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कश्मीर समस्या: अकल्पनीय विकल्प

By महबूब ख़ान
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कश्मीर पृथकतावादी आंदोलन जब-तब ज़ोर पकड़ता नज़र आता है
भारत प्रशासित कश्मीर की आधी शताब्दी पुरानी समस्या हाल के दिनों में ठंडे बस्ते में नज़र आने लगी थी मगर क्या इससे शांति की उम्मीद की जा सकती है. क्या कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अकल्पनीय विकल्पों पर सोचना होगा?

पिछले क़रीब आधा दशक के दौरान हालाँकि छुटपुट हिंसक घटनाएँ तो होती रहीं लेकिन कश्मीरियों की मूल माँग यानी उन्हें राज्य का भविष्य तय करने के लिए आत्मनिर्णय के अधिकार का इस्तेमाल करने का मौक़ा दिया जाए, वो पर्दे के पीछे सरकती नज़र आने लगी थी.

वजह ये कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही सरकारों ने जो व्यापक शांति प्रक्रिया शुरू की थी उसकी वजह से कश्मीर पर भी कुछ न कुछ बातचीत तो होती रही. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने कुछ वैकल्पिक प्रस्ताव रखे जिन पर कुछ हद तक चर्चा भी हुई.

एक समय कश्मीर को पाकिस्तान का मुख्य मुद्दा (कोर इश्यू) बताने वाले परवेज़ मुशर्रफ़ के रुख़ में आए इस लचीलेपन को पाकिस्तानी लोगों की राय का प्रतिबंब भी कहा गया. नियंत्रण रेखा पर युद्ध विराम वर्ष 2003 से ही लागू रहा जिससे कुछ हद तक तो शांति नज़र आई.

बल्कि इससे भी ज़्यादा कश्मीर के दोनों हिस्सों के बीच लोगों की आवाजाही बढ़ी और श्रीनगर से मुज़फ़्फ़राबाद के लिए बस भी शुरू हुई. इसे कश्मीर समस्या के समाधान की दिशा में एक बड़ा क़दम माना गया.

लेकिन पिछले पाँच साल के दौरान जो तुलनात्मक शांति नज़र आई, उससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि कश्मीर का मसला हल हो गया है या आसानी से हल हो सकता है.

अनेक विश्लेषकों का विचार है कि समस्या की तरफ़ से मुँह मोड़ने से रास्ता नहीं निकलता. राज्य विधान सभा के अनेक बार चुनाव होने के बावजूद असल कश्मीर समस्या ज्यों की त्यों खड़ी है.

लंदन के स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में अंतरराष्ट्रीय और तुलनात्मक राजनीति के प्रोफ़ेसर सुमंत्रा बोस का कहना है कि समस्या का ख़ुद ब ख़ुद कोई हल निकल आने की उम्मीद करना समझदारी नहीं कहा जा सकता.

प्रोफ़ेसर सुमंत्रा बोस का कहना है कि दक्षिणी ओसेतिया और कश्मीर में एक तरह से कुछ समानता है.

"इन दोनों ही क्षेत्र में जो स्थिति फिर से विस्फोटक नज़र आने लगी है उसकी वजह ये है कि ज्वालामुखी स्थितियाँ अक्सर ठंडी दिखती हैं मगर नियमित अंतराल पर उनका फटना ज़रूरी है. और जब ये स्थितियाँ अनपेक्षित समय पर विस्फोटक होती हैं तो पहले से ही संवेदनशील मुद्दे को और नाज़ुक बना देती हैं."

बिल्कुल यही कश्मीर में भी हो रहा है. अब जबकि एक बार फिर राज्य में चुनाव होने वाले हैं तो फिर से कश्मीर अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में आ गया है. पिछली बार कश्मीर अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में 2002 में तब आया था जब भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर लड़ाई की नौबत आ गई थी और दोनों देशों की सेनाओं ने सीमा पर मोर्चा संभाल लिया था.

कश्मीर समस्या को बिल्कुल सीधे-सपाट शब्दों में बात करके नहीं समझा जा सकता. इसमें दो दृष्टिकोण हैं - एक कश्मीरी और दूसरा ग़ैरकश्मीरी या कह सकते हैं कि भारत सरकार का नज़रिया.

भारत सरकार का रुख़ तो यही है कि कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है जबकि कश्मीरी लोग ऐसा नहीं मानते हैं. कश्मीर को भी उसी तरह से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा हासिल है जिस तरह अनुच्छेद 371 में नगालैंड, असम, मिज़ोरम, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को विशेष दर्जा हासिल है. हालाँकि अनेक विश्लेषकों का कहना है कश्मीर का विशेष दर्जा पिछले क़रीब साठ वर्षों के दौरान काफ़ी कमज़ोर कर दिया गया है.

प्रदर्शनों में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया है

ज़्यादातर कश्मीरी लोग ख़ुद को भारत के साथ जोड़कर नहीं देखते हैं. कश्मीरियों का मानना है कि भारत सरकार ने उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कश्मीर पर क़ब्ज़ा कर रखा है और उनकी मर्ज़ी को दबाकर रखा गया है यही वजह है कि कश्मीरियों के अंदर पीड़ित होने की भावना बहुत बलवती है.

इसीलिए जब जम्मू कश्मीर की गठबंधन सरकार ने जून में कश्मीर घाटी में कुछ भूमि अमरनाथ मंदिर बोर्ड को देने का आदेश जारी किया तो उसका कश्मीर घाटी में व्यापक विरोध हुआ.

उधर जम्मू में इसके उलट भावनाएँ व्याप्त हैं. 1947 से पहले तक कश्मीर के शासक महाराजा एक हिंदु थे लेकिन बाद में चूँकि जम्मू कश्मीर में कुल मिलाकर एक मुस्लिम बहुल राज्य बन गया तो जम्मू के हिंदू बहुल इलाक़े में लोगों के बीच ऐसी भावना बढ़ने लगी कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है.

इसी भावना के तहत 1952-53 में जम्मू क्षेत्र में एक ज़ोरदार आंदोलन चला जिसमें माँग की गई कि भारत प्रशासित कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करके उसे पूरी तरह से भारत में शामिल कर दिया जाए.

तब से कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्र में दरार पटने के बजाय और बढ़ती ही गई है और यह जब-तब नज़र आती रहती है मगर ऐसा पहली बार हुआ है कि राज्य के दोनों क्षेत्रों में किसी एक मुद्दे पर स्थिति इतनी विस्फोटक हो गई है.

यात्रियों के लिए सुविधाएँ

ऐसा नहीं था कि अमरनाथ यात्रा को सुचारू रखने के लिए यह भूमि बहुत ज़रूरी थी क्योंकि यह यात्रा तो सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है और अमरनाथ मंदिर बोर्ड सिर्फ़ पाँच-छह साल पहले ही वजूद में आया है.

अमरनाथ यात्रा कश्मीरियों की संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है और बहुत से कश्मीरी मुस्लिम इस यात्रा को सुचारू बनाने में सक्रिय योगदान करते हैं. इस पर कोई विरोध देखने को भी नहीं मिला कि यात्रियों की सुविधाओं में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए मगर इस मुद्दे को कश्मीर घाटी की सीमा से बाहर निकलने के बाद किसी और रूप में देखा गया.

भारत सरकार की विचारधारा के समर्थकों ने इसे चुनौती के रूप में देखा कि भारत के एक क्षेत्र (कश्मीर) में भला किसी तीर्थयात्रा की सुविधा के लिए भूमि क्यों नहीं दी जा सकती.

लेकिन कश्मीरियों के लिए यह दुखती रग पर हाथ रखने के समान था और उन्होंने डर ज़ाहिर किया कि इस क़दम के ज़रिए ग़ैर कश्मीरियों को घाटी में बसाने की एक साज़िश रची जा रही है.

अमरनाथ यात्रा को कश्मीरियों का सक्रिय सहयोग रहता है

ध्यान रहे कि अमरनाथ मंदिर बोर्ड का चेयरमैन राज्यपाल होता है और बोर्ड अपनी गतिविधियों के लिए राज्य मंडल के प्रति जवाबदेह नहीं होता है. इस तरह अमरनाथ तीर्थ यात्रियों की सुविधाओं में बढ़ोत्तरी करने के बजाय इस मुद्दे को न सिर्फ़ राजनीतिक बल्कि सांप्रदायिक रूप भी दे दिया गया है.

इस संघर्ष में तीस से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है, जम्मू और घाटी, दोनों ही जगह लोग पुलिस की गोलियों से मारे गए हैं.

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की नेता महबूबा मुफ़्ती का कहना है कि समस्या सिर्फ़ अमरनाथ यात्रा की नहीं है, समस्या की जड़ कहीं गहरी है और जब तक कश्मीर की मूल समस्या का हल नहीं निकलेगा तब तक कोई भी छोटा मुद्दा विस्फोटक रूप ले सकता है.

अकल्पनीय विकल्प?

कश्मीर में ताज़ा हालात से यह भी स्पष्ट होता है कि क़रीब दो दशक के दौरान विस्फोटक हालात में कुछ ख़ास बदलाव नहीं आया है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि शांति प्रक्रिया में इस मुद्दे पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है.

जैसा कि प्रोफ़ेसर सुमंत्रा बोस कहते हैं कि जो लोग यह सोचते हैं कि कश्मीर संघर्ष ठंडे बस्ते में चला गया है, उनकी इस सोच की कलई वर्ष 2008 की गर्मियों में वहाँ पैदा हुए हालात ने खोलकर रख दी है.

एक बार फिर ये सवाल उठने लगे हैं कि कश्मीर समस्या का क्या समाधान हो सकता है. क्या वहाँ हर छह साल में चुनाव कराकर स्थिति सामान्य होने का दावा किया जा सकता है या फिर किसी क्रांतिकारी समाधान पर विचार करना होगा.

बुकर पुरस्कार से सम्मानित और मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुंधति रॉय का तो यह भी कहना है कि अब समय आ गया है जब भारत सरकार को कल्पना से बाहर नज़र आने वाले समाधान पर भी विचार करना होगा और वो विकल्प है कि भारत सरकार को कम से कम कश्मीर घाटी पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए जबकि हिंदू बहुल जम्मू और बौद्ध बहुल लद्दाख को अपने ही पास रखना चाहिए.

हालाँकि यह एक ऐसा सुझाव है जिसे अनेक वर्षों पहले ही रद्द किया जा चुका है और यह भी देखने की बात होगी अब इस प्रस्ताव को किस नज़र से देखा जाता है.

तो रास्ता क्या निकल सकता है?

प्रोफ़ेसर सुमंत्रा बोस कहते हैं कि कोई बड़ा संघर्ष ठंडे बस्ते में नहीं पड़ा रह सकता और ऐसे किसी भी संघर्ष को हल करने के लिए अवसर भी कभी-कभी ही मिलते हैं. इन अवसरों का भरपूर फ़ायदा उठाया जाए तो टिकाऊ शांति की उम्मीद की जा सकती है.

लेकिन क्या भारत सरकार के इस रुख़ में कोई बदलाव आएगा कि कश्मीर उसका अभिन्न अंग है. या फिर इसी दायरे में रहते हुए कोई टिकाऊ हल निकाला जा सकता है?

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