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आदिवासियों के बीच आम्टे की तीसरी पीढ़ी

By ज़ुबैर अहमद
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प्रकाश आम्टे को उनकी पत्नी मंदाकिनी के साथ मैगसेसे पुरस्कार देने की घोषणा की गई है
महाराष्ट्र में हेमलकसा के जंगलों में तीन दशकों से गोंड आदिवासियों का जीवनस्तर सुधारने में जुटे मैगसेसे विजेता डॉक्टर दंपति प्रकाश और मंदाकिनी की कहानी.

यह भारत के बीचों-बीच महाराष्ट्र में गोंड आदिवासियों का एक छोटा सा गांव है जिसकी सीमाएँ मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से लगती हैं.

इसके इर्द-गिर्द फैले घने जंगल उन नक्सलियों से भरे हुए हैं जो संपदा और संपत्ति के समान वितरण की माँग को लेकर सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं.

बाहरी लोगों का यहाँ तक आना उनके लिए कोई ख़ुशी की बात नहीं है. और अगर आप आम्टे नहीं हैं तो इन 'दुश्मनों' के बीच आपका रहना सुरक्षित भी नहीं है.

डॉ. प्रकाश आम्टे और उनकी पत्नी डॉ. मंदाकिनी आम्टे अपनी शादी के फ़ौरन बाद 34 साल पहले यहां आ बसे थे.

गुमनामी हेमलकसा का दूसरा नाम है. लेकिन पिछले कुछ दिनों से यह काफ़ी चर्चा में है.

इसका एकांत कुछ दिनों के लिए ख़त्म हो गया है. इसका कारण है कि आम्टे दंपति को समाजसेवा के लिए प्रतिष्ठित मैगसेसे पुरस्कार के लिए चुना गया है.

34 साल पहले और अब...

यक़ीनन 60 वर्षीय डॉ. प्रकाश गर्व से कहते हैं, "हम लोग इन आदिवासियों के लिए सारी दुनिया से कट कर पिछले 34 वर्षों से काम कर रहे हैं. हमने कभी इस तरह के इनाम या पुरस्कार की उम्मीद नहीं की थी. लेकिन हमें ख़ुशी है कि हमारे काम को सराहा गया."

उनकी 62 वर्षीय पत्नी डॉ. मंदाकिनी का कहना है कि आदिवासियों ने शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रगति की है, उसकी जानकारी इस पुरस्कार से उन्हें दूसरों तक पहुँचाने में मदद मिलेगी.

वो कहती हैं, "जब 1974 में हम यहां आए, उस समय मात्र एक आदिवासी था जिसने स्कूल का मुँह देखा था और वह भी बाहर से आया था. यहाँ के गाँवों से कोई कभी स्कूल नहीं गया था."

मंदाकिनी बताती हैं, "आज यहाँ कई स्नातक हैं. कई डॉक्टर, वकील और दूसरे पेशेवर लोग हैं."

इन लोगों ने डॉ. आम्टे के स्कूल में शिक्षा हासिल की जिसे आम्टे दंपति ने आदिवासियों को शिक्षित करने के मक़सद से शुरू किया था.

'... ताकि शोषकों से लड़ सकें'

समाजसेवी स्वर्गीय बाबा आम्टे के पुत्र डॉ. प्रकाश आम्टे कहते हैं, "हम उन्हें इसलिए शिक्षित बनाना चाहते थे ताकि वे सरकारी अधिकारियों और दूसरे ताक़तवर लोगों के शोषण के ख़िलाफ़ लड़ सकें."

उनकी पत्नी मंदाकिनी याद करती हैं, "उस ज़माने में यहां न तो पीने का पानी था और न ही बिजली. यह इलाक़ा भारत की मुख्यधारा से कटा हुआ था."

आम्टे दंपति मानते हैं कि शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए शिक्षित होना ज़रूरी है

उनका कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ के बारे में जागरूकता लाना सबसे महत्वपूर्ण था और इसलिए खुले आसमान के नीचे उनलोगों ने एक अस्पताल और एक स्कूल की शुरुआत की.

इस गांव में आम्टे दंपति का आना नियोजित नहीं था.

वे एक पिकनिक के लिए 1974 में यहां आए थे जब उन्होंने निर्धन आदिवासियों के शोषण और उनकी ग़रीबी को देखा. उन्होंने यह भी पाया कि उन लोगों में तरह-तरह की बीमारियाँ और अंधविश्वास थे.

मंदाकिनी कहती हैं, "हम लोग यहां पिकनिक के लिए आए थे लेकिन यहीं ठहर गए ताकि यहां के पुरुषों और महिलाओं को मुख्यधारा में शामिल किया जा सके."

उन्होंने जब यहाँ बसने का फ़ैसला किया था, उस वक़्त वे अपनी ज़िंदगी के तीसरे दशक में प्रवेश कर रहे थे. नई दुल्हन के लिए यह समय कठिन था. उनकी रोज़ाना की ज़िंदगी संघर्ष भरी थी.

क्या इन्हें यह नागवार भी लगा, इस पर मंदाकिनी कहती हैं, "बिल्कुल नहीं. मेरे लिए आधुनिक दुनिया के मायाजाल में कोई आकर्षण नहीं था. एक डॉक्टर होने के नाते मैं कुछ अलग करना चाहती थी. मेरे साथियों ने बड़े-बड़े शहरों में क्लिनिक खोले, वे अमरीका और इंग्लैंड गए लेकिन हम इन आदिवासियों में बदलाव लाना चाहते थे."

चौथी पीढ़ी भी करेगी समाजसेवा?

अपने इस फ़ैसले पर कभी भी न तो मंदाकिनी और न ही प्रकाश को कोई पछतावा हुआ. अपने पिता बाबा आम्टे के कुष्ठ रोगियों वाले आश्रम में काम करने के कारण समाजसेवा प्रकाश में अंदर से आ गई.

बाबा आम्टे का परिवार एक ऐसा परिवार है जिसकी तीन पीढ़ी समाजसेवा में पूरी तरह से जुटी हुई है.

बाबा आम्टे को कुष्ठ रोगियों के साथ रह कर काम करने के लिए वर्ष 1985 में मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

प्रकाश आम्टे ने गर्व के साथ कहा, "भारत में पहली बार ऐसा हुआ है कि बाप, बेटे और बहु को यह सम्मान दिया गया हो."

उनके चेहरे से शांति और संजीदगी फूट पड़ती है. वह अपने साढ़े तीन साल के पोते के साथ खेल रहे हैं. उनके दो बेटे और एक बेटी भी उनके साथ आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं.

क्या उनकी चौथी पीढ़ी भी समाजसेवा में शामिल रहेगी?

प्रकाश कहते हैं, "हमने कभी अपने बच्चों को इससे जुड़ने के लिए मज़बूर नहीं किया. ये उनका फ़ैसला है. हम चाहेंगे कि हमारा पोता हमारा हाथ बटाए लेकिन यह फ़ैसला उसका होगा कि वह हाथ बँटाता है या नहीं."

ग़रीबों और जानवरों के भी राजा

मंदाकिनी और प्रकाश आम्टे अपने बच्चों के साथ आज एक बड़े से घर में आराम से रहते हैं. लेकिन जब वे 70 के दशक में यहां आए थे तो उन्हें झोंपड़ियों में रहना पड़ा था.

उनके पास आमदनी का कोई ज़रिया नहीं है फिर भी वे एक बड़े से घर में अपेक्षाकृत आराम से रहते हैं जबकि उन्हें सिर्फ़ 2000 रुपए महीना वेतन मिलता है.

आम्टे आदिवासियों के लिए स्कूल, अस्पताल और जानवरों के लिए चिड़ियाखाना भी चला रहे हैं

आम्टे दंपति ने एक सुर में कहा, "हमने अपनी ज़रूरतों को सीमित कर लिया है. हम सादा ढंग से रहते हैं और हमारे ख़र्च उस विश्वास से पूरे हो जाते हैं जिन्हें हमने पैदा किया है.

मंदाकिनी कहती हैं कि वे फ़िल्म देखने नहीं जाते हैं, न फ़ैन्सी कपड़े पहनते हैं और कम खाते हैं.

आम्टे दंपति को जानवर पसंद हैं, ख़ास तौर पर जंगली जानवर. उन्होंने एक छोटा सा चिड़ियाघर बना रखा है जिसमें कई चीते, भालू, भेड़िए, नाग, बंदर और दूसरे जंगली जानवर हैं.

प्रकाश अपने पालतू जानवरों के साथ खेलते हुए बताते हैं, "जब हम यहां आए तो हमने ग़रीब और भूखे आदिवासियों को हर प्रकार के पशुओं का शिकार करते और खाते देखा. यहां तक कि उन्हें लाल चींटियों की चटनी बनाते देखा. फिर हमने उनसे कहा कि जंगली जानवरों ख़ास कर उनके बच्चों को मारना क्यों ठीक नहीं है. अब वे हमारे पास यतीम जानवर ले आते हैं."

आम्टे दंपति को इन जानवरों से विशेष लगाव है.

प्रकाश एक चीते के मुँह में हाथ डालते हैं लेकिन वह उन्हें काटता नहीं है. वे छिपकली के साथ खेलते हैं जो बहुत ज़हरीली है.

वे जिस तरह से उस इलाक़े में आदिवासियों के राजा हैं, उसी तरह वे जानवरों के भी राजा हैं.

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