• search

एनएसजी: पहले दिन दूर नहीं हुईं बाधाएँ

|
भारत परमाणु सुरक्षा को लेकर आईएईए से पहले ही समझौता कर चुका है
न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) की बैठक में पहले दिन भारत और अमरीका कुछ देशों को राज़ी नहीं कर सके कि समझौते को बिना शर्त मंज़ूरी दे दें.

हालांकि अमरीका ने उम्मीद जताई है कि एनएसजी भारत के साथ उसके असैन्य परमाणु समझौते को बिना शर्त मंज़ूरी दे देगा.

उधर एनएसजी में मुखिया की भूमिका निभा रहा जर्मनी भी इन कोशिशों में लगा है कि शुक्रवार को होने वाली दूसरे और अंतिम दिन की बैठक में इसे मंज़ूरी मिल जाए.

लेकिन पहले दिन की बैठक में मौजूद कुछ देशों के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह संभव नहीं दिखता कि शुक्रवार की बैठक में इसमें कुछ फ़ैसला होगा.

उनका कहना है कि सितंबर के पहले सप्ताह में एनएसजी की एक बैठक फिर से बुलाए जाने की संभावना दिख रही है.

भारत और अमरीका के बीच हुए असैन्य परमाणु समझौते पर अब 45 परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों की मंज़ूरी लेनी है. इस मंज़ूरी के बाद ही यह समझौता अमरीकी संसद के सामने रखा जाएगा और तब इसे लागू किया जा सकेगा.

इस समझौते से भारत पर पिछले 34 सालों से लगा परमाणु सामग्री और तकनीक के आयात का प्रतिबंध हट जाएगा.

आपत्तियाँ

गुरुवार को सुबह से एनएसजी की बैठक शुरु हुई. दोपहर से पहले इस बैठक को थोड़ी देर के लिए स्थगित किया गया और भारत ने एनएसजी के सदस्य देशों के सामने अपना पक्ष रखने की कोशिश की.

हम यह मानते हैं कि यह एक महत्वपूर्ण पहल है और हम सकारात्मक नतीजों के लिए प्रतिबद्ध हैं. यह समझौता परमाणु अप्रसार के लिए अच्छा है भारत को परमाणु ऊर्जा की ज़रुरत भी है

लेकिन शाम तक चली बैठक के बाद जो संकेत मिले उससे साफ़ हो गया कि कई देशों की आपत्तियाँ क़ायम हैं और वे इस समझौते को बिना शर्त मंज़ूरी नहीं देने जा रहे हैं.

हालांकि किसी देश ने खुलकर यह नहीं कहा है कि उसे क्या आपत्ति है लेकिन दिखता है कि मुख्य आपत्ति परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) से जुड़ी दिखती है.

इन देशों को आपत्ति है कि परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए बिना किस तरह भारत को परमाणु सामग्री और तकनीक आयात करने की अनुमति दी जा सकती है.

जिन देशों को इस समझौते पर आपत्ति है उनमें मुख्य रुप से तीन देशों के नाम लिए जा रहे हैं, ऑस्ट्रिया, स्विट्ज़रलैंड और नॉर्वे. लेकिन माना जा रहा है कि आयरलैंड, न्यूज़ीलैंड और स्वीडन को भी ऐसी ही आपत्ति है.

एक आपत्ति यह भी है कि समझौते में बिना यह शर्त जोड़े इसे मंज़ूरी नहीं दी जा सकती कि यदि भारत परमाणु परीक्षण करता है तो परमाणु सामग्री और तकनीक की आपूर्ति रोक दी जाएगी.

बुश प्रशासन चाहता है कि नए चुनावों से पहले यह समझौता पारित हो जाए. इस समझौते का विरोध कर रहे देशों का कहना है कि इससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आपत्ति करने का एक पुख़्ता आधार भी ख़त्म हो जाएगा.

उधर अमरीका तर्क दे रहा है कि भारत को परमाणु ऊर्जा की ज़रुरत है और वह इसे पाने के लिए अपने परमाणु कार्यक्रम में पारदर्शिता भी ला रहा है.

समाचार एजेंसियों के अनुसार अमरीकी विदेश उपमंत्री जॉन रूड ने पत्रकारों से कहा, "हम यह मानते हैं कि यह एक महत्वपूर्ण पहल है और हम सकारात्मक नतीजों के लिए प्रतिबद्ध हैं. यह समझौता परमाणु अप्रसार के लिए अच्छा है भारत को परमाणु ऊर्जा की ज़रुरत भी है."

विएना में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि भारत को जो कहना था उसने गुरुवार की बैठक में एनएसजी सदस्यों के सामने कह दिया और अब सारा दारोमदार अमरीका पर है कि वह किस तरह समझौते को बिना शर्त मंज़ूरी दिलवाता है.

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts

Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more