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'स्पीकर के पद की मर्यादा पर हमला हुआ'

By अनीश अहलूवालिया
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बर्धन का कहना था कि सांप्रदायिकता और जातिवाद दोनों दुश्मन हैं
बीबीसी हिंदी के विशेष कार्यक्रम 'आपकी बात बीबीसी के साथ' में सीपीआई महासचिव एबी बर्धन ने कहा, "मैं यह मानता हूँ कि स्पीकर साहब भी सीपीएम से ही चुन कर आए. मगर उसके बाद वो सब पार्टियों के समर्थन से स्पीकर चुने गए. स्पीकर के पद की एक मर्यादा है, एक दर्जा है, जो (संविधान के मुताबिक) लगभग तीसरा बड़ा दर्जा है देश में. ऐसी हालत में उनके दर्जे और मर्यादा को ध्यान में रखते हुए अगर थोड़ी और सावधानी बरतते तो अच्छा होता. "

उनका कहना था, "स्पीकर का नाम सीपीएम के बाक़ी और जो 42 सांसद हैं, उनके साथ जोड़ना शायद अच्छा नहीं था. उनकी मर्याद पर यह हमला हुआ है. लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि स्पीकर एक सक्षम व्यक्ति हैं उन्हीं पर छोड़ना चाहिए कि वो क्या फ़ैसला करना चाहते हैं."

भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर सरकार के साथ मतभेदों के चलते जब वामपंथी दलों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने का फ़ैसला किया तो राष्ट्रपति को सौंपी गई सांसदों की सूची में सोमनाथ चैटर्जी का भी नाम शामिल किया गया.

इससे ये विवाद उपजा कि क्या सोमनाथ चैटर्जी को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद होने के नाते पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए? मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि इस पर लोकसभा अध्यक्ष को ख़ुद ही फ़ैसला करना होगा.

स्पीकर के पद की एक मर्यादा है, एक दर्जा है, जो (संविधान के मुताबिक) लगभग तीसरा बड़ा दर्जा है देश में. ऐसी हालत में उनके दर्जे और मर्यादा को ध्यान में रखते हुए अगर थोड़ी और सावधानी बरतते तो अच्छा होता.... मर्याद पर यह हमला तो हुआ है...

'कौन किस वक्त ख़तरा बन जाए'

लेकिन वाममोर्चे के दूसरे बड़े दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) केमहासचिव एबी बर्धन ने भारत परमाणु समझौते के विरोध पर वामदलों की राय स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर भारत अमरीका के साथ परमाणु उर्जा संबंधी व्यापार करता है तो उसे कोई ऐतराज़ नहीं होता.

उनका कहना था कि आपत्ति इस पर है कि अमरीका के हाइड एक्ट की छाया इस समझौते पर पड़ेगी जो भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है और देश के परमाणु परीक्षण के अधिकार पर अंकुश लगाता है.

वामदलों की घोषित नीति है कि वो अमरीका के कथित साम्राज्यवाद और भारत में सांप्रदायिक ताकतों का विरोध करेंगे.

जब बर्धन से पूछा गया कि वे वाम मोर्चे के ही शब्दों में अमरीका के कथित साम्राज्यवाद को ज़्यादा बड़ी चुनौती मानते हैं या फिर, उन्हीं के शब्दों में भाजपा की कथित सांप्रदायिकता को, तो उनका कहना था कि ‘दोनों ख़तरे हैं, दोनों का मुक़ाबला करना चाहिए. मगर कौन किस वक्त कितना बड़ा ख़तरा बन जाता है, यह वक़्त का तकाज़ा है.

जातिवाद पर राजनीति तो और दल भी करते हैं और जातिवाद इस देश की एक सामाजिक सच्चाई है. उत्तर प्रदेश में पंद्रह साल बाद मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया है तो क्या इसे नज़रअंदाज़ करके देश की राजनीति करना सही बात होगी...?

'बहुमत वाली पार्टी को नज़रअंदाज़ करें?'

वामदलों में कई नेता की इस चिंता और लोकसभा में 22 जुलाई को भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार को गिराने की हिचकिचाहट पर बर्धन का कहना था कि राजनीतिक दलों में चर्चाएँ और मतभेद होते हैं लेकिन पार्टी सभी नेताओं को एक रखने में सफल होगी.

वामदल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को जातिवाद पर राजनीति करने वाली पार्टी मानते रहे हैं तो उसके साथ हाथ मिलाने पर वाम मोर्चे की हो रही आलोचना पर भी बर्धन से पूछा गया.

बर्धन की दलील थी, "जातिवाद पर राजनीति तो और दल भी करते हैं और जातिवाद इस देश की एक सामाजिक सच्चाई है. कई पार्टियाँ जातिवादी राजनीति करती हैं. हाँ, सांप्रदायिकता और जातिवाद दोनों दुश्मन हैं. मगर उत्तर प्रदेश में पंद्रह साल बाद मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया है तो क्या इसे नज़रअंदाज़ करके देश की राजनीति करना सही बात होगी...? कई पार्टियां जातपात पर राजनीति कर रहीं हैं वो कब यह छोड़ेंगी मैं नहीं जानता. लेकिन अगर वो उनकी तमाम आकांक्षांओ को लेकर चलती हैं तो इसमें क्या बुरा है."

लेकिन जब सीपीआई महासचिव से पूछा गया कि अगले चुनावों के बाद सरकार गठन के लिए यदि कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन को समर्थन देने की नौबत आई तो वो क्या करेंगे, तो बर्धन ने इस पर कोई स्पष्ट जवाब ना देते हुए कहा कि वामदल लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गठबंधन के साथ चलेंगे."

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