• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

स्वतंत्रता संग्राम के शाश्वत आदर्श (विशेष लेख)

By Staff
|

नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। भारत के इतिहास में आजादी की लड़ाई के दिनों का बहुत विशेष महत्व है। अंग्रेजी शासन के लगभग 200 वर्षो के दौरान निरंतरता से विदेशी शासन का विरोध हुआ। वैसे तो आजादी की लड़ाई के कई मोर्चे थे और उसमें कई उतार-चढ़ाव आए, पर यह इस पूरे दौर की एक ऐसी बहुत बड़ी उपलब्धि थी जिसने हजारों साल के इतिहास में इन 200 वर्षो को बहुत विशिष्ट स्थान दिया। यह उपलब्धि थी एक आदर्श के लिए अपने जीवन को समर्पित करने की भावना। बड़ी संख्या में स्वतंत्रता सेनानियों ने जीवन की तमाम सुख-सुविधाओं को जिस एक महान आदर्श पर न्यौछावर कर दिया वह आदर्श था भारत की आजादी।

नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। भारत के इतिहास में आजादी की लड़ाई के दिनों का बहुत विशेष महत्व है। अंग्रेजी शासन के लगभग 200 वर्षो के दौरान निरंतरता से विदेशी शासन का विरोध हुआ। वैसे तो आजादी की लड़ाई के कई मोर्चे थे और उसमें कई उतार-चढ़ाव आए, पर यह इस पूरे दौर की एक ऐसी बहुत बड़ी उपलब्धि थी जिसने हजारों साल के इतिहास में इन 200 वर्षो को बहुत विशिष्ट स्थान दिया। यह उपलब्धि थी एक आदर्श के लिए अपने जीवन को समर्पित करने की भावना। बड़ी संख्या में स्वतंत्रता सेनानियों ने जीवन की तमाम सुख-सुविधाओं को जिस एक महान आदर्श पर न्यौछावर कर दिया वह आदर्श था भारत की आजादी।

इस आजादी की लड़ाई के दौरान देश को अनेक महान नेता मिले जो देश-दुनिया में विख्यात हुए। पर इसमें भी बड़ी उपलब्धि यह है कि किसी महान आदर्श के लिए सुख-सुविधाएं, लोभ-लालसा, धन संपत्ति त्याग करने की भावना लाखों की संख्या में जनसाधारण तक पहुंच सकी, उनमें से अधिकांश ऐसे थे जिनका आज कोई नाम भी नहीं लेता। अपने जीवनकाल में भी उन्होंने कष्टों को ही पुरस्कार माना और गरीबी-कठिनाई में भी इस अहसास पर जिए कि उनका जीवन एक महान आदर्श के लिए समर्पित हो रहा है।

किसी आदर्श के लिए सब कुछ न्यौछावर करने के लिए जिस समाज में लाखों लोग तैयार हों, उस समाज में ही ऐसे नैतिक बल का सृजन होता है जिसके द्वारा बहुत महान कार्य हो सकते हैं व असंभव भी संभव हो सकता है। इस नैतिक बल के दम पर ही निहत्थे लोगों ने बार-बार विश्व के सबसे बड़े सम्राज्यवाद को जबरदस्त टक्कर दी व अंत में उसे खदेड़ कर ही चैन लिया। किसी महान आदर्श के लिए समर्पित जीवन आजादी की लड़ाई की सबसे गौरवशाली विरासत थी।

पर आजादी प्राप्त करने के बाद हमारे समाज ने बहुत बड़ी गलती यह की कि उसने इस विरासत को बहुत शीघ्र ही भुला दिया। यह मान लिया गया कि आजादी प्राप्त होने के बाद किसी महान आदर्श के लिए तन-मन-धन न्यौछावर करने की जरुरत ही नहीं है। आजादी के बाद के कुछ वर्षो तक आजादी की लड़ाई की लौ का असर समाज में नजर आता रहा। समाज में आदर्श को कुछ हद तक एक ऊंचा स्थान मिलता रहा। पर आज तो ऐसा लगता है जैसे किसी महान आदर्श के आगे सुख-सुविधाओं को न्यौछावर करने की आजादी की लड़ाई की विरासत को लगभग भुला दिया गया है।

फिर भी इतनी सांत्वना है कि आज भी समाज में गिने-चुने व्यक्ति या संगठन ऐसे हैं जिनके प्रयासों में हमें आजादी की लड़ाई के दिनों की वह झलक मिल जाती है। दूसरी बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि आजादी की लड़ाई के दिनों में इस तरह के आदर्शो के लिए जीने वाले व्यक्तियों को निरंतरता से, व्यापकता से तैयार करने की जो श्रंखला बन गई थी वह अब टूट चुकी है। बात यहां तक बिगड़ चुकी है कि आदर्श की बात करने वाला अपने को निहायत अकेला ही महसूस नहीं करता, उसका मजाक भी उड़ाया जाता है। समाज त्याक करने वालों को ही त्यागने के लिए तैयार बैठा है। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच में कोई पूरे तो कोई आधे-अधूरे मन से आदर्शो के लिए खड़ा है तो सिर्फ अपने बल-बूते पर। समाज में आदर्श को पूजने, इस राह पर चलने की प्रेरणा व प्रशिक्षण देने की नींव तैयार करने का सिलसिला अब टूट चुका है।

तो यह मान लिया जाए कि आज किसी महान आदर्श की वैसी जरुरत नहीं रही जो आजादी के दिनों में थी? यहां जोर देकर कहना जरुरी है कि आजाद भारत में भी आदर्श को आधार मानकर जीवन जीने की पहले जैसी जरुरत बनी हुई है। आजादी के 60 साल बीत जाने पर भी क्या देश में गरीबी, भूख, कुपोषण, बुनियादी सुविधाओं का अभाव भयंकर रूप में उपस्थित है। विषमताएं बढ़ रही हैं, पर्यावरण उजड़ रहा है एवं देश के प्राकृतिक संसाधनों पर चंद दौलतमंदों का कब्जा बढ़ता जा रहा है। विदेशी कंपनियों को देश के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने की खुली छूट दी जा रही है। सेज जैसे नए कानूनों के माध्यम से लोगों की आजीविका के आधार पर नए हमले किए जा रहे हैं। शराब, जुए, अश्लीलता का प्रसार बढ़-चढ़ कर हो रहा है। समाज की समस्याएं बढ़ रही हैं व इनके समाधान के लिए जो संघर्ष जरुरी है उसकी संभावनाओं को समाज के नैतिक पतन द्वारा नष्ट किया जा रहा है।

इस पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए आदर्श के स्थान पर 'कैरियर' या 'संकीर्ण स्वार्थ' को प्रतिष्ठित किया जा रहा है। समाज में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि अधिक से अधिक धन अर्जित करना या सबसे प्रतिष्ठित पद पर पहुंचना ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

पर समाज की और इस कठिन समय की मांग है कि आदर्शो पर आधारित आजादी की लड़ाई की विरासत को न केवल जिंदा रखा जाए बल्कि इसे और सशक्त किया जाए क्योंकि इसी के दम पर हमारे समाज को गंभीर समस्याओं से जूझने का नैतिक बल मिलेगा।

(लेखक प्रबुद्ध एवं अध्ययनशील लेखक हैं। उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

**

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more