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'हम संघर्ष जारी रखेंगे'

By Staff
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करात ने यूपीए सरकार को परमाणु समझौते का मसौदा छुपाने का आरोप लगाया
वामदलों ने यह भी कहा कि वो पूरी कोशिश करेंगे कि ये परमाणु समझौता न हो और इसके लिए उनका संघर्ष लगातार जारी रहेगा.

इस संबंध में जानकारी देते हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वाम दलों ने समर्थन वापसी का अलग अलग पत्र राष्ट्रपति को सौंपा और एक संयुक्त पत्र के ज़रिए आग्रह किया कि मनमोहन सिंह सरकार से जल्द से जल्द लोकसभा में बहुमत साबित करने को कहा जाए.

उनका कहना था, ' हम पूरी कोशिश करेंगे कि भारत अमरीका परमाणु समझौता न हो और हम इसके लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे. '

करात ने परमाणु समझौते के मसले पर यूपीए सरकार को आड़े हाथों लिया और सरकार की कड़ी आलोचना की.

करात का कहना था कि समझौते के मसौदे के मामले में सरकार ने पारदर्शिता बिल्कुल नहीं अपनाई है.

उनका कहना था, ' यूपीए सरकार ने संसद का अपमान किया है. दिसंबर में जब संसद में बहुमत से इस समझौते को आगे नहीं बढ़ाने पर सहमति बनी थी तो भी वो इस समझौते के रास्ते पर आगे बढ़े हैं.'

इसके अलावा यूपीए समन्वय समिति की बैठकों के दौरान वाम दलों ने बार बार समझौते का मसौदा पेश करने के लिए कहा लेकिन उसे पेश नहीं किया गया.

करात ने तीखे शब्दों में कहा, 'कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी ने कल ये कहा कि समझौते का मसौदा गोपनीय है. इस समझौते के बाद हमारे परमाणु सुरक्षा से जुड़े मामलों पर असर होगा तो इस मसौदे को देश की जनता से कैसे छुपाया जा सकता है. '

करात ने यहां तक कहा कि आईएईए के साथ अमरीका के इसी प्रकार के समझौते को अमरीका ने अपनी कांग्रेस के समक्ष पेश किया और कम से कम मनमोहन सरकार को ( जो अमरीका से सीख लेती है) अमरीका से कुछ सीखना चाहिए.

वाम दलों ने यह भी कहा कि मंहगाई को रोकने के लिए जब भी वाम दलों ने प्रधानमंत्री से अपील की तो उसे कभी भी नहीं सुना गया.

सपा का समर्थन

वामदलों के समर्थन वापसी की अटकलों के बीच समाजवादी पार्टी को समर्थन देने के लिए राज़ी कर चुके यूपीए सरकार के कर्ताधर्ताओं ने दावा किया है कि सरकार को कोई ख़तरा नहीं है और सरकार संसद में विश्वासमत साबित करेगी.

एक ओर सवा चार साल पुरानी यूपीए सरकार के सामने यह सबसे बड़ा राजनीतिक संकट है और दूसरी और राष्ट्रपति बनने के बाद प्रतिभा देवी पाटिल के सामने यह पहला राजनीतिक मसला है जिस पर उन्हें फ़ैसला लेना है.

यूपीए के नेता वामदलों को राज़ी करने में विफल रहे

सरकार के सवा चार साल के दौरान परमाणु मसला यूपीए और वाम दलों के बीच बड़ा मुद्दा बन गया था.

वाम दलों ने चेतावनी दी थी कि यदि सरकार परमाणु समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ अंतिम दौर की बातचीत की दिशा में क़दम बढ़ाती है तो वे यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे.

आईएईए के साथ बातचीत की प्रगति के विषय में जानकारी देने के लिए उन्होंने यूपीए को सात जुलाई तक का समय दिया था.

इस समय सीमा में सरकार की ओर से जवाब तो नहीं आया लेकिन जापान में जी-8 सम्मेलन में भाग लेने जा रहे प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी कि सरकार आईएईए से जल्दी ही बातचीत करने जा रही है.

इसके बाद मंगलवार को वामदलों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी.

वामदलों का कहना है कि अमरीका के साथ परमाणु समझौता देशहित में नहीं है और इससे देश की संप्रभुता और परमाणु मामले में आत्मनिर्भरता को ख़तरा है.

लेकिन यूपीए सरकार का कहना है कि परमाणु समझौता देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए ज़रुरी है और देश का हित इसी में है.

अंकगणित और विश्वासमत

पहले माना जा रहा था कि 59 सदस्यों वाले वाममोर्चे के समर्थन वापसी से यूपीए सरकार अल्पमत में आ जाएगी और उसका गिरना तय है.

लेकिन वामदलों की समर्थन वापसी की धमकियों के बीच यूपीए के रणनीतिकारों ने 39 सदस्यों वाली समाजवादी पार्टी को मना लिया.

अब यूपीए के कर्ताधर्ता दावा कर रहे हैं कि यूपीए सरकार को कोई ख़तरा नहीं है.

पिछले हफ़्ते जब भारतीय जनता पार्टी ने सरकार से विश्वासमत हासिल करने को कहा था तो कांग्रेस की तीख़ी प्रतिक्रिया आई थी.

लोकसभा में गणित यूपीए - 224 एनडीए - 170 वामदल - 59 सपा - 39 जेडी(एस) - 3 आरएलडी - 3 टीआरएड - 3 बसपा - 17 एजीपी - 2 टीडीपी - 5 एनसी - 2 एमडीएमके - 4 निर्दलीय - 6 अन्य दल - 6

लेकिन इस बीच सरकार ने अंकों का जो गणित बिठाया है उसके बाद वह आत्मविश्वास के साथ कह रही है कि वे विश्वासमत हासिल करेंगे.

भारत के विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने मंगलवार को घोषणा की है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को जैसे ही राष्ट्रपति भवन से वामदलों के समर्थन वापसी की औपचारिक सूचना दी जाती है, वैसे ही सरकार जल्द से जल्द लोकसभा का विशेष सत्र बुलाकर विश्वास प्रस्ताव रखेगी.

यूपीए-वाम की समनवय समिति के संयोजक रहे प्रणव मुखर्जी ने संवाददाताओं को बताया,"ग्यारह सितंबर से शुरु होने वाले संसद के मॉनसून सत्र से पहले लोकसभा का विशेष सत्र बुलाया जाएगा. इसमें सरकार विश्वास प्रस्ताव लाएगी. इसकी तारीख़ संसदीय प्रक्रिया के तहत बाद में तय होगी."

इसके बाद सरकार के विश्वास प्रस्ताव लाने की संभावना को देखते हुए मुख्य राजनीतिक दलों की गतिविधियाँ, सांसदों से चर्चा, और बैठकों का दौर तेज़ हो गया.

राजनीतिक हलकों में ख़लबली का कारण ये है कि वामदलों के समर्थन वापस लेने से लोकसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं रह जाता है, जब तक कि वह अपना बहुमत फिर से साबित न कर दे.

लोकसभा की 545 सीटों में से दो रिक्त हैं.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के साथ 543 लोकसभा सदस्यों में से 224 हैं जबकि वाम दलों के 59 और उनके सहयोगी केरल कांग्रेस (थामस) के दो सदस्यों का समर्थन यूपीए को हासिल नहीं है.

इस तरह से जहाँ बहुमत के लिए 272 सांसदों का समर्थन चाहिए वहाँ यूपीए के 224 सांसदों के साथ यदि समाजवादी पार्टी के सभी 39 सांसद भी जुड़ जाएँ, तब भी यूपीए को बहुमत हासिल करने के लिए कम से कम नौ अन्य सांसदों का समर्थन हासिल करना होगा.

यदि कांग्रेस को राष्ट्रीय लोकदल के तीन, जनता दल (एस) के तीन और तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के तीन सांसदों का समर्थन मिल जाता है तो सरकार को 272 सांसदों का समर्थन और लोकसभा में बहुमत मिल जाएगी.

यूपीए इन्ही दलों से और निर्दलीयों से समर्थन जुटाने में लगी हुई है जबकि सभी दलों का नेतृत्व अपने सांसदों को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक चलाने के प्रयास में जुटे हुए हैं.

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