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मसौदा सौंपने पर कड़ी प्रतिक्रिया

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भारत-अमरीका परमाणु समझौते होने से पहले निगरानी समझौता ज़रुरी है
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के मुख्य घटक दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कहा है कि 'अल्पमत' में आई यूपीए सरकार ने ये क़दम उठा कर देश के साथ 'विश्वासघात' किया है.

उनका कहना था, "विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने ख़ुद अपने बयान को ही ग़लत साबित कर दिया. उन्होंने कहा था कि सरकार संसद में बहुमत साबित करने के बाद ही आईएईए में जाएगी लेकिन उल्टा हुआ."

प्रणव मुखर्जी ने जो बयान दिया था, उससे अलग कुछ नहीं हुआ है. मसौदा बांटना और उसे मंज़ूरी मिलने में बहुत बड़ा फर्क है

अमरीका के साथ प्रस्तावित असैनिक परमाणु सहयोग समझौते के लिए आईएईए के साथ निगरानी समझौता एक ज़रुरी क़दम है.

हालाँकि इस समझौते के विरोध में वामपंथी दलों के यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लेने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि सरकार संसद में विश्वास मत हासिल करने की स्थिति में ही इस दिशा में आगे बढ़ेगी.

कांग्रेस का बचाव

वामपंथी दलों ने भी आईएईए को निगरानी समझौते का मसौदा देने की कड़ी आलोचना की है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता निलोत्पल बसु ने कहा, "ये सरकार गुपचुप तरीके से बहुत कुछ कर रही थी, ये साबित हो गया है. आख़िर इतनी हड़बड़ी दिखाने की ज़रूरत क्या थी."

हालाँकि सत्तारूढ कांग्रेस पार्टी ने सरकार के ताज़ा क़दम को सही ठहराया है. कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा, "प्रणव मुखर्जी ने जो बयान दिया था, उससे अलग कुछ नहीं हुआ है. मसौदा बांटना और उसे मंज़ूरी मिलने में बहुत बड़ा फर्क है."

उनका कहना है, "हम अभी भी इस पर कायम हैं कि सरकार निगरानी समझौते को मंज़ूरी दिलाने के लिए तभी आगे बढ़ेगी जब हम विश्वास मत हासिल कर लेंगे."

कांग्रेस का कहना है कि यूपीए-वाम समन्वय समिति में समझौते के मसौदे पर बातचीत हो रही थी लेकिन वामपंथी दलों के समर्थन वापस ले लेने के बाद मसौदे को सौंपना स्वाभाविक क़दम है.

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