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'ग़रीब देशों के लिए संकट गंभीर'

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रिपोर्ट में कहा गया है कि ग़रीब देशों में जनसंख्या का बढ़ना जारी है
व्यापार और विकास के लिए बनी संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंकटाड ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि लगभग 50 ऐसे देशों के लिए ख़तरा सबसे अधिक है जो केवल कुछ उत्पादों के निर्यात पर निर्भर रहते हैं.

युनाईटेड नेशंस ट्रेड एंड डेवलपमेंट यानी अंकटाड ने अपनी रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया है कि अभी दुनिया में दो क़िस्म के ग़रीब देश हैं -- एक वे जिनके पास तेल और गैस है और एक वैसे देश जिनके पास तेल-गैस नहीं है.

अंकटाड ने दुनिया के अल्पविकसित देशों के बारे में जारी की गई अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया के 50 सबसे ग़रीब देशों में, उनके 30 वर्ष के इतिहास में, 2004 से 2006 के बीच सबसे अधिक विकास हुआ.

लेकिन ये विकास लगभग पूरी तरह केंद्रित रही केवल तेल और खनिज के निर्यात करनेवाले देशों के लिए जिनमें अंगोला, सूडान और इक्वेटोरियल गिनी जैसे देश आते हैं.

लेकिन दूसरे कमज़ोर देशों में इस बात का ख़तरा बहुत अधिक है कि अगर ऊर्जा के स्रोत और खाद्यान्न महँगे हुए तो वे संकट में घिर जाएँगे.

सहस्राब्दि लक्ष्य

अंकटाड अपनी रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि करता है कि दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में से आधे से भी कम देश ऐसी दिशा में बढ़ रहे हैं जिससे कि वे संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दि विकास लक्ष्य को हासिल कर सकेंगे.

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2000 में ग़रीब देशों के लिए सहस्राब्दि विकास लक्ष्य तय किए थे जिनमें वर्ष 2015 तक ग़रीबी को आधा करने, एचआईवी के प्रसार को रोकने, और प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने जैसे आठ लक्ष्य तय किए गए थे.

अंकटाड ने अभी जो रिपोर्ट जारी की है उसमें ये भी कहा गया है कि दुनिया के निर्धनतम देशों में जनसंख्या का बढ़ना जारी है. अफ़्रीका में 20 करोड़ और एशिया के निर्धन देशों में आबादी सात करोड़ बढ़ी है.

सहायता

अंकटाड ने साथ ही कहा है कि विदेशों से जो सहायता दी जा रही है वो सहायता मुख्य रूप से सामाजिक परिवर्तनों के लिए दी जा रही है ना कि ग़रीब देशों के संरचनात्मक बदलावों के लिए या ऐसे काम के लिए जिससे कि उनकी उत्पादन क्षमता और आमदनी बढ़ सके.

अंकटाड ने ये भी कहा है कि ये विश्वास एक भ्रम साबित हो चुका है कि निजी क्षेत्र ग़रीब देशों में निवेश करने के लिए आगे आएँगे.

अंकटाड का कहना है कि ज़रूरत अब इस बात की है कि विकास नीति को व्यवस्थित किया जाए.

इसके साथ ही दानदाता देशों को इस बात पर और ध्यान देना पड़ेगा कि वे राहत कार्यक्रमों को कैसे चलाते हैं.

वहीं कुछ देशों को इस बारे में भी सोचने की आवश्यकता है कि वे मदद के लिए किए गए वादे को पूरा कैसे करें.

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