन-बांधवों के स्वाभिमान, अस्मिता और राष्ट्रीयता को नष्ट करना चाहती हैं, उनकी मूल पहचान को बदलना चाहती हैं। कंधमाल की स्थितियां कुछ भिन्न हैं। वहां ये मिशनरियां वंचित वर्ग में कुछ अधिक प्रभावी हैं।

इस मतांतरित वंचित वर्ग के माध्यम से दबाव डालकर वे वनवासी समाज को मतांतरित करना चाहती हैं। वहां मिशनरियों ने कुई भाषा के आधार बनाकर वंचितों को भड़काया है। वहां कुई भाषा को जनजातीय भाषा की सूची में शामिल करने की मांग को लेकर आंदोलन शरू किया गया, ताकि वंचितों को उनके वर्ग की सुविधा मिलने के साथ-साथ जनजातीय वर्ग की सुविधा भी मिल सके।

यह असंवैधानिक है, क्योंकि संविधान के अनुसार किसी भी वर्ग को उसकी जाति के आधार आरक्षण आदि की सुविधाएं दी जाती हैं, भाषा के आधार पर नहीं।

इस षड्यंत्र को समझने के कारण जनजातीय समाज ने कुई भाषा को अपने वर्ग की भाषा में शामिल करने का विरोध किया। इस कारण पिछले काफी समय से मतांतरित वंचित समाज और जनजातीय समाज के बीच संघर्ष चल रहा था।

इसी की प्रतिक्रिया में दिसम्बर, 2007 में स्वामी लक्ष्मणानंद पर जानलेवा हमला किया गया। वे उसमें बुरी तरह घायल हुए। लेकिन उस घटना के बाद भी प्रशासन ने गंभीरता से स्थिति का विचार नहीं किया, असामाजिक तत्वों पर कठोर कार्रवाई नहीं की, इस कारण स्वामी लक्ष्मणानंद की जघन्य हत्या करने का मिशनरियों में साहस पैदा हुआ।

देशभर के पिछड़े क्षेत्रों में मिशनरियां सेवा के नाम पर भोले-भाले, अशिक्षित, गरीब तथा वंचित वर्ग के मतांतरण के कार्य में जुटी हैं। उड़ीसा में स्वामी जी उनके इस कार्य का विरोध करते थे। उन्हें अपनी राह का यह कांटा निकालाना ही था, इसके लिए उन्होंने नक्सलवादियों, माओवादियों का साथ लिया।

देशभर में जहां-जहां हमारे कार्यकर्ता अथवा हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के लोग सेवा कार्यों में जुटे हैं, वहां नक्सलवादी, माओवादी उन्हें धमकी देते ही रहते हैं, काम बंद करने को कहते हैं, अनेक स्थानों पर पहले भी हमले किए गए, हमारे कार्यकर्ताओं की हत्या की।

दरअसल हिन्दुत्वनिष्ठ संगठन जनजाजीय समाज के बीच जो स्वाभिमान, अस्मिता, पहचान और राष्ट्रीयता का भाव जगाते हैं वह मिशनरियों को रास नहीं आता, क्योंकि इस चेतना के जागृति होने से उनके मतांतरण के कार्य में बाधा पहुंचती है।

यही पीड़ा नक्सलवादियों -माओवादियों-कम्युनिस्टों की भी है, क्योंकि राष्ट्रभाव जगने के बाद अलगाववाद के लिए स्थान ही नहीं बचता। इसलिए जसपुर (झारखंड)से लेकर मणिपुर (पूर्वोत्तर) तक राष्ट्रवादी हिंदू नेतृत्व पर हमले करना, उसे बदनाम करने का षड्यंत्र चल रहा है। जब हिंदू नेतृत्व किसी षड्यंत्र के कारण बदनाम होता है तो उससे हिंदू समाज कमजोर होता है, इस स्थिति का लाभ मिशनरियां और माओवादी दोनों उठाते हैं।

देशवासियों को समझना होगा कि मिशनरियों का एक चेहरा है ईसा मसीह के प्रेम संदेश प्रचारित -प्रसारित करना और दूसरा चेहरा है किसी भी प्रकार सभी को ईसाई बनाना, भले ही इसके लिए हिंसक मार्ग अपनाना पड़े। भय पैदा करने या हिंसा के लिए वे स्वयं सामने नहीं आते हैं, बल्कि किसी न किसी व्यक्ति या संगठन को माध्यम बनाते हैं। मतांतरित हिंदू समाज ही अपने पूर्वज हिंदू समाज कि प्रति इसलिए हिंसक हो जाता है क्योंकि मिशनरियां उनकी मानसिकता बदल देती हैं।

मतांतरित समाज को लगता है कि हम जो पहले थे वह खराब थे अब सही हैं। जबकि मतांतरित न होने वाला समाज भगवान राम, कृष्ण, शिव, हनुमान वाली संस्कृति से ही जुड़ा रहना चाहता है, अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना चाहता है। इस कारण यह संघर्ष चलता रहेगा। यह संघर्ष न हो, समाज में शांति स्थापित हो इसके लिए जरूरी है मतांतरण को रोकने के लिए कठोर कानून बनाया जाए। यह कार्य शासन का है। हमारा कार्य समाज में जागृति लाने का है। हम उसी कार्य में लगे हैं।

स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या से हमारा कार्य रुकने वाला नहीं है, लेकिन हमारा एक नेतृत्व तो हमसे बिछुड़ ही गया। नेतृत्व और भी खड़े होंगे, लेकिन 40-50 वर्षो से उस क्षेत्र में उन्होंने जो प्रयत्न किए, पदयात्राएं कीं, समाज में अपने प्रति श्रद्धा जगाकर जो नेतृत्व दिया, उस नेतृत्व का इस प्रकार हमारे बीच से चला जाना हृदय को पीड़ा से भर देता है।

इस नेतृत्व को समाज के बीच से हटाने के लिए मिशनरियों ने जो षड्यंत्र रचा, वह अत्यंत निंदनीय है। सरकार को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए अन्यथा देशभर में इसकी प्रतिक्रिया होगी।

प्रेम, सौहार्द और सर्वधर्म समभाव की भावना से काम कर रहे लोगों को इस प्रकार हिंसक तरीके अपना कर रोकने से एक बार के लिए तो समाज में निराशा की भावना आती है। यह निराशा का भाव भी राष्ट्र के लिए अच्छा नहीं होता है, क्योंकि निराशा से उपजी प्रतिक्रिया बहुत व्यापक होती है।

कंधमाल और उसके आसपास के जिलों में जो प्रतिक्रिया हो रही है वह इस कारण भी है कि शासन ने 'जले पर नमक छिड़कना' जैसा कृत्य किया है। स्वामी जी की हत्या के कुछ ही देर बाद पुलिस द्वारा इसे नक्सलवादी घटना कहना, राष्ट्रीय नेताओं द्वारा तुरंत संवेदना न प्रकट करना, हिंदू समाज के लोगों को ही बदनाम करना- इस सबने लोगों को उत्तेजित किया।

उड़ीसा में ही एक मिशनरी कार्यकर्ता ग्राहम स्टेन्स की हत्या हुई तो सरकार वहां भागी गई, विश्व भर का दबाव पड़ा, मीडिया ने हिंदू संगठनों को बदनाम किया। हमने तब भी उस घटना की निंदा की थी और इसे कायरतापूर्ण कृत्य कहा था। पर अब उसी प्रदेश में एक संन्यासी की निर्मम हत्या पर संवदेना व्यक्त करने में सरकार का संकोच और मीडिया द्वारा उपेक्षा भर्त्सना योग्य है। इन सबको समझना होगा कि हिंदू समाज अपने संतों-आस्था केंद्रों पर हमले सहने के लिए तैयार नहीं है।

(लेखक अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष हैं। यह लेख 'पांचजन्य' से साभार।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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