योग शिक्षक बनकर करियर संवारें

नई दिल्ली, 27 जुलाई (आईएएनएस) परंपरागत दृष्टि से योग शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक रूप में स्वस्थ जीवन बिताने की कला है। प्राचीन भारत में यह उपचार और लोकोत्तर अनुभव प्राप्त करने की प्रमुख विधि थी। योग नियमित दिनचर्या का अंग है, जिसमें शारीरिक और ध्यान-साधना के सभी व्यायाम/प्रकार शामिल हैं। आज के युग में इतना अधिक तनाव मौजूद है कि विद्यार्थियों सहित लोग मानसिक और शारीरिक राहत के लिए योग की ओर अधिकाधिक आकर्षित हो रहे हैं।

योग में अनेक क्षेत्र हैं। दो प्रमुख क्षेत्र हैं - (क) अध्यापन और अनुसंधान, (ख) रोगों का उपचार। यदि कोई व्यक्ति योग शिक्षक बनना चाहता है तो उसे योग की तमाम अपेक्षित जानकारी होनी चाहिए। जहां तक रोगों के उपचार का संबंध है, योग मन और शरीर - दोनों का इलाज करता है। किंतु यह जानना जरूरी होता है कि किस आसन से कौन-सा रोग ठीक होता है।

मधुमेह, स्पॉण्डिलाइटिस, वर्टिगो (चक्कर आना) ऐसे कुछ रोग हैं, जो योग के माध्यम से ठीक हो सकते हैं। यदि रोगी मार्जन प्रक्रिया चाहता है तो थोड़े समय के लिए उपचार को महत्व दिया जाता है। यदि किसी की शारीरिक समस्या है तो आसन तथा प्राणायाम (श्वास व्यायाम) के साथ-साथ ध्यान भी लगाया जाता है। मानसिक समस्याओं के मामले में, जैसे अवसाद या चिंता, आसन की बजाय ध्यान लगाने और प्राणायाम पर बल दिया जाता है।

इन सभी समस्याओं की पृष्ठभूमि में योग प्रमुख कैरियर विकल्प के रूप में उभरा है। आम लोगों को योग से काफी लाभ पहुंचा है। विद्यार्थियों के लिए विशेष कक्षाएं लगाई जाती हैं, जहां उन्हें विभिन्न आसन और योग के अन्य पहलू सिखाए जाते हैं।

योग ऐसी कला है, जो व्यक्ति की प्रकृति में आत्मसात होनी चाहिए। योग के सिद्धांतों का अध्ययन करने से विषय को अधिक गहराई से समझने में सहायता मिलेगी। हमारे पास योग पर अनेक ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों में योग पर इतना कुछ लिखा गया है कि हम पढ़कर योगाभ्यास की सही तकनीकें समझ सकते हैं।

योग में प्रशिक्षण लेना जरूरी है; क्योंकि यदि व्यायाम सही ढंग से नहीं किया जाता है तो समस्या बढ़ सकती है। यदि समुचित प्रशिक्षण के बिना योग किया जाता है तो यही योग हानिकारक भी हो सकता है। वर्तमान में भारत में पैंतीस कॉलेजों में योग विषय में स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं।

किसी भी क्षेत्र के स्नातक योग से संबंधित पाठ्यक्रम में शामिल हो सकते हैं। लेकिन दर्शनशास्त्र के स्नातकों को इसमें प्राथमिकता दी जाती है। स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर पर ये पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं, अथवा स्नातकोत्तर डिप्लोमा स्तर का एक वर्ष का पाठ्यक्रम कराया जाता है। यहां यह भी जानना आवश्यक है कि पैंतीस कॉलेजों के अलावा देश भर में पंद्रह योग अध्ययन केंद्र भी हैं।

योग सिद्धांत में निम्नलिखित विषय शामिल हैं - शरीर रचना, दर्शन, ध्यान, व्यायाम तथा योग और ध्यान का सिद्धांत व नियम। व्यावहारिक पक्ष में योगासन, सूर्य नमस्कार तथा प्राणायाम जैसे विभिन्न आसन दिखाए जाते हैं। संस्कृत का ज्ञान निश्चित रूप से लाभप्रद होता है, क्योंकि अधिकांश प्राचीन योग साहित्य संस्कृत भाषा में उपलब्ध है।

इस क्षेत्र में अनेक संभावनाएं हैं। प्रशिक्षण के बाद आप स्वयं योग-कक्षाएं लगा सकते हैं। इसके लिए सिर्फ आपके पास साफ-सुथरा स्थान तथा स्वस्थ माहौल होना चाहिए। खुली जगह सर्वोत्तम रहती है। स्वयं प्रशिक्षण केंद्र खोलना आदर्श रहता है। यदि मान्यता प्राप्त संस्थान से प्रशिक्षण लिया है तो आप स्कूल, कॉलेज में भी कक्षाएं ले सकते हैं। आप स्कूल-कॉलेज तथा विभिन्न स्वास्थ्य/आरोग्य केंद्रों में योग शिक्षक के रूप में कक्षाएं ले सकते हैं। चिकित्सक और शोधकर्ता के रूप में आप रोगों तथा विकारों के संबंध में कार्य कर सकते हैं।

योग से संबंधित पाठ्यक्रम निम्नलिखित संस्थान चलाते हैं -

1. डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा।

2. अमरावती विश्वविद्यालय, अमरावती, महाराष्ट्र।

3. गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद, गुजरात।

4. गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार, उत्तरांचल।

5. मुंबई विश्वविद्यालय, एम.जी. रोड, फोर्ट, मुंबई।

6. अंत:प्रज्ञा, ईस्ट ऑफ कैलाश, नई दिल्ली। (योग कार्यशाला)

7. हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला, हिमाचल प्रदेश।

8. डा. हरिसिंह गौड़ विश्वविद्यालय, गौड़ नगर, सागर, मध्य प्रदेश।

9. शिवाजी विश्वविद्यालय, विद्यानगर, कोल्हापुर, महाराष्ट्र।

10. श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, तिरुपति, आंध्र प्रदेश।

(कैरियर संबंधी और अधिक जानकारी के लिए देखिए ग्रंथ अकादमी, नई दिल्ली से प्रकाशित ए गांगुली और एस. भूषण की पुस्तक "अपना कैरियर स्वयं चुनें" से लिया गया है।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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