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क्या एक और विभाजन होगा?

By नईमा अहमद महजूर
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जम्मू और कश्मीर दोनों जगह एक-दूसरे के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया दिख रही है
अमरनाथ भूमि आवंटन मामला पूरी तरह से सांप्रदायिकता के रंग में रंग गया है. जम्मू और कश्मीर धर्म के आधार पर बँट गए दिख रहे हैं.

भविष्य में कश्मीर विवाद पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है.

भारत प्रशासित कश्मीर के मुसलमान कहते हैं कि वे अमरनाथ यात्रा के ख़िलाफ़ नहीं हैं और वे यात्रियों को हर प्रकार की सुविधा पहुंचाने का संकल्प लेते हैं लेकिन वे मंदिर बोर्ड को ज़मीन देने के विरूद्ध एकजुट हैं.

वहाँ ज़्यादातर मुसलमानों को डर है कि इसका मक़सद कश्मीर में हिंदुओं को बसाना है जिससे कि इस का मुस्लिम बहुल राज्य का दर्जा ख़तरे में पड़ सकता है.

ये विवाद दरअसल इसी साल मई में उस समय शुरू हुआ जब राज्यपाल की अध्यक्षता में काम करने वाले अमरनाथ मंदिर बोर्ड की दरख़्वास्त पर राज्य सरकार ने बालताल के पास लगभग 100 एकड़ ज़मीन बोर्ड को दे दी.

इसके फ़ौरन बाद मुसलमानों ने लगभग नौ दिनों तक सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया. प्रदर्शन की गूंज इतनी ऊंची थी कि सरकार ने मंदिर बोर्ड को ज़मीन देने का फ़ैसला वापस ले लिया.

और साथ ही पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस लेने से कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई.

हालात की गंभीरता देखकर कश्मीर में मौजूद लाखों पर्यटक और यात्री फ़ौरन घाटी छोड़ने पर मजबूर हो गए.

हिंदू आबादी वाले जम्मू क्षेत्र में फ़ैसला वापस लेने के ख़िलाफ़ ज़बर्दस्त विरोध प्रदर्शन और रास्ता रोको अभियान शुरू हो गया.

मामला उलझता जा रहा है

इन प्रदर्शनों के कारण कश्मीर घाटी की सप्लाई लाइन यानी राजमार्ग को न सिर्फ़ बंद कर दिया गया बल्कि कई स्थानों पर कश्मीरी ट्रक ड्राइवरों को हिंसा का निशाना बनाया गया.

राजमार्ग का महत्व सिर्फ़ ये नहीं है कि यह कश्मीर की सप्लाई लाइन है बल्कि यह शेष भारत और भारत प्रशासित कश्मीर के बीच एक मात्र ज़मीनी रिश्ता है और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग जताने का एक मत्वपूर्ण प्रतीक भी.

घाटी के मुसलमानों ने इस संकट में एक राजनीतिक अवसर देखा और राजमार्ग के बदले मुज़फ़्फ़राबाद रोड खोलने और उसी रास्ते से कारोबार करने की धमकी दी.

इस संघर्ष के कारण राज्य की स्थिति 1990 से भी ख़राब हो गई है. वर्ष 1990 में पहले हिंसा शुरू हुई और उसके बाद जनप्रदर्शन, मगर इस वक़्त बंदूक़ ख़ामोश है और कश्मीरी अलगाववादी संगठन प्रदर्शन की ओट में स्वतंत्रता का आंदोलन चला रहे हैं.

बँटवारा

मौजूदा स्थिति से सबसे बड़ा नुक़सान यहां की पारंपरिक सहिष्णुता और भाईचारे को हुआ है. हिंदुओं और मुसलमानों के बीच गहरी खाई पैदा हो गई है. एक दूसरे पर भरोसे की कमी है और राजनीतिक पार्टियाँ सियासत के चक्कर में स्थिति को बिगाड़ने पर अड़ी हुई हैं.

जम्मू और कश्मीर में एक जैसी उग्रता दिख रही है

भारत सरकार के लंबे समय तक चुप रहने से कुछ ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि शायद किसी योजना के तहत ऐसे हालात पैदा किए जा रहे हैं कि जम्मू और कश्मीर एक दूसरे से अपने आप अलग हो जाएँ.

मौलवी उमर फ़ारूक़ के इस बयान से लगता है कि कुछ नेताओं को पहले ही से यह बात मालूम है कि हालात उसी डगर पर जाएंगे कि राज्य के विभाजन के बिना कश्मीर समस्या का कोई हल नहीं होगा.

तीन दिन पहले उन्होंने कहा था कि जम्मू के हिंदू इलाक़े अगर कश्मीर से अलग भी होते हैं तो उन्हें कोई एतराज़ नहीं है.

हैरानी की बात यह है कि भारत और पाकिस्तान दोनों मूक दर्शक की तरह सब कुछ देख रहे हैं और सन 1947 की स्थिति के दोबारा पैदा होने का इंतज़ार कर रहे हैं.

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