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    पाकिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव के बाद तय होगी राजनीति की दिशा

    By Staff
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    नई दिल्ली, 2 सितम्बर (आईएएनएस)। पाकिस्तानी जनता और दुनिया के अन्य हिस्सों में रहने वाले लोग पिछले सात हफ्तों से पाकिस्तान में जारी राजनीतिक घटनाक्रम के गवाह हैं।

    नई दिल्ली, 2 सितम्बर (आईएएनएस)। पाकिस्तानी जनता और दुनिया के अन्य हिस्सों में रहने वाले लोग पिछले सात हफ्तों से पाकिस्तान में जारी राजनीतिक घटनाक्रम के गवाह हैं।

    पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने महाभियोग की कार्रवाई का सामना करने के बजाय 18 अगस्त को पद से इस्तीफा दे दिया। मुशर्रफ के इस्तीफ के लिए अभियान चलाने वाले पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के नेता नवाज शरीफ ने इसके महज सप्ताह भर बाद यानी 25 अगस्त को सत्तारूढ़ गठबंधन से अपना समर्थन खींच लिया। उधर, खुद को इस समय राष्ट्रपति निर्वाचित करवाने में व्यस्त पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) नेता आसिफ अली जरदारी ने स्पष्ट कर दिया है कि मुशर्रफ द्वारा बर्खास्त 60 न्यायाधीशों को तुरंत बहाल नहीं किया जा सकता।

    इस समय जबकि पाकिस्तान में संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी है और अब यह देखना है कि दोनों पूर्व सहयोगियों में से कौन विजेता बनकर उभरता है। ऐसे में मुशर्रफ और पाकिस्तानी सेना में उनके सहयोगी किनारे होकर घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं।

    मार्च में जब शरीफ की पीएमएल-एन और जरदारी की पीपीपी ने अन्य दलों के साथ पाकिस्तान में सत्ताधारी गठबंधन का निर्माण किया था तो कई लोगों की भौहें इस पर तनी थीं। लेकिन दोनों प्रतिद्वंद्वी दलों के एक दूसरे के प्रति कड़वे अनुभवों के बावजूद कुछ लोगों ने गठबंधन को गंभीरता से लिया था। लेकिन लोगों के संदेह तब सच साबित हो गए जब सोमवार को शरीफ ने सत्तारूढ़ गठबंधन से अपना समर्थन वापस खींच लिया।

    शरीफ ने इसके लिए एक भीड़ भरे संवाददाता सम्मेलन में स्पष्टीकरण देते हुए कहा, "हमारे पास गठबंधन से बाहर निकलने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, क्योंकि मुशर्रफ के इस्तीफा देने के एक सप्ताह बाद भी जरदारी न्यायाधीशों की बहाली में विफल रहे हैं। इससे यह साबित हो गया है कि वे अपने वादे को पूरा करने के लिए गंभीर नहीं हैं।"

    पिछले पांच महीने से शरीफ सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी सहित सभी बर्खास्त न्यायाधीशों की बहाली की मांग पर जोर दे रहे थे, जबकि जरदारी एक के बाद एक एक वादा तोड़ना जारी रखे हुए थे।

    पाकिस्तान के कई हलकों में बर्खास्त न्यायाधीशों की बहाली के बारे में जरदारी के मंसूबे के संबंध में गहरे संदेह उभरने लगे थे। इसका सबसे पहला कारण है कि वे न्यायाधीशों पर विश्वास नहीं करते, खासकर जस्टिस चौधरी पर। इसका कारण यह भय है कि मुशर्रफ के साथ समझौता करके उनको भ्रष्टाचार के जिन मुकदमों से मुक्ति मिली है, बहाली के बाद चौधरी उनको फिर से शुरू करवा सकते हैं।

    जरदारी का भय इस बात से और भी बढ़ जाता है कि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी शरीफ न्यायाधीशों और वकीलों के साथ काफी घनिष्ठ संबंध बनाए हुए हैं। जरदारी ऐसी स्थिति से बचना चाहते हैं जिसमें शरीफ उनकी उन्मुक्ति को खत्म करने और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले फिर शुरू करवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का प्रयोग कर सकें।

    पीपीपी नेता मुशर्रफ के साथ अधिक सुविधाजनक महसूस करते थे और यह तथ्य है कि पिछले कई महीने से वे यही करने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन शरीफ के लगातार दबाव और यह देखकर कि न्यायाधीशों की बहाली का मुद्दा वकीलों और सिविल सोसायटी के बीच सबसे ऊपर है, वे अन्य उपायों की ओर देखने के लिए बाध्य हो गए।

    पीपीपी के ही कुछ नेताओं की यह महत्वाकांक्षा कि वे पार्टी का नेतृत्व करने में अधिक सक्षम हैं और यह महसूस करके कि पाकिस्तान की राजनीति में मुशर्रफ का प्रभाव समाप्त हो रहा है, जरदारी ने पूर्व सैनिक शासक के खिलाफ महाभियोग के शरीफ के कदम का समर्थन करने का निश्चय किया।

    लेकिन मुशर्रफ के परिदृश्य से हटते ही जरदारी खुद को पाकिस्तान का राष्ट्रपति निर्वाचित करवाने में कोई समय नष्ट नहीं करना चाहते हैं। उन्होंने इस बात का अनुमान लगा लिया है और उनको पता है कि वे नेशनल असेंबली और चारों प्रांतीय विधानसभाओं में राष्ट्रपति पद के आवश्यक बहुमत जुटाने में समर्थ हो जाएंगे।

    शरीफ का दावा है कि न्यायाधीशों की बहाली के समझौते के अतिरिक्त जरदारी ने दो बार प्रधानमंत्री रहे व्यक्ति को चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने वाले 17 वें संविधान संसोधन को समाप्त करने के लिए संसद में तुरंत कदम उठाने का वादा किया था, जिससे उनके जैसे लोग चुनाव लड़ सकें। इसके अलावा वे इस बात पर भी सहमत थे कि उन दोनों नेताओं सहित गठबंधन के अन्य सहयोगी पार्टी से ऊपर और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार चुनेंगे।

    शरीफ ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सईद उज जमा सिद्दकी को सितंबर के शुरू में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए अपनी पार्टी पीएमएल-एन का उम्मीदवार बनाया है। संसद और चारों प्रांतीय असेंबलियों में वर्तमान सदस्यों के आधार पर उनके लिए सिद्दकी को जिताने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटा पाना संभव नहीं होगा। प्रश्न यह है कि इसके बावजूद शरीफ ने जरदारी के खिलाफ क्यों अपना प्रत्याशी खड़ा किया।

    अपने उम्मीदवार की विजय की संभावना काफी कम होने की वास्तविकता को जानते हुए भी शरीफ ने दो कारणों से जरदारी के खिलाफ प्रत्याशी उतारा है। पहला, वे देखना चाहते हैं कि क्या सिद्दकी जैसा सम्मानित उम्मीदवार जरदारी के समर्थकों को तोड़ने में सफल हो सकता है। दूसरा, हार की स्थिति में पीएमएल-एन नैतिक रूप से खुद को ऊंचा दर्शा कर दावा कर सकती है कि वह अपने सिद्धान्तों से समझौता नहीं करती है।

    शरीफ का आकलन है कि न्यायाधीशों की बहाली का मुद्दा केवल वकीलों ही नहीं वरन सिविल सोसायटी में भी लोकप्रिय है। जरदारी को राष्ट्रपति बनने से रोकने में उनकी असफलता का तब कोई महत्व नहीं होगा जब शरीफ पीपीपी नेता के खिलाफ अपना संघर्ष शुरू करेंगे। प्राप्त सभी संकेतों के आधार पर कहा जा सकता है कि शरीफ जरदारी के खिलाफ अपने अभियान को सड़कों पर ले जाने की तैयारी कर रहे हैं।

    पाकिस्तान के पर्यवेक्षक आने वाले दिनों में देश में राजनीतिक गतिरोध और अस्थिरता के एक और दौर की भविष्यवाणी कर रहे हैं। इससे देश की हालत और खराब होने की आशंका है। इससे देश के विभिन्न हिस्सों में नियमित अंतराल पर हमले कर रहे आतंकवादियों को अपनी गतिविधियां बढ़ाने का मौका मिल जाएगा।

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ महीनों से काफी खराब दौर से गुजर रही है। तेल, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं जिनमें से अधिकांश का आयात किया जाता है- उनकी कीमतों में वृद्धि के कारण विदेशी मुद्रा का भंडार 10 अरब डालर से भी कम रह गया है। पाकिस्तानी रुपये के मूल्य में भी गिरावट आई है और एक डालर की कीमत 77 रुपये हो गई है। बढ़ती महंगाई से पाकिस्तान की जनता में जरदारी सरकार की अलोकप्रियता में वृद्धि हो सकती है।

    इससे ऐसा माहौल तैयार हो सकता है जिससे स्थिति को नियंत्रित करने के लिए मुशर्रफजैसे किसी मजबूत व्यक्ति को लाने की मांग जोर पकड़ सकती है। लेकिन अभी अधिकांश लोग पूर्व सैनिक तानाशाह से नाराज हैं, अत: इससे नए चुनावों के लिए जमीन तैयार हो सकती है।

    शरीफ के नजरिये से नए चुनाव सबसे उपयुक्त हैं। उनको उम्मीद है कि मुशर्रफ और जरदारी दोनों की अलोकप्रियता से लाभ उठाकर वे अपनी सीटों की संख्या में महत्वपूर्ण वृद्धि कर सकते हैं। इससे नेशनल असेंबली में 17वें संविधान संसोधन को समाप्त करने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाया जा सकता है। तब चुनावी राजनीति में शरीफ के लौटने का रास्ता साफ हो सकता है।

    शरीफ के गठबंधन में नहीं लौटने की बहुत कम संभावना के बावजूद जरदारी ने पीएमएल-एन नेता से वापस लौट आने का आग्रह किया है। एक बार राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद वे उन वकीलों को तोड़ने की कोशिश कर सकते हैं जिन्होंने न्यायाधीशों की बहाली की मांग को लेकर जल्दी ही देशव्यापी प्रदर्शन की धमकी दी है।

    एक बार देश का राष्ट्रपति बनने के बाद जरदारी कुछ बर्खास्त न्यायाधीशों को बहाल कर सकते हैं। लेकिन वे निश्चय ही इफ्तिखार चौधरी और उनके कुछ नजदीकी सहयोगियों को इससे बाहर रखेंगे। उनका उद्देश्य वकीलों की एकता को तोड़ना और इस तरह शरीफ की ताकत को कम करना है।

    जरदारी को उम्मीद है कि यदि उन्होंने बर्खास्त 60 न्यायाधीशों में कुछ को बहाल कर दिया तो वे संतुलन को उनके पक्ष में करने में सहायक हो सकते हैं। तेल और खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतों तथा आतंकवादियों के बढ़ते खतरे से देश सर्वोच्च न्यायालय के बर्खास्त मुख्य न्यायाधीश के मुद्दे से ध्यान हटाकर आवश्यक मामलों पर ध्यान देने के लिए बाध्य हो सकता है।

    जरदारी की इस रणनीति के खिलाफ शरीफ की मुख्य कोशिश होगी कि वकील एकजुट रहे हैं और पीपीपी सरकार के खिलाफ लड़ाई में उनके पीछे लामबंद रहे। इस मोड़ पर यह स्पष्ट नहीं है कि इन दोनों नेताओं में सत्ता किसके हाथ में आएगी। लेकिन सर्वोच्चता हासिल करने के लिए पीपीपी और पीएमएल-एन की जंग ने आने वाले महीनों के लिए पाकिस्तान में अव्यवस्था और राजनीतिक अस्थिरता को अवश्य सुनिश्चित कर दिया है।

    (लेखक आईएएनएस के रक्षा और विदेशी मामलों के संपादक हैं।)

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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