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अट्ठारह साल की राखियों का हिसाब

By वंदना
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दलबीर कौर अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सरबजीत सिंह से मिलने गई थीं
राखी के मौक़े पर जब बहनें भाई की कलाई पर राखी बाँध रही होंगी, दलबीर कौर के भाई सरबजीत सिंह उनसे सैकड़ों मील दूर पाकिस्तान की एक जेल में उन्हें याद करेंगे.

गाँव, शहर, देस, परदेस...सब फ़ासलों को मिटा बहनें भाइयों को राखी बाँधती हैं. लेकिन भारत के पंजाब प्रांत में एक छोटे से गाँव में रहने वाली दलबीर कौर की दास्तां कुछ अलग है.

अलग इसलिए क्योंकि इस बहन के भाई का नाम है सरबजीत सिंह..भारत के नागरिक सरबजीत 18 वर्षों से पाकिस्तानी जेल में बंद हैं, बंद ही नहीं इस साल उन्हें उन्हें मौत की सज़ा भी सुना दी गई जो फ़िलहाल टली हुई है.

(अगर आप भी इस बारे में अपनी राय रखना चाहते हैं तो hindi.letters@bbc.co.uk पर मेल कर सकते हैं)

पिछले 18 सालों से दलबीर कौर के घर हर वर्ष रक्षाबंधन की थाली सजती है, वो राखी ख़रीदती हैं, भाई के पसंद की मिठाई भी लाती हैं...

जब मेरा भाई मेरे साथ भारत में रहता था तो मैं रक्षाबंधन से एक दिन पहले ही जाकर राखी और मिࢠाई ख़रीद लाती थी और हम भाई-बहन बेसब्री से सुबह का इंतज़ार करते रहते. सरबजीत जानबूझकर मुझे परेशान करने और चिढ़ाने के लिए शोर मचाता रहता कि दीदी जल्दी राखी बाँधो मुझे तो भूख लगी है

पर भाई की कलाई की जगह उसकी तस्वीर को ही राखी बांधकर दिल को दिलासा दिला लेती हैं और भाई के हिस्से की मिठाई तस्वीर के सामने ही रख देती हैं.

आज फिर राखी का त्यौहार आया है. भाई को राखी बाँधने की आस में उन्होंने पाकिस्तान जाने के लिए वीज़ा की अर्ज़ी तो 28 जुलाई को डाल दी थी पर कहा गया कि अभी वक़्त लगेगा. अब तक उन्हें वीज़ा नहीं मिला. .

भाई के फ़ोटो को राखी बाँधती हूँ..

तो राखी के दिन क्या बीत रहा है दलबीर कौर के मन पर?

वे बताती हैं, "हर बहन की तरह मेरी भी इच्छा है कि रक्षाबंधन वाले दिन मैं अपने भाई के सामने बैठकर उसकी कलाई पर राखी बाधूँ. मुझे तो उम्मीद थी कि वीज़ा मिल जाएगा और इसी उम्मीद में मैने एक बहुत बड़ी ग़लती कर दी- मैने डाक से भी राखी नहीं भेजी."

दलबीर कहती हैं, " रेशम की डोरी में बहन का प्यार और विश्वास रहता है. मैं कामना करती हूँ कि सरबजीत हमेशा जीता-जागता रहे और वो जल्द वापस आए ताकि मैं उसे घर में बिठाकर राखी बाँध सकूँ."

दलबीर कौर अपने भाई की रिहाई के लिए लगातार प्रयासरत हैं

दलबीर कौर और उनके भाई सरबजीत के जीवन में कभी ऐसा समय भी था जब वो बड़े चाव और अरमान के साथ इस पर्व को मनाते थे- बहन राखी बाँधती, भाई उसे थोड़ा परेशान करता और फिर प्यारा सा तोहफ़ा देता.

18 साल की लंबी जुदाई भाई की यादों को धुंधला नहीं कर पाई है. जब मैने पूछा कि कैसे याद करती हैं भाई को राखी के दिन तो पुराने दिन उनके ज़हन में एकदम ताज़ा थे.

दलबीर बताती हैं, "जब मेरा भाई मेरे साथ भारत में रहता था तो मैं रक्षाबंधन से एक दिन पहले ही जाकर राखी और मिठाई ख़रीद लाती थी, गुझिया बनाते थे और हम भाई-बहन बेसब्री से सुबह का इंतज़ार करते रहते. रक्षाबंधन के दिन सुबह बिना कुछ खाए-पिए पहले अरदास करते. सरबजीत जानबूझकर मुझे परेशान करने और चिढ़ाने के लिए शोर मचाता रहता कि दीदी जल्दी राखी बाँधो मुझे तो भूख लगी है."

मेरे भइया से कहना....

ये बातें यूँ तो वो भारत से फ़ोन पर बता रही थीं पर उनकी चेहरे के हाव-भाव और आँखों में पुरानी यादों की तस्वीरें यहाँ लंदन के स्टूडियो में बैठे मैं साफ़ देख पा रही थीं.

अपने दुख को छिपाने की कोशिश कर रहीं दलबीर कहती हैं, "हर साल जब भी राखी आती है तो मन भर जाता है, जो तक़लीफ़ होती है उसे तो बयान नहीं कर सकती. बस भाई की फ़ोटो को राखी बाँधती हूँ और मिठाई से उसका मुँह जूठा करती हूँ. शायद वो बहन समझ पाएगी जिसका भाई दूर है. कभी किसी का भाई इतनी दूर न बैठे जितना दूर मेरा भाई है."

हर साल जब भी राखी आती है तो मन भर जाता है, जो तक़लीफ़ होती है उसे तो बयान नहीं कर सकती. बस भाई की फ़ोटो को राखी बाँधती हूँ और मिࢠाई से उसका मुँह जूࢠा करती हूँ. भाई के पास जाना तो आज के दिन मुमकिन नहीं पर दिल से यही निलकता है कि चंदा रे मेरे भइया से कहना, बहना याद करे

कहते-कहते उनका गला रुँध जाता है. भाई की यादों ने उनके आत्मसंयम को तोड़ दिया. दिल में दबा दर्द जैसे आँसू बनकर बह निकला. रूँधी आवाज़ में दलबीर कहती हैं, "भाई के पास जाना तो आज के दिन मुमकिन नहीं पर दिल से यही निकलता है कि...चंदा रे मेरे भईया से कहना, बहना याद करे...

काश उसे पता चले कि आज राखी का दिन कितना भारी है मुझपर, मैं भावुक हो रही हूँ शायद वो नहीं कह पाऊँगी जो कहना चाहती थी."

कुछ देर के लिए फ़ोन लाइन पर ख़ामोशी छा गई. पूछने के लिए सवाल तो कई थे मेरे पास पर रूँआसी बहन को दिलासा दिलाने के लिए क्या कहूँ ये समझ में नहीं आया.

राखियों का उधार...

मुझसे ज़्यादा हिम्मतवाली शायद दलबीर कौर थीं, ख़ुद को संभालते हुए बताने लगीं कि इस साल अप्रैल में वे पाकिस्तान गई थीं और 18 साल बाद अपने भाई सरबजीत से मिलीं थीं.

सरबजीत सिंह की रिहाई के लिए जगह-जगह आंदोलन चलाए गए

दलबीर ने बताया, "मुझ पर 18 साल की राखियों का उधार था. मैं अपने साथ 18 राखियाँ लेकर गई थी- मैने सरबजीत को कलाई पर राखी बाँधी और कई बार हाथ को चूमा. पर भाई के चेहरा ग़मगीन था.. उसने मुझे देखा और कहा कि आज मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ नहीं है. जब मैं जेल में उससे मिलने गई थीं, मेरा एक पैर बाहर था और एक पैर जेल के अंदर. सरबजीत जेल की सलाखों के पीछे खड़ा था पर बहन की आँखों ने दूर से ही भाई को पहचान लिया. पता नहीं कब मैं उस तक पहुंच गई. मैने उसे कहा कि काश आज मैं इस तरह तुम्हे खड़े हुए न देखती, बहुत ग़मगीन और भावुक पल थे."

दलबीर बताती हैं, "पाकिस्तान जाने से पहले पूरा परिवार सोचकर गया था कि सरबजीत के सामने मन नहीं ख़राब करेंगे और सिर्फ़ उसे हौसला देकर आ जाएँगे. लेकिन हमारी भावनाएँ इस कदर आँखों से बह गईं कि कोई कुछ बोल ही नहीं पाया एक दूसरे को."

जेल में सरबजीत चुप-चाप था पर बहन की आँखों को पता था कि भाई अपना ग़म को छिपा रहा था, वो रोना चाहता है लेकिन बहन को, बेटियों की तक़लीफ़ न हो इसलिए आँसू थाम रहा है.

इतनी ज़िंदगी ज़रूर देना....

भाई को जेल की काल --कोठरी में मिलने के बाद जब से दलवीर कौर लौटी हैं उन्हें यही चिंता खाती रहती है कि कैसे भाई एक छोटी सी कोठड़ी में धरती पर सोता होगा, भाई का कद लंबा है उसकी टाँगे भी नहीं समाती होंगी, अच्छा बिस्तर नहीं, ऊपर ओढ़ने के लिए अच्छी चादर नहीं, चारों ओर सिर्फ़ तन्हाई, केवल दीवारों को देखना और दीवारों से ही बातें करना....

मुझ पर 18 साल की राखियों का उधार था. मैं पाकिस्तानी जेल में अपने साथ 18 राखियाँ लेकर गई थी- मैने सरबजीत को कलाई पर राखी बाँधी और कई बार हाथ को चूमा. पर भाई के चेहरा ग़मगीन था.. उसने मुझे देखा और कहा कि आज मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ नहीं है.

लेकिन दलबीर जानती हैं कि हिम्मत हारने से काम नहीं चलेगा. पाकिस्तानी जेल से सरबजीत की रिहाई के लिए वो पंजाब, दिल्ली, वाघा बॉर्डर ..हर दूसरे दिन कहीं न कहीं चक्कर लगाती हैं.

वे कहती हैं कि बहुत से लोग उनके भाई के लिए दुआ करते आए हैं और इन दुआएँ की सदके ही उनकी उम्मीदें और क़दम आगे बढ़ते हैं.

ये कहानी सिर्फ़ एक दलबीर कौर की नहीं है. क्या भारत, क्या पाकिस्तान, क्या राखी, क्या दीवाली और क्या ईद ...दो देशों के बीच रिश्तों की इस कड़वाहट ने कई परिवारों के कई रिश्तों की मिठास और कई पर्वों की ख़ुशियाँ छीन ली हैं.

राखी के दिन दलबीर के मन से यही दुआ निकलती हैं, "इसी विश्वास को लेकर मैं ज़िंदा हूँ कि सरबजीत एक दिन ज़रूर आएगा, मेरा घर ख़ुशियों से चहकेगा, वो अपनी बेटियों को गोद में बिठाएगा, बिटिया को डोली चढ़ाएगा. भगवान से यही कहूँगी कि मुझे उतनी ज़िंदगी ज़रूर उधार दे देना कि भाई को अपने आँगन में देख सकूँ."

बात ख़त्म होते-होते वे बस इतना बोलती हैं कि ये अरदास मैं अपने परमात्मा से हर उस बहन के लिए करती हूँ जिसका भाई उससे दूर है.

और हाँ वीज़ा मिलने की उम्मीद छोड़ी नहीं है दलबीर कौर ने. देर से भी मिला तो वीज़ा लेकर भाई को राखी बाँधने और अपना प्यार देने जाएगी ये बहन. उनका असली रक्षाबंधन उसी दिन होगा.

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