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'अब भगवान भरोसे हैं, जिएं या मरें...'

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बाढ़, राहतकार्य और लोगों की दुर्दशा, चिंता, बदहाली की ज़मीनी सच्चाई के लिए पढ़िए इन दो लोगों की आपबीती...

प्रशांत की आपबीती

मधेपुरा मुख्यालय से 20 किलोमीटर पर है मुरलीगंज ब्लाक. यह पूरा इलाका जलमग्न हो चुका है. वहीं परिवार के अधिकतर सदस्य रह रहे थे. मेरे परिवार के कई अन्य सदस्य, पिताजी, माँ और मैं, सब वहीं थे. जब पानी कस्बे में घुस आया और आवागमन बंद हो गया, हम अपने ही घर में क़ैद हो गए तो मजबूरन वहाँ से निकलना पड़ा.

चारों ओर पानी था. निकलने के लिए कोई सरकारी सुविधा, व्यवस्था जैसी कोई चीज़ नहीं थी. रस्सों और तार के सहारे बहुत तेज़ धारा से लड़ते हुए हम घंटों का सफ़र करके बाहर पहुँच पाए हैं. जब हम घर से निकले थे तो पिताजी वहीं रुक गए थे. इसकी एक वजह यह थी कि कुछ बाहुबली लोग घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में घुसकर डकैतियाँ कर रहे थे. वो घर की छत पर पानी निकलने या राहत आने का इंतज़ार करते रहे.

घर से निकलते वक्त मैं अपने पास से स्थानीय टेलीफ़ोन एक्सचेंज के जेनरेटर में तेल डलवा आया था ताकि एक्सचेंज चालू रहे और लोगों से संपर्क किया जा सके. गुरुवार तक तो संपर्क हुआ पर अब तेल ख़त्म हो चुका है और एक्सचेंज भी बैठ गया है.

माँ को लेकर मैं पटना आ गया हूं. अब पिताजी का कोई पता नहीं चल पा रहा है, न कोई संपर्क का माध्यम बचा है. हर आते लोगों के जत्थे में हम उन्हें तलाश रहे हैं और बाकी लोगों को मदद कर रहे हैं. सेना की ओर से भी राहत का काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है. शनिवार दोपहर तक सेना यहाँ बचाव कार्य के लिए नहीं पहुँच पाई थी.

मैं अपने पिता से डेढ़ किलोमीटर के फासले पर हूँ पर यह फासला बहुत दूर है इस बाढ़ में. हम अपलक उनकी राह देख रहे हैं. ताऊ जी और गाँव के लोगों से पाँच दिन पहले फोन पर बात हुई तो वे इतना रोने लगे कि संभालना मुश्किल हो गया. तभी संपर्क टूट गया और अब उनकी कोई ख़बर नहीं है

हमने पूर्णिया के डीएम से कहा कि हमारे घर के लोग वहाँ फंसे हुए हैं. उन्हें निकालने के लिए एक नाव दी जाए. उन्होंने आश्वासन दिया है जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है.

मुरलीगंज के सैकड़ों घरों में डकैती हो चुकी है. स्थानीय स्टेट बैंक में भी डकैती की ख़बरें आ रही हैं. जो राहत के लिए नावें उपलब्ध थीं उन्हें दबंगों ने कब्ज़ा कर लिया है और उसका इस्तेमाल वे लूटपाट के लिए कर रहे हैं.

मुरलीगंज से केवल आधी आबादी ही बाहर निकल पाई है. बाकी लोग फंसे हुए हैं. पानी का स्तर बढ़ रहा है और बहाव इतना तेज़ है कि दो किलोमीटर का फ़ासला भी पाँच घंटे में तय हो पा रहा है.

हम जीवन भर ऋणी रहेंगे पास पड़ोस के गांवों, चांदपुर, भंगहा, बनमनकी, चिनियागढ़ के लोगों के क्योंकि उन्हीं की बदौलत और उनकी निजी स्तर पर की गई मदद की बदौलत ही हम ज़िंदा हैं और बाहर निकल पाए हैं.

हम तो बाज़ार और कुछ शहर जैसी बसाहट से निकले हैं. कुछ दूरी पर हमारा गाँव है. जब बाज़ार से लोगों को निकालने और राहत कार्यों की यह स्थिति है तो गाँवों की स्थिति की कल्पना भी कर पाना कठिन है.

मैं अपने पिता से डेढ़ किलोमीटर के फासले पर हूँ पर यह फासला बहुत दूर है इस बाढ़ में. हम अपलक उनकी राह देख रहे हैं. ताऊ जी और गाँव के लोगों से पाँच दिन पहले फोन पर बात हुई तो वे इतना रोने लगे कि संभालना मुश्किल हो गया. तभी संपर्क टूट गया और अब उनकी कोई ख़बर नहीं है.

अब सेना का ही आसरा है. हम सब भगवान के भरोसे हैं. जिएं या मरें...

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शशिराज की आपबीती

कुछ परिजनों को पटना पहुँचाकर आज मैं सहरसा जा रहा हूँ. मधेपुरा में हमारे परिजन हैं पर उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है. कुछ लोग मधेपुरा से सहरसा की ओर जा रहे हैं बाढ़ से बचने के लिए. इसीलिए मैं भी सहरसा जा रहा हूँ ताकि देख सकूँ कि कैसे लोगों को वहाँ से निकाला जा सके.

बाढ़ के कारण लोगों तक पहुँच पाना असंभव सा हो गया है और राहत के प्रयास नाकाफी हैं. मेरे पाँच-छह परिजन वहाँ फंसे हुए हैं. इन लोगों ने किसी के मकान की छत पर शरण ली है, पर कहाँ, इसका अंदाज़ा नहीं है.

एक रिश्तेदार छत तक पानी पहुँचने के बाद वहाँ से निकलने को मजबूर हुए थे. उनसे मोबाइल संपर्क भी टूट चुका है. बताते हैं कि उन्होंने तैरकर बाहर निकलने की कोशिश की थी पर अबतक कहीं नहीं पहुँचे हैं. लोगों को आशंका है कि शायद उन्हें पानी अपने साथ बहा ले गया हो पर हम अभी तक उम्मीद नहीं हारे हैं.

मुरलीगंज से कुछ दूर पर मेरा ननिहाल है. वहाँ पूरा का पूरा गाँव फंसा हुआ है. एक नए बने पक्के मकान की छत पर लोग मौजूद हैं. प्रशासन की कोई नाव वहाँ नहीं पहुँची है. निजी नाव जाती हैं तो उन्हें निकालने के बजाय उनसे बड़ी रक़म की माँग रखती है और उन लोगों के पास पैसा है नहीं.

ये मीरगंज के पास का भलनी, गंगापुर जैसे गांवों का इलाका है. इस पूरे इलाके में पानी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है और प्रवाह भी तेज़ होता जा रहा है. लोगों तक पहुँचना लगातार कठिन होता जा रहा है.

राहत के लिए नावें स्थानीय स्तर के नेताओं को बांटी गई थीं ताकि लोगों को मदद मिल सके पर पता नहीं कैसे अधिकतर नाव तो बाहुबलियों और दबंगों के हाथ लग गई हैं.

मेरा एक भांजा मधेपुरा के एक कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ता है. वो पिछले 13 दिन से वहीं फंसा हुआ है. मेरे बड़े भाई पंकज लगातार सेना और प्रशासन से कह रहे हैं कि उस छोटे बच्चे को बचा लिया जाए, वो उस जगह पर है लेकिन प्रशासन या आर्मी की ओर से कोई दल उसे लेने नहीं जा रहा है

अब वो मर्ज़ी से मनमांगे पैसे पर लोगों को निकाल रहे हैं. कुछ लोग जो दूसरी नावों से आ रहे थे, उन्हें रास्ते में इन दबंगों ने लूटा भी है और परिवारों को नाव से उतारकर पानी में छोड़ दिया है. नैतिक रूप से सारे मूल्यों की जैसे धज्जियाँ उड़ा दी गई हों यहाँ. कुछ लोग इतने अमानवीय हो गए हैं.

जहाँ लोग शरण लेकर रह रहे हैं वहाँ गंदगी बढ़ती जा रही है और ये महामारी का रूप लेने जा रही है. प्रशासन पूरी तरह से निष्क्रिय है.

मेरा एक भांजा मधेपुरा के एक कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ता है. वो पिछले 13 दिन से वहीं फंसा हुआ है. मेरे बड़े भाई पंकज लगातार सेना और प्रशासन से कह रहे हैं कि उस छोटे बच्चे को बचा लिया जाए, वो उस जगह पर है लेकिन प्रशासन या आर्मी की ओर से कोई दल उसे लेने नहीं जा रहा है.

ज़रा सोचिए, जब हम जगह और पहचान बता रहे हैं और तब भी उसे लेने कोई नहीं जा रहा तो उन लोगों की सुध कौन ले रहा होगा जो अनजान जगहों पर फंसे हुए हैं. अब सुनने में आ रहा है कि मधेपुरा में जहाँ राहत शिविर था वहाँ भी पानी का स्तर बढ़ रहा है. पता नहीं अब इस शिविर को कहाँ भेजा जाएगा. लोग कहाँ जाएंगे.

सेना के पास भी संसाधन कम हैं. वे लोग कम संसाधनों में ही दिन में काम करते हैं और शाम को अपनी ट्यूब वाली नावों की हवा निकालकर चले जाते हैं. अगले दिन 8-10 बजे आकर फिर हवा भरते हैं और काम शुरू होता है. इस दौरान रात में राहत का काम पूरी तरह से बंद ही रहता है.

यह महाप्रलय है. लोगों तक और कुछ नहीं जा रहा... बस जानें जा रही हैं.

(बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद और आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित)

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