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तारों का जादूगर महागुरु मुन्ना...

By सुशील झा,
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    मुन्ना 35 वर्ष पहले मुंबई आए और फ़ुटपाथ पर ही घूमते फिरते काम सीखा
    दुकान क्या है, एक झोली में समा जाए इतने खिलौने हैं उनके पास, लेकिन इनकी ख़ासियत है कि ये अल्युमिनियम के तारों से बनाए जाते हैं.

    गुजरात के कच्छ इलाक़े से आए मुन्ना अपना असली नाम नहीं बताते और कहते हैं कि उन्हें लोग महागुरु मुन्ना के नाम से जानते हैं.

    वो कहते हैं, "आप बोलिए जो डिजाइन बनाना है आपके सामने बना दूंगा. एक तार को मोड़ मोड़ कर आपका चेहरा बना दूंगा. यही मेरी कला है."

    अल्युमिनियम के एक ही तार को मोड़ कर मुन्ना, साइकिल, रिक्शा, बुद्ध की मूर्ति और न जाने क्या क्या बना लेते हैं.

    आप बोलिए जो डिजाइन बनाना है आपके सामने बना दूंगा. एक तार को मोड़ मोड़ कर आपका चेहरा बना दूंगा. यही मेरी कला है
    हालांकि उनकी सबसे लोकप्रिय कला है गोरखधंधा या पज़ल गेम. इसमें वो तारों की विभिन्न आकृतियां मसलन छोटे तीर, सर्कल, त्रिभुज इत्यादि बना कर एक दूसरे में फंसा देते हैं.

    सामने वाले को इन्हें अलग करना होता है जो असंभव नहीं तो मुश्किल काम ज़रुर है.

    फ़ुटपाथ पर ज़िदगी

    मुन्ना फ़ुटपाथ पर अपनी कला बेच कर रोजी-रोटी कमाते हैं

    मुन्ना 35 वर्ष पहले मुंबई आए और फ़ुटपाथ पर ही घूमते फिरते काम सीखा.

    वो कहते हैं, "इधर एक फ़ौज़ी अंकल हुआ करते थे जो तारों का काम करते थे. उन्हें मैंने टीवी पर भी देखा है. उनको चाय देता था और बदले में काम सीखता था."

    लेकिन यही काम क्यों? मुन्ना कहते हैं, "असल में मुझे फ़िल्म देखने का शौक था और उसके लिए पैसे चाहिए होते थे. फौज़ी अंकल कुछ पैसे देते थे तो फ़िल्म देखता था."

    मुन्ना जहांगीर आर्ट गैलरी के पास अपनी दुकान पिछले कई वर्षों से लगाते हैं और उनके ग्राहकों में कई विदेशी भी शामिल हैं.

    वो बताते हैं, "मुझे सबसे बड़ा आर्डर जर्मनी के एक व्यक्ति ने दिया था एक हज़ार साइकिल बनाने का. उसमें पैसा बनाया मैंने लेकिन मुझे अपने माता पिता को पैसे भेजने होते हैं."

    मुन्ना के डिजाइन कई बड़े कलाकार भी खरीदते हैं. मुन्ना बताते हैं कि उनके पास एमएफ़ हुसैन भी आया करते थे.

    वो कहते हैं, मैंने हुसैन का एक ऑटोग्राफ़ भी लिया था लेकिन बाद में किसी को 200 रुपए में बेच दिया.

    लेकिन ये ऑटोग्राफ़ बेच क्यों दिया? इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "अभी क्या करना है. ऑटोग्राफ़ रखने के लिए अच्छा घर मांगता है, मैं तो गरीब आदमी हूं. बेच दिया तो पैसा मिला. वो आदमी ऑटोग्राफ़ संभाल के रखेगा."

    हम तो ग़रीब आदमी हैं. कला आती है लेकिन हमारे संबंध वैसे नहीं हैं. मुझसे कई कलाकार आकर डिजाइन बनवाते हैं और अच्छे पैसे देते हैं. मैं इसमें खुश हूं."
    मुन्ना दावा करते हैं कि उन्होंने मुंबई के बगीचों में और सड़कों पर कई मूर्तियां भी डिजाईन की हैं. लेकिन वो इस बात का बुरा नहीं मानते कि उन्हें इसका कोई क्रेडिट नहीं मिलता.

    वो कहते हैं, "हम तो ग़रीब आदमी हैं. कला आती है लेकिन हमारे संबंध वैसे नहीं हैं. मुझसे कई कलाकार आकर डिजाइन बनवाते हैं और अच्छे पैसे देते हैं. मैं इसमें खुश हूं."

    जहांगीर आर्ट गैलरी के पास तारों का यह जादूगर बैठे बैठे कई कलाकृतियों को अंजाम दे देता है. कला उसके लिए मायने रखती है लेकिन मशहूर होना उसकी प्राथमिकता नहीं है.

    महागुरु मुन्ना की ज़रुरत रोटी है और वो फ़ुटपाथ पर अपनी कला बेचकर मिलने वाली रोटी से खुश रहते हैं.

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