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हिमालय को संकट में डाल रहा है तथाकथित विकास

By Staff
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नई दिल्ली, 25 अगस्त (आईएएनएस)। हिमालय क्षेत्र में लगातार बन रहे बांध न केवल स्थानीय पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएंगे बल्कि अंत में भारतीय उपमहाद्वीप का पर्यावरण व पारिस्थितिकी भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएगी। बिना सोचे समझे जल विद्युत परियोजना प्रारंभ करने के दुष्परिणाम हिमाचल प्रदेश में स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते हैं। आठ हजार करोड़ की विद्युत परियोजना मात्र इसलिए प्रारंभ नहीं हो पा रही है क्योंकि वहां पानी में मिट्टी की मात्रा अधिक है।

नई दिल्ली, 25 अगस्त (आईएएनएस)। हिमालय क्षेत्र में लगातार बन रहे बांध न केवल स्थानीय पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएंगे बल्कि अंत में भारतीय उपमहाद्वीप का पर्यावरण व पारिस्थितिकी भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएगी। बिना सोचे समझे जल विद्युत परियोजना प्रारंभ करने के दुष्परिणाम हिमाचल प्रदेश में स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते हैं। आठ हजार करोड़ की विद्युत परियोजना मात्र इसलिए प्रारंभ नहीं हो पा रही है क्योंकि वहां पानी में मिट्टी की मात्रा अधिक है।

सरकार की मौजूदा आर्थिक नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए देश में बड़े स्तर पर ऊर्जा की आवश्यकता है। इसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु पनबिजली उत्पादन के लिए गंगोत्री और उत्तरकाशी के बीच गंगा पर बांधों की एक श्रृंखला निर्मित किए जाने की योजना है।

हिमालय जैसे संवदेनशील इलाके में कोई भी काम शुरु करने के पूर्व कुछ जरुरी बातों पर गौर करना होगा। सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे कि वहां के भू-तत्व और निर्माण रचना की ठोस पड़ताल हो और यह पड़ताल इस इलाके के जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों के अनुसंधान दल द्वारा ही हो।

हिमालय में चट्टाने धंसने की समस्या आम है। अत: क्षेत्र का सर्वेक्षण कर पुराने और नए धसान वाले इलाकों को चिन्हित किया जाना चाहिए। बांध निर्माण के लिए खोदे जाने वाले हिस्सों की मिट्टी और चट्टानों के नदी में बहने की संभावना होती है अतएव इसका पूर्व आकलन आवश्यक है क्योंकि धसान की वजह से नदी पहले ही बहुत उथली हो चुकी है। सर्वेक्षण से नदी के निचले इलाकों में जलप्लावन के खतरों का भी पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा।

पिछले दशक में इस क्षेत्र ने दो बड़े-बड़े भूकंप झेले हैं, इसके बावजूद तब भी इस बात को लेकर आज तक कोई ठोस अध्ययन नहीं किया गया है कि इस क्षेत्र से भूकंपों ने क्यों मुंह मोड़ लिया है? इस दिशा में वह भी सतही तौर पर मात्र बढ़ते भूस्खलन पर ही थोड़ा बहुत काम हुआ है। इस तरह का अध्ययन हमें भूकंप के पूर्व एवं पश्चात की भूगर्भीय दरारों की प्रकृति एवं इनके फैलाव के बारे में ठीक-ठीक सूचनाएं देने में समर्थ होगा। भेंटी और वर्णावर्त के उदाहरण सबके सामने हैं जहां भूस्खलन से समूचे गांव के गांव विलुप्त हो गए हैं।

परियोजना के लिए जो क्षेत्र चुना गया है उसे हिमालय चोटी के मुख्य आघात प्रभावी (एमसीटी) क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यह हिस्सा भूगर्भीय हलचलों के लिहाज से बहुत संवेदनशील समझा जाता है। भूस्खलन, त्वरित जलप्लावन और भूगर्भीय कंपन की बहुतायात ही एमसीटी क्षेत्रों की पहचान है। काली नदी से टोन्स नदी की ओर यात्रा करने पर हमें एमसीटी क्षेत्र के दक्षिणी ढलाव पर भूस्खलन के प्रत्यक्ष उदाहरण बिखरे पड़े मिलेंगे। वर्तमान में हमारे पास इस बात का कोई ठोस आकलन नहीं है कि ये भूगर्भीय दरारें कब हमारे लिए खतरा बन जाएगी।

हमारे यहां उन्नत तकनीक के जानकार इंजीनियरों की कोई कमी नहीं है जो बेहतरीन संरचनाओं का निर्माण करने में सक्षम है। लेकिन वे इन भुरभुरी चट्टानों का क्या कर लेंगे जो जरा सी भूगर्भीय हलचल को भी सहने योग्य नहीं हैं। विष्णुप्रयाग नहर योजना के समीप स्थित चैनगांव आज विलुप्ति की कगार पर है। क्या हमारे इंजीनियर ऐसी कोई गारंटी दे सकते हैं कि नई योजना से नजदीकी गांवों को कोई खतरा नहीं होगा।

टिहरी बांध के जलाशय के आसपास का इलाका भी खतरे में है। जलाशय की ढलानों की मिट्टी धंस रही है और जलाशय उथला हो रहा है। अगर यही हाल इस नई योजना का हुआ तो इसकी जिम्मेदारी किस पर होगी? पानी के बहाव के संबंध में जो सही आंकड़ें उपलब्ध है उनके लिहाज से पानी की उपलब्धता न्यून है। योजनाकारों को विष्णुप्रयाग योजना से सबक लेना चाहिए क्योंकि शीत ऋतु में पानी के बहाव में कमी का ठीक से आकलन करने में नाकामयाब रहे थे। प्रस्तावित योजनाएं तो हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्र में स्थित हैं जहां बहाव का मामला मौसम के मिजाज पर निर्भर है इसलिए इस दृष्टि से चीजों को परखना बहुत आवश्यक है। फिर इस बात के पुख्ता प्रमाण तो उपलब्ध ही हैं कि हिमालय के हिमखण्ड खतरनाक दर से विलुप्त हो रहे हैं। ऐसे में इन परियोजनाओं का भविष्य क्या होगा? इस बारे में क्या सोचा गया है?

हमें एक और बात का ध्यान रखना होगी कि क्षेत्र में मौजूद तमाम विसंगतियों के बावजूद आज भी लोग यहां खेती कर अपना गुजारा करते हैं। स्थानीय निवासियों की बढ़ती आबादी ने वैसे ही प्रति व्यक्ति कृषि भूमि की उपलब्धता को कम ही किया है उस पर बढ़ता शहरीकरण, सड़क निर्माण की गतिविधियां और अब यह पनबिजली परियोजाएं सब मिलकर उत्तराखंड की स्थानीय आबादी को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल रही हैं।

पिछले कुछ वर्षो में विभिन्न नदी क्षेत्रों में पनबिजली परियोजनाओं के प्रस्तावों में अचानक अस्वाभाविक तौर पर बढ़ोतरी हुई है। इन परियोजनाओं के बारे में यही प्रचारित किया जा रहा है कि ये सिर्फ नदी के बहाव पर ही काम करती हैं यानी इनसे जमीनों के डूब में आने के खतरे कम हैं। लेकिन सच तो यह है कि नदियों के किनारों पर ही सबसे उपजाऊ भूमि उपलब्ध होती है और उसकी सिंचाई भी पारम्परिक तरीके से नहरों द्वारा ही होती है। ये परियोजनाएं ऐसी बहुत सी भूमि को हमेशा के लिए डुबो देगीं।

विचारणीय है कि क्या किसी ने स्थानीय निवासियों को उनकी उपजाऊ भूमि से बेदखल होने से उन पर पड़ने वाले परिणामों का कभी आकलन किया है।

एक प्रार्थना यह भी कि इस तरह से बांधों की सहायता से पानी को रोकने से स्थानीय स्तर पर जलाशय से पर्यावरण पर असर अवश्यंभावी है। निचले क्षेत्रों में भी बहाव में कमी होना ही है। हमें इस बारे में जरा भी अंदाज नहीं है कि इन परिवर्तनों का सूक्ष्म जीवविज्ञान (माइक्रो बायलाजी) और पारिस्थितिकी पर्यावरण पर क्या असर होगा। हम जानते भी हैं कि हम हिमालय के साथ क्या सलूक कर रहे हैं।

(लेखक जाने माने पर्यावरणविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। दशकों से अपनी संस्था 'दशौली ग्रामस्वराज्य मण्डल' के माध्यम से हिमालय में पर्यावरण संरक्षण का काम कर रहे हैं। पद्मश्री, पद्मभूषण, मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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