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'दुनिया भर में एक करोड़ शरणार्थी'

By Staff
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'कुछ लोग अपने ही देश में शरणार्थी बन गए हैं'
उच्चायोग का कहना है कि लोग अब सिर्फ प्रताड़ना के डर से ही शरणार्थी नहीं बनते बल्कि अन्याय, अलगाव, पर्यावरणीय दबावों, संसाधनों की कमी की वजह से बढ़ रही प्रतिस्पर्धा और सरकारों के ग़ैर मानवीय रवैये के कारण भी अपने घर-बार छोड़ कर भागते हैं.

जहाँ तक इराक़ की बात है, साल 2007 में वहाँ हिंसा में आई कमी के बाद लोगों ने अपने जीवन के सूत्र जोड़ने शुरू कर दिए हैं, हालाँकि कुछ बड़े हमलों की वजह से अब भी लोगों को काफ़ी ख़राब हालात का सामना करना पड़ रहा है लेकिन निराशा के भँवर से लोग अब बाहर आने लगे हैं, शरणार्थी घरों को लौटने लगे हैं.

सीरिया की राजधानी दमिश्क से 2007 में बसों में इराक़ी शरणार्थियों के जत्थे वापस आने शुरू हो गए थे.

इराक़ में सुरक्षा स्थितियों का आकलन कर रहे संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि अब भारी संख्या में शरणार्थियों के लौटने की संभावना है लेकिन सवाल ये है कि पिछले 5 सालों में इराक़ की तबाही से घबरा कर जो लोग भागे हैं, क्या वे लोग वापस आना चाहेंगे.

इराक़ में सुरक्षा स्थितियां बेहतर हुई हैं, लेकिन इतनी भी नहीं कि लौटने वाले आश्वस्त हो सके.

प्रमुख रूप से सीरिया और जॉर्डन में रह रहे इराक़ी शरणार्थियों की संख्या लगभग 20 लाख होगी और उनमें से जो लोग वापस इराक़ लौटे हैं, उनका कहना था कि जब उनका पास धन ख़त्म हो गया, या उनका वीज़ा ख़त्म हो गया तो, उन्हें मजबूरन लौटना पड़ा.

ज़ाहिर है देश में सुरक्षा स्थितियों से आश्वस्त होकर वे नहीं लौटे.

इनके अलावा 27 लाख से ऊपर ऐसे इराक़ी हैं, जो देश में ही विस्थापित हुए, और एक जगह से दूसरी जगह शरणार्थी की तरह रहने को मजबूर है.

सांप्रदायिक हिंसा की वजह से पिछले साल देश में ऐसे लोगों की संख्या ख़ासतौर पर बढ़ी है, जो अपने समुदाय के लोगों के साथ ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं.

BBC

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