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भालू अब भी नाचते हैं पर अपनी मर्ज़ी से

By ऋचा कुलश्रेष्ठ
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अपने मालिक के इशारे पर नाचते हुए भालू (सभी फ़ोटो साभार वाइल्डलाइफ़ एसओएस)
तमाशा दिखाने वाले भालुओं को उनके मदारियों से छुड़वाकर एक प्राकृतिक आवास में रखा गया है जहाँ वे कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं और खुश हैं

उस छोटी सी भालू की बच्ची की नाक को गर्म कील से छेदा गया और वहाँ से मुंह तक एक मोटी सी रस्सी बांध दी गई. इसके बाद उस रस्सी के खींचने के साथ उसे नाचना और तमाशा दिखाना सिखाया गया.

रस्सी खिंचने से होने वाले दर्द को सहते हुए वह अपने मालिक का कहा मानने लगी. असहनीय दर्द और तकलीफ़ के बावजूद नाच-नाच कर और तमाशा दिखाकर वह लोगों का मनोरंजन करने लगी.

किस्मत से 'वाइल्डलाइफ एसओएस' ने सुलताना की पुकार सुन ली. आंध्रप्रदेश के किसी गाँव से किसी ने सुलताना के बारे में वाइल्डलाइफ़ एसओएस को सूचना दी. क्षेत्र के वन विभाग ने पुलिस के ज़रिएसुलताना को मदारियों से छुड़वाया.

भालू की इस छोटी सी बच्ची को ग़ैरकानूनी ढंग से बंधक बनाने के आरोप में सुल्ताना के मालिक को रंगे हाथों पकड़कर हवालात भेजा गया और सुलताना को उत्तरप्रदेश के आगरा स्थित भालू संरक्षण केंद्र भेज दिया गया जहाँ उसकी नाक से छल्ला उतार कर नाक के जख्म का इलाज किया गया.

भरापूरा परिवार

अब सुलताना जहाँ रहती है वहाँ उसका एक भरापूरा परिवार है. वह अब सिर्फ नाचने वाली न रहकर खुलकर खेलने कूदने वाला एक आम भालू बन गई है.

भालू की नाक को छेदा जाता है फिर उसमें लोहे का छल्ला और रस्सी डाली जाती है.

अब वह स्वतंत्र है, कुछ भी करने के लिए. पर फिर भी कभी कभी किसी मनुष्य को देखने या संगीत सुनने पर वह अपने पुराने अनुभवों को याद करके भयभीत और बेचैन हो जाती है.

सुलताना को छुड़वाने के लिए वाइल्डलाइफ एसओएस ने कलंदरों को उनकी रोज़ीरोटी से वंचित करना ठीक नहीं समझा.

कलंदर जाति के लोग पिछले तीस सालों से भालुओं का तमाशा दिखाकर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं. इस तरह यह उनका पुश्तैनी धंधा है. आज भी अनेक भालू भारत की सड़कों पर लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं.

कमाई के विकल्प

कलंदरों को उनके इस पुश्तैनी धंधे से हटाने के लिए कमाई का विकल्प उपलब्ध कराया गया. किसी को ऑटोरिक्शा ख़रीदने के लिए तो किसी को सिलाई मशीन ख़रीदने के लिए भालू के बदले धन उपलब्ध कराया गया और एक समझौते पर हस्ताक्षर कराए गए कि वे भविष्य में कभी किसी भालू को बंधक नहीं बनाएंगे.

उनकी मदद के लिए उन्हें और उनकी पत्नी को नए काम की ट्रेनिंग भी दी गई. यही नहीं, उनके परिवार को सारी सहायता उपलब्ध कराने के साथ उनके बच्चों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी भी वाइल्डलाइफ़ एसओएस ने ले ली.

सुलताना के ही बराबर की रेशमा को कलंदर जाति के हुसैन साहब तीन हजार रुपए में खरीद कर लाए थे. रेशमा को भी उसकी माँ के दूर कहीं चले जाने पर जंगल से उठाकर बेच दिया गया था. और उसकी नाक को भी छेदकर और उसमें रस्सी डालकर उसे नाचने के लिए मजबूर किया जाता था.

कलंदरों से छुड़वाया गया भालू का एक छोटा बच्चा

समय बदलने के साथ ही भालू को नचाने का धंधा छोटे शहर और कस्बों में ही सिमट गया और हुसैन साहब की कमाई बहुत कम रह गई इसलिए हुसैन साहब ने खुद ही रेशमा को वाइल्डलाइफ़ एसओएस के हवाले करना बेहतर समझा और रेशमा भी आगरा के भालू संरक्षण केंद्र में पहुँच गई.

भालू का अधिकार

अब वे दोनों स्वतंत्र हैं और मज़े की ज़िंदगी व्यतीत कर रही हैं. अब वहाँ उनके सारे जख्म भर चुके हैं और उन्हें स्वच्छ पानी, भोजन और उचित इलाज के अलावा ज़रूरत का सभी सामान आराम से उपलब्ध हैं.

भालू भी वन्यजीव संरक्षण कानून 1972 के तहत जंगली जानवरों जैसे बाघ और चीते की तरह ही संरक्षित प्राणियों की सूची में शामिल हैं इसलिए उनको भी उसी तरह के संरक्षण का अधिकार है जैसा कि ऐसे दूसरे जंगली जानवरों को है. लेकिन कलंदरों के इस पेशे और दूसरे अनेक कारणों की वजह से भारतीय जंगलों में मिलने वाले विशेष प्रजाति के भालू संख्या में कम और लुप्त होते जा रहे हैं.

वाइल्डलाइफ़ एसओएस की सह-संस्थापक गीता शेषमणि कहती हैं, "हालाँकि भालुओं को बचाते हुए हमें छह साल हो गए हैं लेकिन हम यह नहीं भूले हैं कि आज भी भारत की सड़कों पर भालू नाचते हैं जिन्हें हमारी मदद की सख्त ज़रूरत है."

भालू केंद्र में भालू अपनी मर्ज़ी से रहते हैं, नाचते हैं, कूदते और खेलते हैं

उन्होंने बताया, "अब हमें आगरा के अलावा मथुरा में भी भालुओं को रखने के लिए जगह मिल गई है जिसके लिए हम सरकार के आभारी हैं और इसकी हमें बहुत खुशी है लेकिन सबसे बड़ी खुशी हम तभी मनाएंगे जब कोई भी भालू सड़क पर नहीं नाचेगा. "

उन्होंने कहा, "अब हम जल्द ही उस जगह को पेड़ लगाकर, भालुओं के घर, तालाब और झूले इत्यादि लगाकर भालुओं के रहने लायक बना देंगे "

प्राकृतिक आसरा

वाइल्डलाइफ एसओएस नाम के एक गैरसरकारी संगठन ने नाचने वाले भालुओं के खत्म होते अस्तित्व और उनकी तकलीफ और दर्द को पहचान कर न सिर्फ भारत भर में उन्हें कलंदरों के कब्ज़े से छुड़वाया बल्कि राज्य सरकार के सहयोग से आगरा की कीठम झील परिसर में स्थित भालू केंद्र, कर्नाटक के बनरझाटा भालू केंद्र, भोपाल वन विहार भालू केंद्र और पुरुलिया भालू केंद्र में प्राकृतिक रूप से भालुओं के बसने के लायक आसरा भी बनवाया.

आगरा का भालू संरक्षण केंद्र ताजमहल के नजदीक ही लगभग 160 एकड़ जमीन पर बना हुआ है और आज की तारीख़ में दुनिया का सबसे बड़ा भालू संरक्षण केंद्र है.

वाइल्डलाइफ़ एसओएस को आगरा के पर्यटन स्थलों ताजमहल और फतेहपुर सीकरी के आसपास से नाचने वाले भालुओं को हटाने के लिए उत्तरप्रदेश सरकार ने विशेष पुरस्कार भी दिया है.

आगरा का भालू संरक्षण केंद्र दुनिया में सबसे बड़ा है.

दिसंबर 2002 से शुरू हुए इस अभियान के तहत आगरा के भालू संरक्षण केंद्र में आज 482 भालू मौजूद हैं जो एकदूसरे के साथ हंसते हैं खेलते हैं, लड़ते झगड़ते हैं, रूठते मनाते हैं और मस्ती करते हैं.

संगठन के सह-संस्थापक कार्तिक सत्यनारायण कहते हैं, "हमें इस काम के लिए भारत से तो बहुत कम पैसा मिलता है. इसके अलावा हमें कुछ पैसा विदेशी संगठनों से भी मिल जाता है. अपने काम को और बढ़ाने के लिए हमें पैसे की सख्त ज़रूरत है क्योंकि हम उन्हें क्रूरता का शिकार होते और दर्द सहन करते हुए नहीं देख सकते. ऐसे में हम जनता से भालुओं को गोद लेने और उन्हें स्पांसर करने की अपील करते हैं."

वाइल्डलाइफ़ एसओएस आस्ट्रेलिया के 'ह्यूमन सोसायटी इंटरनेशनल', 'फ्री, द बीयर्स फंड', फ्रांस के 'वन वायस' और 'इंटरनेशनल एनिमल रेस्क्यू' की मदद से काम करता है.

वाइल्डलाइफ़ एसओएस की कम्युनिकेशन अधिकारी वसुधा मेहता कहती हैं, "मैं भारत की जनता से अपील करती हूँ कि वे भालू का नाच देखने के लिए हामी न भरें. जब हम सभी ऐसा कोई काम न करने के लिए ठान लेंगे जिससे वन्य जीवों का नुकसान होता हो तभी हम अपनी वन्य संपदा को बचा सकते हैं."

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