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बपरौला के लिए सुशील के कांसे के पदक में सोने की चमक

By Staff
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नई दिल्ली, 21 अगस्त (आईएएनएस)। कल तक नजफगढ़ के पास स्थित बपरौला गांव को तलाशना आसान नहीं था, लेकिन आज बपरौला का नाम जुबां पर आते ही बच्चा-बच्चा ओलंपिक में कुश्ती का कांस्य पदक जीतने वाले पहलवान सुशील कुमार के घर की ओर इशारा कर देता है।

नई दिल्ली, 21 अगस्त (आईएएनएस)। कल तक नजफगढ़ के पास स्थित बपरौला गांव को तलाशना आसान नहीं था, लेकिन आज बपरौला का नाम जुबां पर आते ही बच्चा-बच्चा ओलंपिक में कुश्ती का कांस्य पदक जीतने वाले पहलवान सुशील कुमार के घर की ओर इशारा कर देता है।

सुशील का घर शुभकामना देने वालों से भरा हुआ है। पूरे गांव में उत्सव का माहौल है। हर आदमी उनके स्वागत की तैयारी में जुटा है।

कुश्ती सुशील के खून मे बसी है। उनके पिता और दादा गांव में कुश्ती के चैंपियन थे। यह अलग बात है कि पैसे की कमी के कारण वे अपने शौक को पेशेवर स्तर तक नहीं पहुंचा सके।

सुशील के पिता दीवान सिंह ने आईएएनएस से खास बातचीत के दौरान कहा, "दस साल की उम्र में ही सुशील में कुश्ती के प्रति रुझान दिखा था। मैंने फैसला किया था कि चाहें जो भी हो, अपने बेटे का सपना पूरा करने के लिए मैं कुछ भी करुं गा। आज उसने मेरे साथ-साथ पूरे देश का नाम रोशन किया है।"

सुशील के घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा है। घर का मुख्य द्वार पूरे समय खुला रहता है। दीवान सिंह ने कहा, "हमारे लिए तो सुशील के कांसे के पदक में सोने की चमक है। उसकी बदौलत आज पूरा देश बपरौला को जान गया है। मीडिया की इसमें बड़ी भूमिका रही है।"

सुशील कुमार के कमरे में उनकी एक बड़ी तस्वीर और पदक रखे हैं। तस्वीर में सुशील पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के हाथों पुरस्कार ग्रहण कर रहे हैं। इसी कमरे में बैठ कर उनके पिता ने टीवी चैनलों को अनगिनत साक्षात्कार दिए हैं।

दीवान सिंह ने कहा, "सुशील के पदक जीतने के बाद तो मानो यहां का बच्चा-बच्चा पागल हो गया था। हम तो रात में दो घंटे भी नहीं सो सके। पूरा गांव हमारे घर पहुंच गया था। मिठाइयां खाने और खिलाने का दौर खत्म ही नहीं हो रहा था। हालांकि आज माहौल थोड़ा शांत है, लेकिन पदक जीतने का रोमांच अब भी बरकरार है।"

घर के दूसरे कमरे में बैठीं सुशील की मां कमला देवी ने पल्लू ठीक करते हुए कहा, "जब हमने उससे (सुशील) रात में बात की तो उसने बताया कि वह स्वर्ण जीतना चाहता था। हम भी यही चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इसका हमें और उसे दुख है, लेकिन साथ ही हमें इस बात की खुशी है कि उसने 52 साल बाद देश के लिए कांस्य पदक जीता। वह बहुत खुश है। हमारे लिए तो उसका यह पदक स्वर्ण से कम नहीं है।"

सुशील का एक भाई इंजीनियर है, जबकि दूसरा पढ़ाई कर रहा है। सुशील के माता-पिता ने कहा, "सरकार को सुशील जैसे खिलाड़ियों की मदद करनी चाहिए। कई लड़के तो कुश्ती सिर्फ इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि उनके पास इसे जारी रखने के लिए पैसे नहीं होते हैं। खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए गांव के करीब स्टेडियम और कोचिंग संस्थान होने चाहिए।"

सुशील का परिवार उनके स्वागत की तैयारी में जुटा है। दीवान सिंह ने कहा, "सुशील 23 अगस्त को दोपहर एक बजे घर पहुंचेगा। पूरा गांव उसके स्वागत की तैयारी कर रहा है। हमने उसके आगमन की खुशी में गांव के मंदिर में पूजा का कार्यक्रम रखा है। उसकी शादी के प्रस्ताव आने लगे हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि वह 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में अपना ध्यान लगाए।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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