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अमरनाथ विवाद के लिए सर्वदलीय बैठक

Written By: अल्ताफ़ हुसैन
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    अमरनाथ मंदिर बोर्ड को 40 हेक्टेयर ज़मीन देने के फ़ैसले का घाटी में विरोध हो रहा है
    इस बीच मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद ने जल्दबाज़ी में बुलाए एक संवाददाता सम्मेलन में घोषणा की कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए सभी दलों की एक बैठक बुलाएंगे.

    मुख्यमंत्री ने कहा कि तब तक अमरनाथ गुफ़ा के आसपास की जो ज़मीन बोर्ड को देने की बात कही गई है, उस ज़मीन पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं होने दिया जाएगा.

    ग़ुलाम नबी आज़ाद ने यह भी कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि श्राइन बोर्ड संस्थाओं को धार्मिक मामलों को संभालने की ज़िम्मेदारी तो दी जा सकती है लेकिन अगर किसी संस्था को किसी ढाँचे की ज़रूरत होती है तो उसे बनाना सरकार की ज़िम्मेदारी है.

    गोलीबारी

    पुलिस ने सोमवार को प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई. बुधवार को भी श्रीनगर के बाहरी इलाक़े मज़हामा में एक हिंसक भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने गोली चलाई जिसमें फ़ारूक़ अहमद नामक एक व्यक्ति की मौत हो गई.

    इस तरह पिछले तीन दिन में इस तरह के प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी होने से दो लोगों की मौत हो चुकी है. अनेक लोग घायल भी हुए हैं.

    मुख्यमंत्री आज़ाद ने मुद्दे को सुलझाने के लिए सभी दलों की बैठक बुलाने का ऐलान किया

    अमरनाथ बोर्ड को पास की वन भूमि देने के इस फ़ैसले का विरोध अब कश्मीर घाटी के पुलवामा, अनंतनाग और शोपियाँ जैसे नए इलाक़ों में भी फैल गया है. इन इलाक़ों में दुकानें बंद हैं और यात्री गाड़ियाँ भी नहीं चल रही हैं.

    सीमावर्ती शहर हिंदवाड़ा में भी व्यापारिक गतिविधियाँ ठप हैं. वहाँ कॉलेज के बच्चों ने एक जुलूस निकाला जिसमें स्थानीय लोग भी शामिल हुए. कंगन शहर में भी इसी तरह के प्रदर्शन की ख़बर है.

    राजधानी श्रीनगर और पड़ोसी गाँदरबल ज़िले में बुधवार को पूरी तरह बंद रहा. दुकानें बंद हैं और सड़क पर गाड़ियाँ नहीं दिख रही हैं. शहर के कई हिस्सों में उग्र प्रदर्शन हुए हैं.

    अमरनाथ मंदिर प्रबंधन बोर्ड के चेयरमैन राज्यपाल होते हैं और उन्होंने ही बन भूमि इस बोर्ड को देने का फ़ैसला किया है. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ श्रीनगर में सोमवार से ही प्रदर्शन हो रहे हैं.

    अमरनाथ श्राइन बोर्ड वो संस्था है जो अमरनाथ गुफ़ा तक होने वाली तीर्थयात्रा का पूरा इंतज़ाम देखती है. हर साल हज़ारों की संक्या में हिंदू तीर्थयात्री अमरनाथ की यात्रा करते है.

    विरोध की वजह

    ज़मीन देने का विरोध कर रहे संगठनों की संयुक्त समिति के अध्यक्ष मियाँ क़यूम को बुधवार की सुबह से उनके घर में ही नज़रबंद कर दिया गया है.

    हालाँकि इस समिति में शामिल राजनीतिक दलों, सामाजिक और संगठनों के प्रतिनिधियों ने बुधवार को रेज़ीडेंसी रोड पर धरना दिया.

    समिति के नेताओं और स्थानीय लोगों ने सोमवार को पुलिस फ़ायरिंग में मारे गए फ़िरोज़ अहमद के घर तक पैदल मार्च शुरू किया है. फ़िरोज़ का घर शहर के निचले हिस्से में है.

    प्रदर्शन मार्च में शामिल लोग नारे लगा रहे थे, "कश्मीर की नीलामी मंज़ूर नहीं".

    कश्मीर के कई लोगों को लगता है कि अमरनाथ मंदिर को ज़मीन देना किसी ऐसी साज़िश का हिस्सा है, जिसका मक़सद घाटी में ग़ैर-कश्मीरी हिंदुओं को बसाकर मुसलमानों को अल्पसंख्यक बनाना है.

    विरोध कर रहे लोग इस क़दम के लिए मंगलवार को ही सेवानिवृत्त हुए राज्यपाल लेफ़्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा को निशाना बना रहे हैं.

    सिन्हा पर आरोप है कि वे 'हिंदूवादी एजेंडा लागू करके' घाटी में तनाव भड़का रहे हैं.

    सिन्हा की जगह एनएन वोहरा राज्यपाल का पद सँभाल रहे हैं और प्रदेश का राज्यपाल होने के नाते वोहरा अब अमरनाथ मंदिर बोर्ड के भी प्रमुख होंगे.

    ज़मीन देने के फ़ैसले पर सरकार का कहना है कि तीर्थयात्रियों के लिए अस्थाई झोपड़ियाँ और शौचालय बनाने के लिए ज़मीन की ज़रूरत थी, इसलिए ये वनभूमि दी गई है.

    सरकार के इस क़दम का विरोध सबसे पहले पर्यावरण के क्षेत्र से जुड़े स्थानीय कार्यकर्ताओं ने किया था, जिसके बाद कुछ स्थानीय नेता भी इस आंदोलन में शामिल हो गए.

    इस मसले पर अलगाववादी गुट हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के भिन्न धड़े एक होते दिखाई दे रहे हैं. दोनों ही गुटों ने ज़मीन हस्तांतरण के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आंदोलन चलाने का फ़ैसला किया है.

    फ़ैसला वापस लेने की माँग

    भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की विधानसभा के विपक्ष में बैठी नेशनल कॉन्फ्रेंस, सत्ताधारी कांग्रेस की सहयोगी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी ज़मीन के हस्तांतरण का विरोध किया था.

    नेशनल कांफ़्रेंस के साथ ही सत्तारूढ़ कांग्रेस की सहयोगी पीडीपी भी इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हैं

    पीडीपी के नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद का कहना है कि सरकार को ज़मीन हस्तांतरित करने का फ़ैसला इस महीने के अंत तक वापस ले लेना चाहिए.

    वहीं अलगाववादी गुटों का कहना है कि एक साज़िश के तहत ये ज़मीन अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई है.

    अलगवादी नेता सैय्यद अली शाह गीलानी ने कहा, "बोर्ड को ज़मीन देना ग़ैर-कश्मीरी हिंदुओं को घाटी में बसाने की एक साज़िश है ताकि मुस्लिम समुदाय घाटी में अल्पसंख्यक हो जाए."

    उन्होंने ज़मीन के हस्तांतरण के आदेश को रद्द करने की माँग की है. साथ ही उनका कहना था कि अमरनाथ मंदिर बोर्ड की ज़िम्मेदारी कश्मीरी पंडि़तों के हाथों में दे दी जाए.

    गीलानी ने अपने समर्थकों से यह भी अपील की है कि वे घाटी में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनके धार्मिक स्थलों की सुरक्षा का ध्यान रखें.

    दूसरी तरफ़, भारतीय जनता पार्टी ने धमकी दी है कि अगर ज़मीन हस्तांतरण के ख़िलाफ़ आंदोलन नहीं रुका तो वह कश्मीर घाटी में ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति को बाधित करेगी.

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