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कैसे संकेत हैं भारत के लिए?

By सुशांत सरीन
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पिछले एक साल में परवेज़ मुशर्रफ़ की राजनीतिक मुसीबतें लगातार बढ़ी हैं
कई लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि परवेज़ मुशर्रफ़ का जाना भारत के लिए क्या चुनौतियाँ लेकर आ सकता है? पढ़िए सुशांत सरीन का एक विश्लेषण.

पाकिस्तान में जो कुछ भी घटता है भारत की उसमें ख़ासी रूचि होती है. ख़ास तौर पर तब, जब पाकिस्तान के उस राष्ट्रपति को हटाए जाने की बात हो रही हो जिसके शासनकाल में भारत पाकिस्तान के बीच के संबंध तेज़ी से सुधरे.

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने यदि परवेज़ मुशर्रफ़ को भारत के लिए बेहतर बताया था तो वह बेवजह नहीं था.

ऐसे में कई लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि मुशर्रफ़ का जाना भारत के लिए क्या चुनौतियाँ लेकर आ सकता है? मेरा मानना है की मुशर्रफ़ के जाने से कोई कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. मुशर्रफ़ अब वो ताक़त नहीं रखते जो वो पाकिस्तान के राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष रहते हुए रखते थे. लेकिन इन दिनों वो अस्तित्व की लडाई लड़ रहे राष्ट्रपति भर हैं.

हालात पहले जैसे हो सकते हैं अगर मुशर्रफ़ पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दें और वापस उतने ही ताक़तवर हो जाएँ, पर इसकी संभावना कम दिखती है.

इसका अर्थ है कि पाकिस्तान में जो चुनी हुई सरकार आज है, भारत को उसी के साथ बातचीत जारी रखनी होगी. भले ही इस सरकार के साथ अब तक भारत के अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैं.

पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच सार्क सम्मलेन के दौरान जो घटा वो इसका सबसे अच्छा उदहारण है. भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने कहा, "दोनों देशों के संबंध वहाँ नहीं हैं जहाँ वो पिछले चार साल से थे."

भारत लगातार ये दावा कर रहा है कि नियंत्रण रेखा की तरफ़ से से पाकिस्तानी घुसपैठ बढ़ी है और नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी बढ़ती जा रही है.

पाकिस्तान की नई सरकार की बात करें तो एक तरफ़ तो भारत को अघोषित रूप से व्यापार के लिए सर्वाधिक प्रमुखता वाला देश बना दिया है दूसरी तरफ़ दोनों देशों के बीच तनाव दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है.

वर्तमान परिस्थितियों को देख कर लगता है कि या तो कश्मीर में जो कुछ भी हो रहा है उसे रोकने की क्षमता इस सरकार में नहीं है या फिर पाकिस्तान में कश्मीर के प्रति वर्तमान नीति को लेकर सेना और देश की सरकार में एक आम सहमति है.

पाकिस्तान की रणनीति?

भारत प्रशासित कश्मीर में अस्थिरता को बढ़ावा देने की होने की पीछे तीन मुख्य कारण हो सकते हैं, पहला, वहाँ जल्द ही होने वाले विधानसभा चुनावों को प्रभावित करना.

पाँच सालों के संघर्ष विराम के बाद नियंत्रण रेखा पर तनाव बढ़ता दिख रहा है

दूसरा, अपनी अंदरूनी राजनीतिक और सामरिक जरूरतों के कारण. पिछले चार साल से पाकिस्तान की बदली हुई कश्मीर नीति के कारण कश्मीर आंदोलन से जुड़े कई लोग मायूस हो कर अपने आंदोलन के लिए दूसरे रास्ते तलाशने लगे थे. पाकिस्तान को उन लोगों की उम्मीदों को बनाए भी रखना है.

हालांकि अभी हालात चार साल पहले जैसे नहीं हुए हैं पर जल्दी ही वैसे हो जाएँ तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए.

लगातार ख़बरें आ रहीं हैं कि लश्कर-ए-तोएबा और जैश-ए-मोहम्मद के कार्यालय अन्य नामों से वापस खुलने लगे हैं.

तीसरा पंजाब और कश्मीर के कई चरमपंथी और तथाकथित जेहादी भारत की जगह पाकिस्तान के क़बायली इलाकों में पाकिस्तान और अमरीका की फौजों के ख़िलाफ़ लड़ने लगे थे.

इसकी वजह से पाकिस्तान के पश्तून और अन्य क़बायली चरमपंथियों को पंजाब और कश्मीर में पैठ बनाने की जगह मिल रही थी.

कश्मीर में तनाव कम करने के पीछे अमरीका की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता और अब ये तथाकथित जेहादी मुजाहिदीन अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सेना को काफ़ी परेशान कर रहे हैं.

कश्मीर में बढ़ा तनाव एक ओर जहाँ पाकिस्तान की सेना को तेज़ी से काबू के बाहर जा रहे स्वात और अन्य सीमान्त इलाकों में राहत देगा वहीँ ये अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सेना की दिक्कतें भी कम करेगा.

ऊपर से देख कर तो लगता है की यही पाकिस्तान की रणनीति है. अब ये रणनीति कितना सफल होगी ये वक्त बताएगा और भारत के पास तब तक शायद इंतज़ार करने और देखने के सिवा कुछ नहीं है.

(बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त से बातचीत पर आधारित)

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